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क्या ब्राज़ील की काली मिर्च भारतीय बाज़ार पर बढ़ा रही है दबाव? जानें इसके पीछे की कहानी!

Brazil Spice Trade: ब्राजील की काली मिर्च की बढ़ती मौजूदगी ने भारतीय बाजार में कीमत और प्रतिस्पर्धा को लेकर नई चिंता पैदा की है। कोच्चि में 12 अगस्त को गार्बल्ड काली मिर्च का औसत भाव ₹708 प्रति किलो रहा, जबकि ब्राजील से मई में भारत पहुंची काली मिर्च का औसत निर्यात मूल्य करीब ₹647 प्रति किलो था।
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भारत

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MI Zahir

Aug 13, 2026

Pepper in Market News

काली मिर्च की बढ़ती क़ीमतों और बाज़ार के दबाव से भारतीय मसाला बाज़ार में हलचल तेज़। (फोटो: AI)

भारतीय मसाला बाजार में इस समय काली मिर्च को लेकर खास हलचल है। वजह है ब्राजील की बढ़ती एक्सपोर्ट क्षमता और भारत में आने वाली अपेक्षाकृत प्रतिस्पर्धी कीमत वाली काली मिर्च। हालांकि इसे सीधे तौर पर भारतीय बाजार पर कब्जे की स्थिति कहना अभी जल्दबाजी होगी, लेकिन आयात का दबाव घरेलू कीमतों और किसानों की मोलभाव क्षमता को जरूर प्रभावित कर सकता है।

ब्राज़ील से सस्ती काली मिर्च का दबाव

ब्राजील दुनिया के बड़े काली मिर्च एक्सपोर्टरों में शामिल है। 2024 में ब्राजील ने करीब 30 करोड़ डॉलर यानी लगभग ₹2,860 करोड़ की काली मिर्च एक्सपोर्ट की थी। इसमें भारत को करीब 3.08 करोड़ डॉलर यानी लगभग ₹294 करोड़ की काली मिर्च भेजी गई।

भारत ब्राज़ील की काली मिर्च के प्रमुख खरीदारों में बना हुआ

सन 2026 में भी भारत ब्राजील की काली मिर्च के प्रमुख खरीदारों में बना हुआ है। मई 2026 के ट्रेड डाटा में भारत को भेजी गई ब्राजीलियाई काली मिर्च का औसत यूनिट प्राइस करीब 6.785 डॉलर प्रति किलो था। 13 अगस्त के करीब ₹95.4 प्रति डॉलर के विनिमय भाव पर यह लगभग ₹647 प्रति किलो बैठता है। यह केवल एक्सपोर्ट यूनिट प्राइस है; भारत पहुंचने के बाद फ्रेट, बीमा, शुल्क और अन्य लागत अलग जुड़ती हैं।

अंतर भारतीय बाजार के लिए महत्वपूर्ण

यही अंतर भारतीय बाजार के लिए महत्वपूर्ण है। अगर विदेशी काली मिर्च घरेलू उत्पाद के मुकाबले कम कीमत पर उपलब्ध होती है, तो प्रोसेसर और बड़े खरीदार आयातित माल की ओर रुख कर सकते हैं। इसका सीधा असर घरेलू उत्पादकों की कीमत पर पड़ सकता है।

भारत-पास व्यापार का व्यापक परिप्रेक्ष्य

भारत और ब्राजील के बीच व्यापार केवल मसालों तक सीमित नहीं है। 2025 में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 15.21 अरब डॉलर यानी करीब ₹1.45 लाख करोड़ तक पहुंच गया। इसमें भारत का ब्राजील को एक्सपोर्ट 8.35 अरब डॉलर और ब्राजील से इंपोर्ट करीब 6.86 अरब डॉलर रहा।

इससे साफ है कि ब्राजील भारत के लिए लैटिन अमेरिका का महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदार है। दोनों देश आने वाले वर्षों में व्यापार को और बढ़ाने का लक्ष्य भी रख रहे हैं। इसलिए कृषि उत्पादों और मसालों में प्रतिस्पर्धा का महत्व आगे बढ़ सकता है।

काली मिर्च के मामले में तस्वीर और दिलचस्प है। 2024 में ब्राजील की कुल काली मिर्च एक्सपोर्ट में भारत प्रमुख खरीदारों में शामिल था। 2026 के ट्रेड सिग्नल भी बताते हैं कि ब्राजील से भारत को काली मिर्च की सप्लाई सक्रिय बनी हुई है।

भारतीय मसाला निर्यात में गिरावट

भारतीय मसाला उद्योग के लिए चुनौती केवल इंपोर्ट से नहीं है। एक्सपोर्ट बाजार में भी दबाव दिखाई दे रहा है।

स्पाइसेस बोर्ड के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने 17.34 लाख टन मसाले और मसाला उत्पाद एक्सपोर्ट किए। इनका मूल्य ₹39,140.11 करोड़ यानी करीब 4.43 अरब डॉलर रहा। एक साल पहले 17.99 लाख टन मसालों का एक्सपोर्ट हुआ था, जिसका मूल्य ₹39,994.48 करोड़ यानी करीब 4.72 अरब डॉलर था। यानी मात्रा में करीब 4 प्रतिशत और डॉलर मूल्य में करीब 6 प्रतिशत की गिरावट आई।

इस गिरावट के पीछे कमजोर वैश्विक मांग, अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा और अलग-अलग मसालों की कीमतों में बदलाव जैसे कारण हैं। ऐसे समय में घरेलू बाजार में विदेशी सप्लाई बढ़ना किसानों के लिए अतिरिक्त दबाव पैदा कर सकता है।

भारत के मसाला उद्योग की चुनौतियां

भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती अब केवल ज्यादा उत्पादन की नहीं, बल्कि क्वालिटी, फूड सेफ्टी और ट्रेसबिलिटी की है।

अंतरराष्ट्रीय खरीदार अब मसालों में पेस्टिसाइड रेजिड्यू, माइक्रोबियल सेफ्टी, प्रोसेसिंग और ट्रेसबिलिटी को पहले से ज्यादा महत्व दे रहे हैं। ऐसे में भारतीय एक्सपोर्टरों को खेत से लेकर प्रोसेसिंग और पैकेजिंग तक पूरी सप्लाई चेन पर निगरानी मजबूत करनी होगी।

भारतीय मसाला उद्योग के लिए यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि ब्राजील, वियतनाम, इंडोनेशिया और श्रीलंका जैसे उत्पादक देश वैश्विक बाजार में अलग-अलग कीमत और सप्लाई मॉडल के साथ प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं।

ब्राज़ील की काली मिर्च से किसानों पर कितना असर?

कोच्चि के ताजा बाजार भाव देखें तो 12 अगस्त 2026 को गार्बल्ड काली मिर्च का औसत भाव ₹708 प्रति किलो और अनगार्बल्ड काली मिर्च का भाव ₹688 प्रति किलो था।

इस स्तर पर अगर आयातित काली मिर्च कम लागत में उपलब्ध होती है तो घरेलू खरीदारों के पास कीमत पर दबाव बनाने का विकल्प बढ़ जाता है। इसका सबसे ज्यादा असर उन किसानों पर पड़ सकता है जिनकी उत्पादन लागत अधिक है।

हालांकि बाजार की कीमत सिर्फ आयात से तय नहीं होती। घरेलू उत्पादन, स्टॉक, क्वालिटी, मौसम, एक्सपोर्ट मांग और अंतरराष्ट्रीय कीमतें भी काली मिर्च के भाव को प्रभावित करती हैं। इसलिए मौजूदा गिरावट या नरमी को केवल ब्राजील के इंपोर्ट से जोड़ना सही नहीं होगा।

भारत के लिए आगे का रास्ता

भारत को इस चुनौती का जवाब केवल इंपोर्ट रोककर नहीं, बल्कि अपनी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ाकर देना होगा।

पहला फोकस क्वालिटी और वैल्यू एडिशन पर होना चाहिए। साबुत काली मिर्च के साथ स्टरलाइज्ड, ग्राउंड, एक्सट्रैक्ट और तैयार मसाला उत्पादों का एक्सपोर्ट बढ़ाया जा सकता है।

दूसरा, किसानों को बेहतर प्लांटिंग मैटेरियल, वैज्ञानिक खेती, पेस्ट मैनेजमेंट और पोस्ट-हार्वेस्ट तकनीक उपलब्ध करानी होगी। इससे उत्पादन लागत घटाने और क्वालिटी सुधारने में मदद मिल सकती है।

तीसरा, अफ्रीका, मध्य एशिया और अन्य उभरते बाजारों में भारतीय मसालों की ब्रांडिंग मजबूत करनी होगी। भारत की ताकत केवल उत्पादन नहीं, बल्कि मसालों की प्रोसेसिंग, ब्लेंडिंग और वैल्यू एडिशन में भी है।

नये बाजारों की खोज

भारतीय मसाला उद्योग को पारंपरिक बाजारों पर निर्भरता कम करके नए खरीदार तलाशने होंगे। अफ्रीका, मध्य एशिया और पश्चिम एशिया जैसे बाजारों में भारतीय मसालों के लिए नए अवसर तलाशे जा सकते हैं।

इसके लिए केवल एक्सपोर्ट बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। स्थानीय डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क, पैकेजिंग, ब्रांडिंग और बाजार की जरूरत के अनुसार उत्पाद तैयार करने पर भी जोर देना होगा।

काली मिर्च की खेती पर तकनीकी नवाचार

काली मिर्च और दूसरे मसालों की खेती में डिजिटल एग्रीकल्चर, बेहतर सिंचाई, रोग प्रबंधन और डेटा आधारित खेती किसानों की लागत कम कर सकती है।

साथ ही खेत से मंडी तक डिजिटल ट्रेसबिलिटी विकसित होने से एक्सपोर्टरों को उत्पाद की क्वालिटी प्रमाणित करने में मदद मिलेगी। इससे विदेशी खरीदारों का भरोसा बढ़ाया जा सकता है।

किसानों को सरकारी सहयोग

सरकार और स्पाइसेस बोर्ड को किसानों तथा एक्सपोर्टरों के बीच बेहतर बाजार सूचना तंत्र विकसित करना होगा। किसानों को अंतरराष्ट्रीय कीमत, इंपोर्ट ट्रेंड, क्वालिटी स्टैंडर्ड और एक्सपोर्ट मांग की जानकारी समय पर मिलना जरूरी है।

भारत-श्रीलंका एफटीए : काली मिर्च के लिए वार्षिक सीमा और शुल्क

भारत-श्रीलंका एफटीए के तहत काली मिर्च के लिए 2,500 टन की वार्षिक सीमा और उसके बाद 8 प्रतिशत शुल्क जैसी व्यवस्थाएं पहले से मौजूद हैं। ऐसे प्रावधानों की प्रभावी निगरानी जरूरी है ताकि ट्रेड रूट का इस्तेमाल घरेलू बाजार को नुकसान पहुंचाने वाली अनियमित सप्लाई के लिए न हो।

भारतीय बाजार के लिए प्रतिस्पर्धा का संकेत

बहरहाल, कुल मिलाकर, ब्राजील की काली मिर्च अभी भारतीय बाजार के लिए कोई अकेला बड़ा खतरा नहीं है, लेकिन यह प्रतिस्पर्धा का संकेत जरूर है। कोच्चि में घरेलू काली मिर्च के भाव और ब्राजील से आने वाली सप्लाई के बीच अंतर कम रहने पर भारतीय किसानों पर कीमत का दबाव बढ़ सकता है। भारत के लिए असली जवाब बेहतर क्वालिटी, कम लागत, मजबूत ब्रांडिंग और नए एक्सपोर्ट बाजारों में है।