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ज़रा याद करो कुर्बानी: क्या आप जानते हैं गोकुलभाई भट्ट ने स्वतंत्रता आंदोलन में कैसे दिया योगदान?

Freedom Movement: गोकुलभाई भट्ट ने प्रजामंडल आंदोलन, सत्याग्रह और गांधीवादी विचारों के जरिए सिरोही में जनचेतना जगाई। जानिए स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर लोकतांत्रिक भारत के निर्माण तक उनके संघर्ष और योगदान की पूरी कहानी।
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Aug 12, 2026
Freedom Fighter GokulBhai Bhatt News
गोकुलभाई भट्ट ने सिरोही में प्रजामंडल आंदोलन के जरिए स्वतंत्रता और जनअधिकारों की आवाज बुलंद की। (फोटो: AI )

राजस्थान के स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास केवल बड़े शहरों और प्रमुख नेताओं के संघर्ष तक सीमित नहीं है। रियासतों में रहने वाली जनता को राजनीतिक अधिकार दिलाने, उत्तरदायी शासन की मांग उठाने और सामाजिक सुधारों को जनआंदोलन से जोड़ने वाले अनेक सेनानियों ने भी आजादी की लड़ाई को मजबूत किया। ऐसे ही प्रमुख गांधीवादी नेता थे गोकुलभाई दौलतराम भट्ट, जिन्हें राजस्थान में सम्मानपूर्वक ‘राजस्थान का गांधी’ कहा जाता है। आपातकाल के दौरान भी उन्होंने लोकतांत्रिक मूल्यों के पक्ष में आवाज उठाई और हिरासत में रहे। इस दौर से संबंधित अभिलेखों में उनका नाम राजनीतिक बंदियों के बीच मिलता है।

सिरोही रियासत में प्रजामंडल आंदोलन को संगठित किया

गोकुलभाई भट्ट ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ राष्ट्रीय आंदोलन में भाग लेने के साथ-साथ सिरोही रियासत में प्रजामंडल आंदोलन को संगठित किया। उन्होंने सत्याग्रह, अहिंसा, खादी, ग्रामोद्योग, अस्पृश्यता-निवारण और सामाजिक सुधार को अपने सार्वजनिक जीवन का आधार बनाया। उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी था कि वे आजादी के बाद संविधान निर्माण और राजस्थान के पुनर्गठन से जुड़े सवालों पर भी सक्रिय रहे।

गोकुलभाई दौलतराम भट्ट: राजस्थान के गांधी

गोकुलभाई दौलतराम भट्ट का जन्म 19 फरवरी 1898 को सिरोही जिले के हाथल गांव में हुआ था। उनकी शिक्षा मुंबई में हुई। विद्यार्थी जीवन के दौरान ही ब्रिटिश शासन की मानसिकता और भारतीयों के साथ होने वाले भेदभाव की घटनाओं ने उनके मन पर गहरा प्रभाव डाला।

उन्होंने अपनी पढ़ाई छोड़ कर देशसेवा का रास्ता चुना

मुंबई में रहते हुए वे राष्ट्रीय आंदोलन के संपर्क में आए। महात्मा गांधी के विचारों और असहयोग आंदोलन से प्रभावित होकर उन्होंने अपनी पढ़ाई छोड़कर देशसेवा का रास्ता चुना। बाद में वे कांग्रेस के आंदोलनों से जुड़े और स्वतंत्रता संघर्ष में सक्रिय भूमिका निभाई।

स्वराज का अर्थ केवल अंग्रेजी शासन से मुक्ति नहीं

गोकुलभाई भट्ट केवल राजनीतिक आंदोलन तक सीमित नहीं रहे। उनका मानना था कि स्वराज का अर्थ केवल अंग्रेजी शासन से मुक्ति नहीं, बल्कि गांवों को मजबूत करना, सामाजिक भेदभाव खत्म करना और आम लोगों को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक बनाना भी है।

गोकुलभाई भट्ट : प्रारंभिक शिक्षा और जीवन

मुंबई में शिक्षा के दौरान गोकुलभाई भट्ट का राष्ट्रवादी विचारों से संपर्क बढ़ा। उन्होंने असहयोग आंदोलन के दौर में औपचारिक शिक्षा छोड़कर स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी का निर्णय लिया। 1921 के अहमदाबाद कांग्रेस अधिवेशन में प्रतिनिधि के रूप में भाग लेने के दौरान उनका महात्मा गांधी से संपर्क और मजबूत हुआ। गांधीवादी विचार उनके पूरे सार्वजनिक जीवन की आधारशिला बने।

वरिष्ठ स्वतंत्रता सेनानी थे भट्ट

वे असहयोग आंदोलन, नमक सत्याग्रह और भारत छोड़ो आंदोलन से जुड़े और इन आंदोलनों के दौरान गिरफ्तारियां भी दीं। जमनालाल बजाज फाउंडेशन के अभिलेख में उन्हें इन तीनों आंदोलनों में गिरफ्तारी देने वाले वरिष्ठ स्वतंत्रता सेनानी के रूप में दर्ज किया गया है। इससे स्पष्ट होता है कि उनका स्वतंत्रता संघर्ष केवल स्थानीय रियासत के राजनीतिक विरोध तक सीमित नहीं था, बल्कि वह राष्ट्रीय आंदोलन की व्यापक धारा का हिस्सा था।

गोकुलभाई भट्ट ने प्रजामंडल आंदोलन के जरिए सिरोही में स्वतंत्रता और जनअधिकारों की आवाज बुलंद की। (विजुअल: AI)

प्रजामंडल आंदोलन की स्थापना

रियासतों में रहने वाली जनता को राजनीतिक अधिकार और उत्तरदायी शासन दिलाने के लिए प्रजामंडल आंदोलन महत्वपूर्ण बना। सिरोही में भी इस आंदोलन ने जनता को संगठित किया। उपलब्ध ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार 23 जनवरी 1939 को गोकुलभाई भट्ट ने सिरोही में प्रजामंडल की स्थापना की और इसके माध्यम से जनता को रियासती शासन के विरुद्ध संगठित किया। इससे पहले सिरोही के कुछ कार्यकर्ताओं ने 1934 में मुंबई में प्रजामंडल बनाने का प्रयास किया था।

सिरोही में प्रजामंडल से जुड़ी एक सभा पर लाठीचार्ज हुआ

प्रजामंडल का उद्देश्य जनता के लिए उत्तरदायी शासन की मांग उठाना और रियासती व्यवस्था में नागरिक अधिकारों के लिए संघर्ष करना था। आंदोलन के दौरान सभाओं और प्रदर्शनों पर दमन हुआ तथा कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया। सिरोही में प्रजामंडल से जुड़ी एक सभा पर लाठीचार्ज की घटना का उल्लेख राजस्थान के प्रजामंडल आंदोलन से संबंधित ऐतिहासिक सामग्री में मिलता है।

अगस्त क्रांति के दौरान भी सिरोही में भट्ट ने अलख जगाई

सन 1942 की अगस्त क्रांति के दौरान भी सिरोही में राष्ट्रीय आंदोलन की गतिविधियां तेज हुईं। इस तरह गोकुलभाई भट्ट ने स्थानीय जनता के संघर्ष को देशव्यापी स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

स्वतंत्रता के बाद की भूमिका

स्वतंत्रता के बाद भी गोकुलभाई भट्ट का सार्वजनिक जीवन सक्रिय रहा। वे 1947 से 1949 तक सिरोही राज्य के मुख्यमंत्री रहे। इसके बाद वे राजस्थान प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे और संविधान सभा के सदस्य के रूप में कार्य किया। नेहरू आर्काइव में उनके इन पदों का उल्लेख मिलता है।

ग्राम पंचायत और पंचायती राज को महत्व देने की वकालत की

संविधान सभा में उन्होंने विशेष रूप से ग्राम पंचायत और पंचायती राज को महत्व देने की वकालत की। वे गांधीवादी विकेंद्रीकरण के समर्थक थे और उनका मानना था कि लोकतंत्र की वास्तविक ताकत गांवों तक पहुंचनी चाहिए। संविधान सभा की बहसों में उन्होंने इसी दृष्टिकोण से संविधान में गांवों और पंचायतों की भूमिका को पर्याप्त महत्व न मिलने पर चिंता व्यक्त की।

सिरोही राज्य का बड़ा हिस्सा राजस्थान में शामिल हुआ

सिरोही के पुनर्गठन और माउंट आबू के भविष्य का सवाल भी उनके सार्वजनिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा। उन्होंने सिरोही को विभाजित किए जाने और आबू क्षेत्र को राजस्थान से अलग किए जाने के प्रस्ताव का विरोध किया। अंततः सिरोही राज्य का बड़ा हिस्सा राजस्थान में शामिल हुआ, जबकि आबू-डेलवाड़ा क्षेत्र सहित कुछ इलाके तत्कालीन बंबई राज्य में चले गए। इसलिए यह कहना अधिक सही है कि गोकुलभाई भट्ट ने माउंट आबू और सिरोही के प्रश्न पर राजस्थान के पक्ष में लगातार राजनीतिक प्रयास किए, न कि अकेले उनके प्रयासों से पूरा क्षेत्र राजस्थान में रहा।

गोकुलभाई भट्ट को सम्मान और उनका योगदान

स्वतंत्रता आंदोलन और सामाजिक सेवा में उनके योगदान को देश ने भी सम्मान दिया। भारत सरकार के आधिकारिक पद्म पुरस्कार अभिलेख के अनुसार गोकुलभाई दौलतराम भट्ट को 1971 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था। पुरस्कार के क्षेत्र में उनका उल्लेख ‘Social Work’ के अंतर्गत किया गया है।

जब जमनालाल बजाज पुरस्कार दिया गया

इसके बाद 1982 में उन्हें जमनालाल बजाज पुरस्कार फॉर कंस्ट्रक्टिव वर्क प्रदान किया गया। जमनालाल बजाज फाउंडेशन के अभिलेख में उनके खादी, ग्रामोद्योग, सांप्रदायिक सद्भाव, अस्पृश्यता-निवारण, गोसेवा और शराबबंदी से जुड़े कार्यों का उल्लेख है।

गोकुलभाई भट्ट : स्मृति और आज का संदर्भ

गोकुलभाई भट्ट की विरासत केवल स्वतंत्रता सेनानी के रूप में नहीं, बल्कि गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता और लोकतांत्रिक विचारक के रूप में भी देखी जाती है। उनका जोर खादी, ग्रामोद्योग, सामाजिक समरसता, अस्पृश्यता-निवारण, शराबबंदी और ग्रामीण स्वावलंबन पर रहा।

वे मानते थे कि आजादी केवल सत्ता परिवर्तन नहीं

उनकी सबसे महत्वपूर्ण सीख यह थी कि आजादी केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति तक अधिकार और सम्मान पहुंचाने की प्रक्रिया है। संविधान सभा में पंचायतों और ग्राम-आधारित लोकतंत्र को लेकर उनका आग्रह इसी सोच को दर्शाता है।

उन्होंने सिरोही की जनता को राजनीतिक चेतना से जोड़ा

गोकुलभाई भट्ट का जीवन राजस्थान के प्रजामंडल आंदोलनों, राष्ट्रीय स्वतंत्रता संघर्ष और स्वतंत्र भारत के लोकतांत्रिक निर्माण के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में देखा जा सकता है। उन्होंने सिरोही की जनता को राजनीतिक चेतना से जोड़ा और गांधीवादी रचनात्मक कार्यक्रमों को सामाजिक जीवन में उतारने का प्रयास किया।

गोकुलभाई भट्ट : प्रेरणा के स्रोत

गोकुलभाई भट्ट की कहानी आज भी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्होंने संघर्ष को केवल राजनीतिक विरोध नहीं बनाया। उनके लिए स्वतंत्रता का अर्थ था-जनता को अधिकार मिले, गांव मजबूत हों, सामाजिक भेदभाव कम हो और लोकतंत्र आम आदमी की भागीदारी से चले। उनका जीवन बताता है कि स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान केवल बड़े राजनीतिक पदों से नहीं, बल्कि सत्याग्रह, जनसंगठन, सामाजिक सेवा और लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए निरंतर संघर्ष से भी दिया जाता है।

राजस्थान के इतिहास में गोकुलभाई भट्ट का अहम स्थान

बहरहाल,राजस्थान के इतिहास में गोकुलभाई भट्ट का स्थान इसी व्यापक गांधीवादी परंपरा में है। उनकी जीवन यात्रा आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देती है कि समाज में स्थायी परिवर्तन के लिए विचार, संगठन, त्याग और सेवा-चारों का साथ जरूरी है।

Updated on:
12 Aug 2026 03:54 pm
Published on:
12 Aug 2026 03:46 pm