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जन्माष्टमी पर अद्भुत ग्रहयोग: 59 साल बाद अष्टमी-रोहिणी का दुर्लभ मेल, वृषभ राशि के चंद्रमा की साक्षी में जन्मेंगे ‘कान्हा’

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी इस बार केवल धार्मिक आस्था का पर्व नहीं, बल्कि ज्योतिषीय दृष्टि से भी विशेष संयोग लेकर आ रही है। इस बार 4 सितंबर को रोहिणी-अष्टमी योग में कान्हा का जन्मोत्सव मनाया जाएगा।
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Sep 03, 2026
Janmashtami 2026
सांकेतिक इमेज (Chatgpt)

भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि इस बार केवल आस्था का पर्व नहीं, बल्कि पंचांग गणना की दृष्टि से भी खास संयोग लेकर आ रही है। देशभर में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी इस साल 4 सितंबर, शुक्रवार को मनाई जाएगी। पंचांग रिपोर्टों के अनुसार, अष्टमी तिथि 4 सितंबर की देर रात करीब 12:13-12:14 बजे तक रहेगी। इसलिए अधिकांश गृहस्थ परिवार इसी दिन व्रत और पूजन करेंगे।

निशीथ काल यानी मध्यरात्रि पूजा का शुभ समय रात 11:57 से 12:43 बजे तक बताया गया है। कई पंचांग स्रोतों ने यह भी स्पष्ट किया कि वैष्णव संप्रदाय के कुछ अनुयायी उदयातिथि की गणना के आधार पर व्रत अगले दिन, यानी 5 सितंबर को भी रख सकते हैं। इसलिए तारीख को लेकर हर साल की तरह इस बार भी असमंजस देखा गया। पंचांग गणना बताती है कि जन्माष्टमी के दिन सुबह से रात करीब 11:04 बजे तक रोहिणी नक्षत्र रहेगा, इसके बाद मृगशिरा नक्षत्र लग जाएगा।

दोपहर तक हर्षण योग और वज्र योग

योग की बात करें तो दोपहर करीब 3:44 बजे तक हर्षण योग और इसके बाद वज्र योग बनेगा। करण के मामले में दोपहर करीब 1:20 बजे तक बालव करण और इसके बाद कौलव करण रहेगा। मध्यरात्रि पूजा के समय चंद्रमा अपनी उच्च राशि वृषभ में गोचर करेगा, जिसे भगवान कृष्ण के जन्म-समय की स्थितियों से मिलता-जुलता माना जाता है।

ग्रह-गोचर की दृष्टि से सितंबर की शुरुआत में सूर्य और बुध सिंह राशि में, गुरु कर्क राशि में तथा शनि मीन राशि में गोचर कर रहे हैं। यह जानकारी विभिन्न मासिक राशिफल रिपोर्टों में दर्ज है। ज्योतिष मान्यता के अनुसार, जब अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र और वृषभ राशि का चंद्रमा एक साथ आते हैं, तो इसे भगवान कृष्ण के जन्म-समय जैसा दुर्लभ संयोग माना जाता है।

क्या कहते हैं ज्योतिषाचार्य?

ज्योतिषाचार्य पं. अमर डब्बावाला के अनुसार, 1967 के बाद अब 2026 में कुछ प्रमुख ग्रहों की स्थिति में पुनरावृत्ति के साथ जन्माष्टमी का पर्वकाल आ रहा है। ज्योतिषाचार्य पं. अमर डब्बावाला का कहना है कि इस बार के संयोग पर राष्ट्र के प्रभाव में वृद्धि के संकेत मिलते हैं। बता दें कि कुछ ज्योतिषाचार्यों ने जन्माष्टमी पर करीब 15 साल बाद बनने वाला अष्टमी-रोहिणी योग बताया है। जिसे पौराणिक मान्यताओं में द्वापर युग के कृष्ण-जन्म काल से जोड़ा जाता है।

धार्मिक मान्यताओं में साधना का विशेष महत्व

ज्योतिष और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ऐसे शुभ योग में ग्रहों की शक्ति बढ़ने से साधकों के लिए संकल्प और साधना का विशेष महत्व बताया जाता है। कृष्ण भक्तों को इस अवसर पर कृष्णाष्टकम् और कृष्ण कथा-लीलामृत के पाठ-श्रवण की सलाह दी जाती है, जिसे भक्ति के माध्यम से ज्ञान, वैराग्य और पुरुषार्थ की सिद्धि से जोड़ा जाता है।

परंपरागत मान्यताओं में यह भी कहा गया है कि जिन कन्याओं के विवाह में बाधा आ रही हो, वे जन्माष्टमी से भगवान कृष्ण के पूजन के साथ माता कात्यायनी की उपासना आरंभ कर सकती हैं। पौराणिक कथाओं में गोपियों द्वारा कात्यायनी व्रत रखकर श्रीकृष्ण को पति रूप में पाने की कामना का उल्लेख मिलता है। इसी परंपरा के चलते यह व्रत आज भी प्रचलित है। साधकों को वैदिक मंत्रों और स्तोत्र-पाठ का लगातार तीन माह तक नियमित पालन करने की सलाह दी जाती है।

Updated on:
03 Sept 2026 09:27 pm
Published on:
03 Sept 2026 09:27 pm