
वैश्विक अर्थव्यवस्था की सुस्ती, व्यापार तनाव और ऊर्जा संकट के बीच भारत की विकास गाथा दुनिया भर के नीति निर्माताओं की चर्चा का केंद्र बन गई है। राजधानी दिल्ली में 3 से 5 अक्टूबर तक चलने वाले 5वें कौटिल्य इकोनॉमिक कॉन्क्लेव (KEC-2026) में विशेषज्ञों ने कहा कि भारत मौजूदा हालात में दुनिया की सबसे अहम विकास कहानियों में से एक है।
वित्त मंत्रालय की घोषणा के अनुसार 'रेजिलियंस इन एन एज ऑफ फ्लक्स' थीम पर हुए इस 3 दिवसीय आयोजन में नीति निर्माता, अर्थशास्त्री और शिक्षाविद जुटे थे। इस कार्यक्रम में करीब 30 देशों के 80 से अधिक अंतरराष्ट्रीय प्रतिभागी शामिल थे। इसका आयोजन इंस्टीट्यूट ऑफ इकोनॉमिक ग्रोथ (IEG) ने वित्त मंत्रालय के सहयोग से किया। आयोजकों के मुताबिक यह केवल आमंत्रण पर होने वाला आयोजन है और 2022 में इसकी शुरुआत हुई थी।
दिल्ली में आयोजित KEC-2026 में उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने उद्घाटन भाषण दिया, जबकि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को भारत की आर्थिक प्राथमिकताओं पर विशेष पूर्ण सत्र को संबोधित करना था। शुरुआती सत्र 'ए वर्ल्ड प्राइस्ड फॉर रिस्क' की अध्यक्षता लॉर्ड निकोलस स्टर्न ने की, जिसमें प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव पी.के. मिश्रा का मुख्य भाषण रहा। इस सत्र में ऊर्जा झटकों, आपूर्ति श्रृंखला की रुकावटों और व्यापार को हथियार बनाने के असर पर चर्चा हुई।
स्टॉकहोम स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में अर्थशास्त्र के एसोसिएट प्रोफेसर और जे-पाल के शिक्षा क्षेत्र के वैश्विक सह-अध्यक्ष अभिजीत सिंह ने रविवार को कहा कि जब दुनिया के कई हिस्सों में वृद्धि की रफ्तार धीमी है, तब भारत की स्थिति खास महत्व रखती है। उन्होंने माना कि विकास दर के सटीक आंकड़ों पर कभी-कभी बहस होती है, लेकिन भारत वैश्विक स्तर पर सबसे बड़ी विकास कहानियों में बना हुआ है। उनके अनुसार कॉन्क्लेव की खूबी यह है कि यह शीर्ष नीति निर्माताओं, मंत्रियों, पूर्व अधिकारियों और प्रमुख शिक्षाविदों को एक मंच पर लाता है।
सरकारी आंकड़े भारत की ग्रोथ की इस धारणा को काफी हद तक समर्थन देते हैं। सांख्यिकी मंत्रालय के अनुसार वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में वास्तविक जीडीपी 7.8% बढ़ी, जबकि पिछले वर्ष की इसी तिमाही में यह 6.9% थी। इसी तिमाही में नॉमिनल जीडीपी में 10.3% की वृद्धि दर्ज हुई। इसी के साथ भारत सबसे तेज बढ़ने वाली बड़ी अर्थव्यवस्था बना हुआ है।
अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं भी भारत को आगे मानती हैं, लेकिन जोखिम की ओर इशारा करती हैं। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने ऊंची ऊर्जा कीमतों के असर के चलते 2026-27 के लिए भारत का विकास अनुमान अप्रैल के 6.5% से घटाकर 6.4% कर दिया, फिर भी उसने भारत को दुनिया की सबसे तेज बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में गिना और मजबूत निजी खपत व सेवा क्षेत्र को इसका आधार बताया। आईएमएफ ने 2027 में ऊर्जा झटका कम होने पर मजबूती और मध्यम अवधि में लगभग 6.5% वृद्धि का अनुमान जताया है।
इंडोनेशिया की राष्ट्रीय आर्थिक परिषद के सदस्य और पूर्व वित्त मंत्री मोहम्मद चातिब बसरी ने कहा कि ऐसे सम्मेलन देशों को एक-दूसरे के अनुभव से सीखने का मौका देते हैं। उनके मुताबिक इंडोनेशिया भारत से कर सुधारों में काफी कुछ सीख सकता है। उन्होंने भारत द्वारा कई अप्रत्यक्ष करों को मिलाकर वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू करने को बड़ा संरचनात्मक सुधार बताया, और कहा कि इंडोनेशिया इससे सीखकर अपना कर ढांचा बेहतर बना सकता है।
वैश्विक व्यापार तनाव और अमेरिका की टैरिफ नीतियों के असर पर इंडोनेशिया की राष्ट्रीय आर्थिक परिषद के सदस्य मोहम्मद चातिब बसरी ने कहा- दुनिया अत्यधिक अनिश्चितता के दौर में है और हालात बहुत तेजी से बदल रहे हैं। भारत और इंडोनेशिया, दोनों की सबसे बड़ी चुनौतियों में उन्होंने ऊर्जा कीमतों के उतार-चढ़ाव को गिनाया।
उनके अनुसार कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें सरकारों पर राजकोषीय दबाव बढ़ाती हैं, क्योंकि आम लोगों को राहत देने के लिए सब्सिडी पर ज्यादा खर्च करना पड़ता है। उन्होंने यह भी कहा कि ऊर्जा लागत बढ़ने का असर सिर्फ वित्तीय स्थिति पर नहीं, महंगाई, औद्योगिक उत्पादन और आर्थिक वृद्धि पर भी पड़ता है। आईएमएफ का 6.4% वाला अनुमान इसी जोखिम को रेखांकित करता है।
कौटिल्य इकोनॉमिक कॉन्क्लेव का एक बड़ा हिस्सा तकनीक और डिजिटल अर्थव्यवस्था पर रहा, जिसमें संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया का मुख्य भाषण "फ्रॉम कनेक्टिविटी टू एआई" विषय पर था। कार्यक्रम में रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर और प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव-2 शक्तिकांत दास 'कौटिल्य एंड ए रिसर्जेंट इंडिया' सत्र के मुख्य वक्ता रहे, जबकि एआई के दौर में काम, कौशल और शिक्षा, तथा एशिया-अफ्रीका आर्थिक साझेदारी पर भी सत्र हुए।
कौटिल्य इकोनॉमिक कॉन्क्लेव का संदेश साफ रहा कि भारत की रफ्तार मजबूत है, लेकिन ऊर्जा कीमतों और वैश्विक अनिश्चितता की चुनौती बनी हुई है। नीति निर्माताओं के सामने सवाल यही है कि सुधारों और घरेलू मांग के सहारे इस गति को कैसे बनाए रखा जाए।