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भारतीय लोगों को स्क्रीन का नशा: स्क्रॉलिंग की आदत से चल रहा अरबों डॉलर का कारोबार, जानिए कैसे?

रील्स और शॉर्ट्स का स्क्रॉल धीरे-धीरे नशे की तरह हमारे समय और ध्यान को अपनी गिरफ्त में ले रहा है। भारतीय लोगों पर इसका जबरदस्त असर देखा गया है। सिर्फ स्क्रॉलिंग की आदत से सोशल मीडिया कंपनियां अरबों डॉलर का कारोबार कर रही हैं।
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भारत

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Vinay Shakya

•

Oct 04, 2026

online video viewership in india

सांकेतिक इमेज (सोर्स-chatgpt)

भारत में ऑनलाइन वीडियो देखना अब रोजमर्रा की आदत से आगे बढ़कर एक विशाल अर्थव्यवस्था बन चुका है। एक वीडियो खत्म होते ही अगला शुरू हो जाता है, और 'बस कुछ सेकंड और' की यही आदत मिलकर देश के करोड़ों घंटे निगल रही है।

66 करोड़ दर्शक, 14.9 घंटे साप्ताहिक

मीडिया रिसर्च कंपनी ओरमैक्स की 'OTT ऑडियंस रिपोर्ट 2026' के मुताबिक, भारत में ऑनलाइन वीडियो देखने वालों की संख्या 66.49 करोड़ है, जो देश की आबादी का 45% है। जून-जुलाई 2026 में देशभर के 15,000 उत्तरदाताओं पर हुए सर्वे में ओटीटी दर्शक उसे माना गया है जिसने बीते महीने में कम से कम एक ऑनलाइन वीडियो देखा हो।

रिपोर्ट के अनुसार औसत भारतीय दर्शक हफ्ते में 14.9 घंटे वीडियो देखता है, जिसमें सोशल मीडिया, माइक्रो-ड्रामा और फास्ट चैनल भी शामिल हैं। इस आधार पर ओरमैक्स का अनुमान है कि देश में सालाना करीब 517 अरब घंटे वीडियो देखा जाता है। इसे 365 दिन में बांटने पर यह रोजाना करीब 141 करोड़ घंटे बैठता है। यह रोजाना का आंकड़ा ओरमैक्स का सीधा आंकड़ा नहीं, इस आधार पर की गई गणना है। साथ ही इसमें सिर्फ रील्स नहीं, ओटीटी, यूट्यूब और अन्य सभी ऑनलाइन वीडियो शामिल हैं।

समय की संभावित कीमत

141 करोड़ घंटे को 8 घंटे के कार्यदिवस में बदलें तो यह रोजाना करीब 17.6 करोड़ कार्यदिवस के बराबर है। इस समय की कीमत आंकने के लिए आधार मजदूरी चाहिए। आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण 2025 के अनुसार कैजुअल श्रमिकों की औसत कमाई 30 दिन में ₹11,550 रही, यानी करीब ₹385 रोज। इस हिसाब से इन घंटों की संभावित कीमत रोजाना करीब 6,776 करोड़ रुपए और सालाना करीब 24.7 लाख करोड़ रुपए बैठती है। विशेषज्ञ मानेंगे कि यह वास्तविक आर्थिक नुकसान नहीं, सिर्फ समय के मूल्य का एक मोटा अनुमान है, क्योंकि हर घंटा कामकाजी घंटा नहीं होता।

शॉर्ट वीडियो और ध्यान: क्या कहता है शोध?

जून 2026 में यूरोपियन चाइल्ड एंड एडोलसेंट साइकियाट्री में प्रकाशित व्यवस्थित समीक्षा में कुल 42 अध्ययनों को शामिल किया गया, जो सभी अवलोकन आधारित थे और जिन्हें 'कम' भरोसे का दर्जा मिला। समीक्षकों ने यह भी माना कि इसमें 15 अलग-अलग एडिक्शन स्केल इस्तेमाल हुए, जिससे नतीजों की सटीकता घटती है।

एक अन्य मेटा-विश्लेषण में 71 अध्ययनों और 98,299 प्रतिभागियों के आंकड़ों में शॉर्ट-वीडियो के ज्यादा इस्तेमाल का संबंध कमजोर संज्ञानात्मक क्षमता से मिला, खासकर ध्यान और आवेग-नियंत्रण से। पर यह भी सच है कि ज्यादातर अध्ययन (87%) सहसंबंध वाले थे। यानी संबंध दिखता है, पर यह पक्का नहीं कि शॉर्ट वीडियो ही ध्यान घटाते हैं, या कम ध्यान वाले लोग ही ज्यादा शॉर्ट वीडियो देखते हैं।

टीवी की स्क्रीन भी जुड़ी

ओरमैक्स के अनुसार भारत में कनेक्टेड टीवी दर्शक 60% बढ़कर 20.69 करोड़ हो गए हैं, जबकि पिछले साल यह संख्या 12.92 करोड़ थी। रिपोर्ट के मुताबिक सक्रिय पेड ओटीटी सब्सक्रिप्शन 14.8 करोड़ से बढ़कर 17.3 करोड़ (करीब 17.26 करोड़) हो गए हैं, यानी 16% की बढ़त। ये सब्सक्रिप्शन की गिनती है, अलग-अलग लोगों की नहीं।

ध्यान की कारोबारी कीमत

दर्शकों के हर घंटे के पीछे विज्ञापन का बाजार है। अमेरिकी इंटरएक्टिव एडवरटाइजिंग ब्यूरो (आईएबी) और पीडब्ल्यूसी की रिपोर्ट के मुताबिक 2025 में सोशल मीडिया विज्ञापन से 117.7 अरब डॉलर का राजस्व आया, जो साल भर में 32.6% बढ़ा। इसी रिपोर्ट में डिजिटल वीडियो विज्ञापन 25.4% बढ़कर 78 अरब डॉलर हो गया।

हालांकि ये आंकड़े अमेरिकी बाजार के हैं, वैश्विक नहीं। IAB के अनुसार सोशल विज्ञापन कुल डिजिटल विज्ञापन राजस्व का करीब 40% है। कंपनियों की कमाई में यह साफ दिखता है। मेटा के 10-के फाइलिंग के मुताबिक 2025 में उसका विज्ञापन राजस्व करीब 196.2 अरब डॉलर रहा, जो पिछले साल से 22% ज्यादा है, और इस बढ़त की वजह विज्ञापन इंप्रेशन में 12% और प्रति विज्ञापन औसत कीमत में 9% की वृद्धि रही।