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चांद-मंगल पर बनेगा ‘भारतीय घर’: शुभांशु शुक्ला ने दुनिया के सामने रखा IIS का हैबिटेट प्रोजेक्ट

चांद और मंगल पर इंसानी बस्तियां बसाने के इरादे को आगे बढ़ाते हुए भारतीय वैज्ञानिकों ने 'स्वदेशी हैबिटेट मॉडल' तैयार किया है। आइए जानते हैं, यह मॉडल क्या है और कैसे काम करेगा?
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Sep 03, 2026
modular homes on the moon and Mars
सांकेतिक इमेज (Chatgpt)

चांद और मंगल ग्रह पर भविष्य में मानव बस्तियां बसाने के भारत के महत्वाकांक्षी इरादे को एक नई दिशा मिली है। भारतीय अंतरिक्ष यात्री शुभांशु शुक्ला ने हाल ही में सोशल मीडिया पर एक वीडियो साझा कर भारतीय विज्ञान संस्थान (IIS), बेंगलूरु की आलोक लैब में विकसित एक स्वदेशी अंतरिक्ष-आवास डिजाइन को दुनिया के सामने पेश किया।

क्या है प्रोजेक्ट?


भारतीय अंतरिक्ष यात्री शुभांशु शुक्ला ने 1 सितंबर 2026 को अपने 'X' अकाउंट पर पोस्ट करके इस प्रोजेक्ट की जानकारी दी थी। शुभांशु शुक्ला ने इसे "B.H.E.E.M." बताया है, जिसका पूरा नाम "भारतीय रहने योग्य, विस्तार योग्य, अलौकिक आवास" है।

कैसे बना यह प्रोजेक्ट?


शुभांशु शुक्ला ने अपने पोस्ट में बताया कि रूस में एक्सिओम-4 मिशन की ट्रेनिंग पूरी करने के बाद जब वे भारत लौटे तो उनकी अंतरिक्ष यात्री ट्रेनिंग के भारतीय चरण में लॉन्च व्हीकल और ऑर्बिटल मॉड्यूल की प्रणालियों को सीखने के साथ-साथ एक अकादमिक शोध कार्य भी शामिल था। इसमें उन्हें भविष्य के अंतरिक्ष अन्वेषण से जुड़ा कोई विषय चुनने और उस पर गहराई से काम करने का मौका दिया गया।

शुक्ला ने बताया कि उन्होंने इस मौके पर सिर्फ उस अंतरिक्ष यान के बारे में सोचने के बजाय, यह सोचना शुरू किया कि इंसान चांद या मंगल पर उतरने के बाद आखिर रहेंगे कहां। इसी सोच का नतीजा IISc बेंगलूरु की आलोक लैब में तैयार हुआ यह हैबिटेट कॉन्सेप्ट है।

डिजाइन-कॉन्सेप्ट चरण में है 'B.H.E.E.M.'

यह प्रोजेक्ट अभी डिजाइन-कॉन्सेप्ट चरण में ही है। किसी वास्तविक अंतरिक्ष आवास के रूप में बदलने से पहले इसे सामग्री की मजबूती, लाइफ-सपोर्ट सिस्टम और रेडिएशन सुरक्षा जैसे कई कठोर परीक्षणों से गुजरना होगा। इस डिजाइन की एक अहम खूबी इसकी मरम्मत-क्षमता बताई गई है। अगर कोई पैनल क्षतिग्रस्त होता है तो पूरे ढांचे को बदलने के बजाय सिर्फ उसी हिस्से को ठीक किया जा सकता है या बदला जा सकता है।

मॉड्यूलर पैनल से बनेगा 'घर'


रिपोर्ट के अनुसार, इस हैबिटेट को छोटे त्रिकोण, वर्ग और पंचकोणीय आकार के पैनलों से डिजाइन किया गया है। इन हल्के और कॉम्पैक्ट पैनलों को रॉकेट के भीतर आसानी से ले जाया जा सकता है, और गंतव्य पर पहुंचने के बाद इन्हें आपस में जोड़कर दबावयुक्त और रहने-योग्य कमरे बनाए जा सकते हैं। यानी निर्माण सामग्री धरती से भेजी जाएगी, लेकिन असली "घर" चांद या मंगल की सतह पर ही आकार लेगा।

यह तरीका पूरी संरचना को एक साथ भेजने के मुकाबले कहीं ज्यादा व्यावहारिक और किफायती माना जा रहा है। इसे स्पेसएक्स के स्टारशिप जैसे बड़े रॉकेट की पेलोड क्षमता को ध्यान में रखकर विकसित किया गया है। यह एक ही मिशन में तैयार हैबिटेट अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) के मुकाबले करीब दोगुने रहने-योग्य स्थान की क्षमता दे सकता है।

हैबिटेट प्रोजेक्ट के लिए चुनौती

शुभांशु शुक्ला ने अपने पोस्ट में यह भी साफ किया कि चांद, मंगल या किसी अन्य अंतरिक्ष गंतव्य पर इंसानों की स्थायी मौजूदगी कायम होने से पहले अब भी कई बड़ी चुनौतियां हल होनी बाकी हैं। रेडिएशन और अत्यधिक तापमान से लेकर जीवन-रक्षक प्रणालियों, ऊर्जा और निर्माण जैसी बुनियादी जरूरतों तक कई चुनौतियां सामने आएंगी। शुभांशु ने कहा कि 20 साल बाद इंसानों को धरती से परे बसाना है तो उसकी तैयारी 20 साल बाद शुरू नहीं की जा सकती। किसी दूसरी दुनिया में घर बनाने की दिशा में पहला कदम शायद पहली ईंट रखना नहीं, बल्कि यह कल्पना करने की हिम्मत जुटाना है कि वह घर आखिर कैसा दिखेगा।

Updated on:
03 Sept 2026 08:37 pm
Published on:
03 Sept 2026 08:37 pm