
Oil crisis heightens tension: तेल संकट ने भारत की उपभोक्ता दुनिया में हलचल मचा दी है, जहां एक ओर सरकार ने कीमतों को नियंत्रित करने की कोशिश की, वहीं दूसरी ओर घरेलू बजट पर असर साफ दिखने लगा है। इस लेख में हम समझेंगे कि यह संकट कैसे आपके रोजमर्रा के खर्चों को प्रभावित कर रहा है और आगे क्या हो सकता है।
तेल की बढ़ती कीमतें सिर्फ पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं रहीं। इससे रोजमर्रा की चीजें जैसे साबुन, टूथपेस्ट, खाद्य सामग्री, पैकेजिंग और घरेलू सामान महंगे हो रहे हैं। पेट्रोल-डीजल की कीमतों में वृद्धि ने परिवहन, हवाई यात्रा और माल ढुलाई की लागत बढ़ा दी है। इसके असर से उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों में धीरे-धीरे इजाफा हो रहा है।
सरकार ने रिटेल ईंधन की कीमतों को सीधे बढ़ने से रोका। मार्च 2026 में केंद्रीय उत्पाद शुल्क को 10 से घटाकर 3 प्रति लीटर कर दिया गया, जिससे उपभोक्ताओं पर असर कम हुआ।
अप्रैल में थोक स्तर पर तेल और गैस की कीमतों में तेज वृद्धि हुई है। WPI में क्रूड पेट्रोलियम और गैस की महंगाई दर 67.2% तक पहुंच गई, जबकि ऊर्जा महंगाई 24.7% रही। हालांकि, CPI में सीधे असर सीमित रहा। मार्च में तेल उत्पादों की महंगाई सिर्फ 0.11% रही।
लेकिन मई से धीरे-धीरे रिटेल कीमतों में बढ़ोतरी शुरू हुई। पेट्रोल और डीजल की कीमतों में चार बार वृद्धि हुई। इससे गैसोलीन की कीमत लगभग 8% बढ़ी। फिर भी भारत अन्य देशों की तुलना में कम प्रभावित रहा।
15 मई 2026 को पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 3 प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई। दिल्ली में पेट्रोल 97.77 और डीजल 90.67 प्रति लीटर हो गया।
LPG सिलेंडर की कीमतों में भी असर दिखा। कुछ रिपोर्टों में काले बाजार में सिलेंडर की कीमत 1,000 से बढ़कर 3,000 रुपए हो गई है। हालांकि, सरकार ने सब्सिडी के तहत घरेलू LPG की कीमतों को 613 (14.2 किलोग्राम सिलेंडर, दिल्ली) तक नियंत्रित रखा, जबकि बाजार मूल्य लगभग 987 था। इस तरह, 134 के संभावित बढ़ोतरी में से 74 सरकार ने वहन किया। इससे एक सामान्य परिवार पर प्रतिदिन 80 पैसे से कम का अतिरिक्त बोझ पड़ा।
तेल संकट ने रुपए पर भी दबाव डाला। फरवरी 2026 से अब तक रुपए की गिरावट 6% से अधिक रही, जिससे आयात महंगा हुआ और घरेलू महंगाई को बढ़ावा मिला। भारत अपनी तेल जरूरत का लगभग 90% आयात करता है, इसलिए कमजोर रुपए और ऊंचे तेल दाम मिलकर महंगाई को और तेज कर रहे हैं।
एक सर्वे में पता चला कि 9 में से 10 भारतीय परिवार खर्चों में कटौती करने की योजना बना रहे हैं। वे जरूरी चीजों पर ही खर्च बढ़ा रहे हैं और ईंधन-कुशल विकल्पों जैसे इलेक्ट्रिक स्कूटर या बाइक की ओर रुख कर रहे हैं। प्रधानमंत्री ने भी जनता से सार्वजनिक परिवहन, कारपूलिंग और घरेलू बचत को 'देशभक्ति' बताया है।
तेल संकट ने लॉजिस्टिक्स, पैकेजिंग, उपभोक्ता वस्तुओं, निर्माण और कृषि जैसे कई क्षेत्रों को प्रभावित किया है। Observer Research Foundation की रिपोर्ट बताती है कि होर्मुज जलडमरूमध्य में संकट ने शिपिंग, बीमा और आयात लागत बढ़ा दी है, जिससे उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों में व्यापक असर हुआ है।
अगर तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहीं, तो थोक स्तर की लागत उपभोक्ताओं तक पहुंचने लगेंगी और CPI में और वृद्धि हो सकती है। एक विश्लेषण के अनुसार, अगर FY27 में कच्चे तेल की औसत कीमत 120 रुपए प्रति बैरल रही, तो भारत की GDP वृद्धि दर लगभग 6% तक गिर सकती है और CPI आधारित मुद्रास्फीति 6% तक पहुंच सकती है।
सरकार ने कुछ उपाय भी शुरू किए हैं। इनमें ईंधन में 20% एथेनॉल मिश्रण, चार दिन का कार्य सप्ताह और घरेलू गैस उत्पादन बढ़ाना। ये कदम संकट को कुछ हद तक कम करने में मदद कर सकते हैं।
तेल संकट का असर आपके घर के बजट पर सीधे और धीरे-धीरे दोनों तरह से पड़ रहा है। चाहे वह पेट्रोल-डीजल हो, खाना हो, घरेलू गैस हो या रोजमर्रा की चीजें। सरकार ने कुछ राहत दी है, लेकिन अगर तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहीं, तो खर्च बढ़ना तय है। ऐसे में बचत, ईंधन-कुशल विकल्प और सार्वजनिक परिवहन का उपयोग आपके लिए और भी महत्वपूर्ण हो गया है।
अब आपको रहना होगा तैयार, जरा अपने मासिक बजट पर नजर रखें। ईंधन बचाने के उपाय अपनाएं। इनमें कारपूलिंग, सार्वजनिक परिवहन या इलेक्ट्रिक वाहन। घरेलू गैस की खपत में बचत करें। वहीं अगर आप व्यवसायी हैं, तो लॉजिस्टिक्स और इनपुट लागत पर विशेष ध्यान दें।
तेल संकट ने भारतीय उपभोक्ता बाजार में एक हलचल पैदा कर दी है। यह सिर्फ एक आर्थिक घटना नहीं, बल्कि आपके रोजमर्रा के जीवन की कहानी भी है।