
सांकेतिक इमेज (सोर्स- Chatgpt)
दक्षिण-पश्चिम मानसून 2026 अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंच चुका है, लेकिन इस बार बारिश का वितरण बुरी तरह असंतुलित रहा। देश का करीब 35% हिस्सा और 348 जिले सामान्य से कम बारिश झेल रहे हैं। दूसरी ओर ओडिशा, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, असम-मेघालय, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में बाढ़ और भूस्खलन का खतरा मंडरा रहा है। भारत मौसम विज्ञान विभाग के आंकड़ों के अनुसार, 1 जून से 30 अगस्त तक देश में 597.6 मिमी बारिश दर्ज हुई, जबकि इस अवधि की सामान्य बारिश 693.9 मिमी होती है। यानी सीजन अब तक करीब 14% बारिश कम हुई है।
IMD के आंकड़े बताते हैं कि मानसून की चाल शुरू से ही डगमगाई रही। जून में सामान्य 165.3 मिमी की तुलना में सिर्फ 106.8 मिमी बारिश हुई। यानी 35.4% की भारी कमी, जिसने खरीफ की बुवाई में देरी की नींव रख दी। जुलाई ने कुछ राहत दी और 280.5 मिमी के सामान्य स्तर के मुकाबले 290.3 मिमी बारिश हुई, यानी 3.5% अधिक। लेकिन अगस्त में फिर झटका लगा, 248.1 मिमी की सामान्य बारिश के बदले सिर्फ 207.8 मिमी बारिश हुई। यानी बारिश की कमी 16.2% रही। नतीजतन 3 महीनों का संचयी घाटा करीब 14% पर आ टिका है।
IMD पहले ही जून-सितंबर 2026 के पूरे सीजन के लिए दीर्घावधि औसत के 90% ±4% बारिश का अनुमान जता चुका था। जुलाई के अंत में जारी दूसरे चरण के पूर्वानुमान में विभाग ने अगस्त-सितंबर की संयुक्त अवधि में भी बारिश के एलपीए के 94% से नीचे रहने की आशंका जताई थी। यानी विभाग को शुरू से ही सीजन के उत्तरार्ध में कमजोर बारिश का अंदेशा था, जो अगस्त के आंकड़ों में सही साबित हुआ।
एक तरफ बंगाल की खाड़ी में बनने वाली नई मौसम प्रणालियों और पश्चिमी विक्षोभ के असर से कई राज्यों में बारिश की कमी की कुछ भरपाई होने की उम्मीद है। दूसरी तरफ ओडिशा, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, असम-मेघालय, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश जैसे पहाड़ी और नदी-प्रधान क्षेत्रों में भारी बारिश से बाढ़ और भूस्खलन का जोखिम बढ़ सकता है।
पिछले एक दशक के रुझान भी दिलचस्प संकेत देते हैं। साल 2016 से 2025 के बीच सात वर्षों में सितंबर की बारिश सामान्य से अधिक रही (सबसे ज्यादा 2021 में 30% अधिक), जबकि 3 वर्षों (2016, 2018, 2023) में यह सामान्य से कम रही। यानी ऐतिहासिक रूप से सितंबर अक्सर मानसून के घाटे की भरपाई करने वाला महीना साबित हुआ है, हालांकि इस बार का पूर्वानुमान सतर्क करने वाला है।
केंद्रीय जल आयोग की निगरानी वाले देश के 166 प्रमुख जलाशयों में 20 अगस्त तक 117.773 अरब घन मीटर पानी था, जो कुल भंडारण क्षमता का 64.16% है। हालांकि, यह पिछले साल की समान अवधि से करीब 17.3% कम और सामान्य औसत भंडारण से भी लगभग 3% कम है। यानी मानसून ने जलाशयों को भरा जरूर है, पर स्थिति पिछले वर्षों जितनी मजबूत नहीं है।
कम बारिश का खेती पर असर भी साफ दिखा। कृषि मंत्रालय की 21 अगस्त की रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल खरीफ की कुल बुवाई 1056.70 लाख हेक्टेयर में हुई, जो पिछले वर्ष से 16.07 लाख हेक्टेयर कम है। सबसे ज्यादा झटका धान की खेती को लगा, जिसमें 13.19 लाख हेक्टेयर की कमी दर्ज हुई। मुख्यतः कर्नाटक, तेलंगाना, झारखंड और मध्य प्रदेश में, जबकि असम में बुवाई बढ़ी। विशेषज्ञों के अनुसार अब सितंबर की बारिश फसल की पैदावार और मिट्टी की नमी बनाए रखने के लिहाज से निर्णायक होगी।
मेघालय (58%), बिहार (40%), मणिपुर (43%), अरुणाचल प्रदेश (41%) और आंध्र प्रदेश (41%) उन राज्यों में शामिल हैं, जहां बारिश की कमी सबसे ज्यादा दर्ज हुई। राजस्थान में 19 जिले प्रभावित हैं। यहां सामान्य 368.3 मिमी के मुकाबले सिर्फ 282.6 मिमी बारिश हुई (23% कम), जिसमें जैसलमेर, बाड़मेर क्षेत्र का बालोतरा, जोधपुर संभाग के जालोर-पाली-सिरोही समेत हाड़ौती और मेवाड़ के कई जिले शामिल हैं।
मध्य प्रदेश में भी 16 जिलों में कमी और सिर्फ 4 जिलों (भिंड, निवाड़ी, सतना, मऊगंज) में सामान्य से अधिक बारिश हुई; राज्य का कुल घाटा 9% रहा। इसके उलट छत्तीसगढ़ अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में है। यहां 912.2 मिमी सामान्य के मुकाबले 896.1 मिमी बारिश हुई यानी सिर्फ 2% की कमी, और 14 जिलों में तो सामान्य से ज्यादा बारिश दर्ज हुई। इन आंकड़ों का मतलब है कि मानसून 2026 की तस्वीर दो सिरों वाली है।
Updated on:
31 Aug 2026 08:55 pm
Published on:
31 Aug 2026 08:55 pm
