
उम्र बढ़ने के साथ मानव शरीर में कई जैविक बदलाव आते हैं, जिनमें सबसे संवेदनशील बदलाव हड्डियों के घनत्व (Bone Density) में कमी आना है। 50 की उम्र पार करते ही हड्डियां अंदर से खोखली और कमजोर होने लगती हैं, जिसे चिकित्सकीय भाषा में ऑस्टियोपोरोसिस (Osteoporosis) या ओस्टियोपेनिया (Osteopenia) कहा जाता है। चूंकि यह स्थिति शुरुआत में बिना किसी स्पष्ट लक्षण के बढ़ती है, इसलिए इसे 'साइलेंट थीफ' (शांत चोर) भी कहा जाता है। बुजुर्गों में फ्रैक्चर का सबसे बड़ा कारण हड्डियों की यही कमजोरी और संतुलन बिगड़ने से गिरना है। सही पोषण, नियमित धूप, उचित व्यायाम और घरेलू सावधानियों को अपनाकर बुढ़ापे में भी हड्डियों को फौलादी और सक्रिय रखा जा सकता है।
हड्डियां जीवित ऊतक (living tissues) हैं, जिनमें पुरानी हड्डियों का क्षय और नई हड्डियों का निर्माण लगातार चलता रहता है। युवावस्था (लगभग 20 से 30 वर्ष की आयु) में पीक बोन मास (Peak Bone Mass) अधिकतम होता है। इसके बाद नई हड्डियों के बनने की गति पुरानी हड्डियों के नष्ट होने की दर से धीमी हो जाती है।
महिलाओं में मेनोपॉज (रजोनिवृत्ति) के बाद एस्ट्रोजन हार्मोन के स्तर में गिरावट के कारण हड्डियों का नुकसान तेजी से होता है। पुरुषों में भी टेस्टोस्टेरोन के स्तर में कमी और पोषण के अभाव के कारण 60 वर्ष के बाद हड्डियों का क्षरण तेज हो जाता है। यदि समय रहते ध्यान न दिया जाए, तो कूल्हे (Hip), रीढ़ की हड्डी (Spine) और कलाई (Wrist) में फ्रैक्चर का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
बुजुर्गों की ऊर्जा की आवश्यकता (कैलोरी की जरूरत) कम हो जाती है, लेकिन सूक्ष्म पोषक तत्वों (माइक्रोन्यूट्रिएंट्स) की मांग बढ़ जाती है। हड्डियों की मजबूती के लिए केवल पेट भरना पर्याप्त नहीं है, बल्कि भोजन में लक्षित पोषक तत्वों की मौजूदगी अनिवार्य है:
भारत जैसे धूप वाले देश में भी बुजुर्गों में विटामिन D की कमी बहुत व्यापक है, क्योंकि उम्र बढ़ने के साथ त्वचा की धूप से विटामिन D संश्लेषित करने की क्षमता कम हो जाती है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) 65 वर्ष और उससे अधिक उम्र के वयस्कों को सप्ताह में कम से कम 150 से 300 मिनट की मध्यम तीव्रता वाली शारीरिक गतिविधि करने की सलाह देता है। हड्डियों की सेहत के लिए व्यायाम को तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है:
बुढ़ापे में 90% से अधिक हिप फ्रैक्चर गिरने के कारण होते हैं। फ्रैक्चर की रोकथाम का आधा हिस्सा गिरने से बचाव पर निर्भर करता है:
हड्डियों के स्वास्थ्य का सटीक मूल्यांकन करने के लिए बोन मिनरल डेंसिटी (BMD) टेस्ट, जिसे DEXA स्कैन कहा जाता है, सबसे प्रामाणिक माध्यम है।
ICMR ने 20–29 वर्ष के स्वस्थ भारतीय वयस्कों के आधार पर पीक बोन मिनरल डेंसिटी (PBMD) के संदर्भ मानक स्थापित किए हैं। जांच रिपोर्ट में मिलने वाले T-Score का वर्गीकरण इस प्रकार है।
यदि लगातार पीठ दर्द, कूल्हे या घुटनों में तेज दर्द, ऊंचाई में कमी (रीढ़ की हड्डियों के दबने से), झुककर चलने की स्थिति बन रही हो, या बिना किसी बड़े आघात के मामूली झटके से फ्रैक्चर हो गया हो, तो तुरंत ऑर्थोपेडिक या एंडोक्रिनोलॉजिस्ट विशेषज्ञ से परामर्श लें।
हड्डियों की सेहत एक दिन का काम नहीं, बल्कि जीवनशैली का हिस्सा है। रोजाना 20 मिनट की धूप, ताजी सब्जियों व डेयरी उत्पादों से युक्त आहार, 30 मिनट की सैर और सुरक्षित वातावरण अपनाकर आप लंबी उम्र तक बिना किसी सहारे के आत्मनिर्भर और गतिशील जीवन जी सकते हैं।