
सांकेतिक इमेज (सोर्स-ChatGpt)
घर हो, गाड़ी हो या हाथ में नया स्मार्टफोन…आज के समय में हर जरूरत के लिए ऋण लेना काफी आसान हो गया है। कुछ ही मिनटों में ऑनलाइन प्रोसेस और चंद आसान चरण को फॉलो करने के बाद झटपट लोन मिल जाता है। इसी आसान क्रेडिट का नतीजा है कि देश में करोड़ों लोग अब किसी न किसी रूप में EMI चुका रहे हैं।
वित्त मंत्रालय द्वारा संसद में पेश किए गए ट्रांसयूनियन सिबिल (TransUnion CIBIL) के आंकड़ों के मुताबिक, मार्च 2025 तक देश में 28 करोड़ से ज्यादा यूनिक व्यक्तिगत उधारकर्ता दर्ज किए गए थे। यानी देश की एक बड़ी आबादी औपचारिक बैंकिंग सिस्टम से कर्ज लेकर अपनी जरूरतें पूरी कर रही है। ऐसी स्थिति में सवाल उठना लाजिमी है कि क्या EMI अब भारतीयों की जिंदगी की आदत बन चुकी है?
आंकड़ों में सबसे चौंकाने वाला रुझान उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों से आ रहा है। इन राज्यों में लोन लेने वालों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। जिन राज्यों को परंपरागत रूप से कम आय और कम बैंकिंग पहुंच वाला माना जाता रहा है। वहां अब डिजिटल फाइनेंसिंग, इंस्टेंट पर्सनल लोन ऐप्स और आसान बैंकिंग पहुंच ने कर्ज लेने की झिझक को काफी हद तक खत्म कर दिया है।
छोटे शहरों और कस्बों में मोबाइल, बाइक और कंज्यूमर ड्यूरेबल्स की EMI पर बिक्री तेजी से बढ़ी है। फेस्टिव सीजन में कर्ज लेने वालों की संख्या में उछाल देखने को मिलता है। एक दौर था, जब कर्ज लेना सामाजिक रूप से अच्छा नहीं माना जाता था, लेकिन डिजिटल प्रक्रिया और मोबाइल एप्स के जरिए मिनटों में मिलने वाले लोन ने इस सोच को पूरी तरह बदल दिया है।
रिपोर्ट के मुताबिक घर, गाड़ी और फोन जैसी चीजों के लिए लोन लेने वालों में औसतन हर शख्स पर करीब 4.77 लाख रुपए का कर्ज है। यह आंकड़ा बताता है कि अब कर्ज सिर्फ घर खरीदने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि गाड़ी और गैजेट्स जैसी जरूरतों के लिए भी लोग बड़ी रकम उधार ले रहे हैं।
RBI की फाइनेंशियल स्टेबिलिटी रिपोर्ट के मुताबिक कुल घरेलू उधारी का 58.4 प्रतिशत हिस्सा अब गैर-हाउसिंग रिटेल लोन का है। इसका मतलब है कि आधे से ज्यादा कर्ज घर बनाने के बजाय पर्सनल लोन, वाहन, कंज्यूमर ड्यूरेबल और मोबाइल की EMI जैसे खर्चों में जा रहा है। पहले लोग जीवन भर की बचत के बाद या होम लोन लेकर सिर्फ घर के लिए सबसे बड़ा कर्ज लेते थे, लेकिन अब यह तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है।
वित्त मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक 28 करोड़ से ज्यादा भारतीयों ने किसी न किसी तरह का औपचारिक कर्ज लिया है। आंकड़े बताते हैं कि साल 2017 में देश की क्रेडिट-योग्य आबादी का केवल 35 प्रतिशत हिस्सा ही बैंकों या NBFC से लोन लेता था, जो मार्च 2026 तक बढ़कर करीब 74 प्रतिशत तक पहुंच गया है। यानी आज हर 4 में से 3 क्रेडिट-योग्य भारतीय फॉर्मल लोन सिस्टम से जुड़ चुके हैं। बाय-नाउ-पे-लेटर (BNPL), जीरो-कॉस्ट EMI और इंस्टेंट पर्सनल लोन ऐप्स ने लोगों की खर्च करने की क्षमता को समय से पहले बढ़ा दिया है, जिससे क्रेडिट का यह दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है।
मार्च 2026 तक देश में कुल व्यक्तिगत बैंक ऋण बढ़कर 69.39 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गया है। यह बढ़ोतरी दिखाती है कि पर्सनल और रिटेल लोन का बाजार किस रफ्तार से फैल रहा है। घरेलू कर्ज अब जीडीपी के करीब 45.5 प्रतिशत तक पहुंच चुका है, जो अर्थशास्त्रियों के बीच बहस का विषय बना हुआ है। इसका एक पहलू सकारात्मक है- यह वित्तीय समावेशन और बैंकिंग व्यवस्था की गहरी पहुंच को दिखाता है। जिससे लोगों को अनौपचारिक साहूकारों के चक्कर नहीं काटने पड़ते।
दूसरा पहलू चिंताजनक भी है। अगर किसी परिवार की आय में अचानक रुकावट आती है, नौकरी पर असर पड़ता है, या रिजर्व बैंक ब्याज दरों में बढ़ोतरी करता है, तो भारी-भरकम EMI चुकाना मुश्किल हो सकता है। रोजमर्रा के उपभोग के लिए जरूरत से ज्यादा कर्ज लेना परिवारों को बचत से दूर कर एक स्थायी वित्तीय चक्रव्यूह में धकेल सकता है।
रिजर्व बैंक ने हाल के महीनों में असुरक्षित रिटेल लोन (अनसिक्योर्ड लोन) और पर्सनल लोन को लेकर नियमों को पहले से अधिक सख्त कर दिया है। डिजिटल NBFC के जरिए दिए जाने वाले छोटे टिकट साइज के लोन की संख्या में भी तेज उछाल देखा गया है, जिनमें युवा और पहली बार कर्ज लेने वाले उधारकर्ताओं की हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है। विशेषज्ञ मानते हैं कि EMI पर बढ़ती निर्भरता तकनीक और आसान क्रेडिट पहुंच का स्वाभाविक नतीजा है, लेकिन अगर परिवार अपनी आय का बड़ा हिस्सा किस्तों में खर्च करने लगें और बचत लगभग शून्य हो जाए, तो यह आर्थिक स्थिरता के लिए जोखिम भरा साबित हो सकता है। आंकड़े साफ इशारा करते हैं कि भारतीय मिडिल क्लास की आर्थिक आदतें अब पूरी तरह बदल चुकी हैं।
Updated on:
21 Aug 2026 04:38 pm
Published on:
21 Aug 2026 04:38 pm
