
Phoolan Devi Vikram Mallah : फूलनदेवी और विक्रम मल्लाह की कहानी, PC- Chatgpt
चंबल के बीहड़। गहरी खाइयां, कंटीली झाड़ियां और दूर-दूर तक फैली सुनसान जमीन। 1980 के आसपास उत्तर प्रदेश का यह इलाका पुलिस के लिए जितना मुश्किल था, डकैतों के लिए उतना ही सुरक्षित ठिकाना।
इन्हीं बीहड़ों में उस समय कई डकैत गिरोह सक्रिय थे। बंदूक के दम पर गांवों में डर कायम था। अपहरण, फिरौती, लूट और पुरानी दुश्मनियों का बदला-अपराध का यह चक्र लगातार चलता रहता था। इसी माहौल में एक महिला का नाम तेजी से उभर रहा था-फूलन देवी। लेकिन, फूलन देवी की कहानी को समझने के लिए सिर्फ उन्हें देखना काफी नहीं है। इसके पीछे एक और नाम था-विक्रम मल्लाह। 1980 के आसपास दोनों की जोड़ी चंबल के अपराध जगत में अपनी पहचान बना रही थी।
फूलन देवी का जन्म उत्तर प्रदेश के जालौन जिले के गोरहा का पुरवा गांव में हुआ था। परिवार आर्थिक रूप से कमजोर था और जमीन को लेकर विवाद भी था। कम उम्र में उनकी शादी उनसे काफी बड़े व्यक्ति से कर दी गई। इसके बाद उनके जीवन में कई ऐसी घटनाएं हुईं, जिनका जिक्र बाद में उनकी आत्मकथा और उनके जीवन पर लिखी गई किताबों में मिलता है।
1970 के दशक के अंत तक फूलन का संपर्क डकैत गिरोहों से हो चुका था। यहीं से उनकी जिंदगी ने वह मोड़ लिया, जिसने उन्हें आगे चलकर पूरे देश में चर्चित कर दिया।
चंबल के इसी अपराध जगत में उनकी मुलाकात विक्रम मल्लाह से हुई। विक्रम मल्लाह उस समय के डकैत गिरोह में तेजी से अपनी जगह बना रहा था। वह नाव चलाने और नदी के रास्तों की जानकारी रखने वाले मल्लाह समुदाय से आता था और बीहड़ के भूगोल से अच्छी तरह परिचित था।
फूलन और विक्रम की नजदीकी बढ़ी और दोनों गिरोह की गतिविधियों में साथ नजर आने लगे। कई विवरणों के मुताबिक, विक्रम ने फूलन को बंदूक चलाने और बीहड़ में गिरोह के साथ रहने के तौर-तरीके सिखाए।
यहीं से फूलन की पहचान एक ऐसी महिला के रूप में बनने लगी, जो सिर्फ गिरोह के साथ चलने वाली सदस्य नहीं थी, बल्कि खुद हथियार उठाकर कार्रवाई करने लगी थी।
चंबल की अपराध दुनिया बाहर से भले एक जैसी दिखाई देती हो, लेकिन उसके भीतर भी जाति और वर्चस्व की लड़ाई मौजूद थी। जिस गिरोह से फूलन और विक्रम जुड़े थे, उसमें ठाकुर डकैतों का प्रभाव था। विक्रम मल्लाह का बढ़ता प्रभाव इस सत्ता-संतुलन को चुनौती दे रहा था। यहीं से गिरोह के भीतर तनाव बढ़ने लगा।
फूलन की कहानी में बाबू गुर्जर, श्रीराम और लाला राम जैसे नाम इसी दौर से जुड़े मिलते हैं। इन घटनाओं के विवरण अलग-अलग स्रोतों में अलग हैं, लेकिन इतना तय है कि गिरोह के भीतर संघर्ष धीरे-धीरे हिंसक होता गया।
1980 तक फूलन देवी की जिंदगी पूरी तरह बदल चुकी थी। अब वह गांव की सीमाओं में रहने वाली महिला नहीं थीं। वह बीहड़ में हथियार लेकर घूमने वाले गिरोह का हिस्सा थीं। विक्रम के साथ उनकी जोड़ी ने उन्हें गिरोह के भीतर एक अलग पहचान दी। लेकिन बीहड़ की यह दुनिया किसी फिल्म की तरह रोमांचक नहीं थी। यहां हर दिन खतरा था।
पुलिस का डर था। दूसरे गिरोहों का डर था। मुखबिरी का डर था और सबसे बड़ा डर था- गिरोह के भीतर होने वाली सत्ता की लड़ाई।
1980 के दशक में चंबल के बीहड़ पुलिस के लिए बड़ी चुनौती थे। यमुना और चंबल के आसपास की जमीन गहरी खाइयों और ऊबड़-खाबड़ रास्तों से भरी थी। कई जगहों पर सामान्य वाहन पहुंचना मुश्किल था। डकैतों को इलाके की हर पगडंडी और रास्ते की जानकारी होती थी। गांवों में उनके मुखबिर थे। पुलिस की गतिविधि की खबर उन्हें जल्दी मिल जाती थी। यही वजह थी कि डकैत गिरोह सिर्फ जंगलों में छिपे अपराधी नहीं थे। कई इलाकों में उनका अपना नेटवर्क था।
फूलन और विक्रम की जोड़ी ज्यादा समय तक नहीं चल सकी। गिरोह के भीतर चल रही वर्चस्व की लड़ाई ने हिंसक रूप ले लिया और विक्रम मल्लाह की हत्या कर दी गई। विक्रम की मौत फूलन की जिंदगी का निर्णायक मोड़ बनी।
इसके बाद फूलन दूसरे गिरोह के कब्जे में चली गईं। आगे उनके साथ जो हुआ, उसने उनकी कहानी को और ज्यादा हिंसक बना दिया। यहीं से वह घटनाक्रम शुरू हुआ, जो कुछ ही समय बाद बेहमई तक पहुंचा।
1980 की कहानी यहीं खत्म नहीं होती… फूलन देवी की कहानी को सिर्फ 'डकैत बनी महिला' कहकर खत्म करना आसान है। लेकिन 1980 का यह अध्याय इससे कहीं बड़ा है। इसके पीछे था-
विक्रम मल्लाह की मौत के बाद कहानी ने जिस रास्ते पर कदम रखा, उसने अगले ही साल यूपी के अपराध इतिहास का सबसे चर्चित अध्याय लिख दिया।
Updated on:
21 Aug 2026 05:41 pm
Published on:
21 Aug 2026 05:34 pm
