
प्याज और लहसुन की खेती में अच्छी किस्म के बीज, सही समय पर बुवाई और वैज्ञानिक तकनीक अपनाने से उत्पादन और गुणवत्ता दोनों बेहतर हो सकते हैं। कई राज्यों में किसानों को बीज या खेती की लागत पर अनुदान भी दिया जा रहा है। हालांकि, इसे हर जगह ‘मुफ्त बीज’ कहना सही नहीं होगा, क्योंकि योजना के अनुसार सहायता की राशि और किसान का हिस्सा अलग-अलग हो सकता है। ऐसे में किसान को अपने जिले की मौजूदा योजना और पात्रता की जानकारी जरूर लेनी चाहिए।
उत्तर प्रदेश के झांसी जिले में 2026 में प्याज और लहसुन की खेती को बढ़ावा देने के लिए 75% तक अनुदान की योजना शुरू की गई। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, औद्यानिक विकास योजना के तहत अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के किसानों के लिए प्याज और लहसुन की खेती का लक्ष्य तय किया गया है।
योजना में लहसुन के लिए प्रति हेक्टेयर ₹1 लाख की अनुमानित लागत पर अधिकतम ₹75,000 और प्याज के लिए ₹50,000 की लागत पर अधिकतम ₹37,500 अनुदान का प्रावधान बताया गया है। झांसी में 19 हेक्टेयर का लक्ष्य रखा गया था, जिसमें 4 हेक्टेयर लहसुन और 15 हेक्टेयर प्याज शामिल है। आवेदन किसान साथी पोर्टल या नजदीकी जन सुविधा केंद्र के माध्यम से किया जा सकता है।
बिहार सरकार की 2025-26 सब्जी विकास योजना में रबी प्याज बीज वितरण को भी शामिल किया गया है। आधिकारिक योजना के अनुसार, प्याज बीज पर इकाई लागत का 75% सहायतानुदान दिया जाता है। बीज की उपलब्धता बिहार राज्य बीज निगम के माध्यम से कराई जाती है। किसानों के लिए न्यूनतम 0.25 एकड़ और अधिकतम 2.5 एकड़ तक बीज सहायता का प्रावधान है।
बिहार में खरीफ प्याज के क्षेत्र विस्तार की अलग योजना में प्रति हेक्टेयर 10 किलोग्राम बीज दर और ₹24,500 की अनुमानित इकाई लागत पर 75% यानी ₹18,375 प्रति हेक्टेयर सहायता का प्रावधान किया गया था।
इसलिए किसान ‘मुफ्त बीज’ की बजाय ‘अनुदानित बीज’ शब्द को समझें। योजना की शर्तों के अनुसार किसान को बीज मुफ्त मिल सकता है या उसकी लागत का बड़ा हिस्सा सरकार वहन कर सकती है।
प्याज की खेती में मौसम के अनुसार बुवाई का समय बदलता है। रबी प्याज के लिए सामान्यतः सितंबर से नवंबर के बीच नर्सरी और रोपाई का समय क्षेत्र एवं किस्म के अनुसार तय किया जाता है। इसलिए स्थानीय कृषि विश्वविद्यालय या कृषि विज्ञान केंद्र की सलाह को प्राथमिकता देना बेहतर है।
रोपाई के दौरान सामान्यतः करीब 15 सेमी कतार दूरी और 10 सेमी पौध दूरी रखी जाती है। बहुत अधिक घनी रोपाई से कंद का आकार प्रभावित हो सकता है।
खेत में अच्छी तरह सड़ी हुई जैविक खाद का इस्तेमाल करें और उर्वरक की मात्रा मिट्टी जांच तथा स्थानीय सिफारिश के आधार पर तय करें। एक ही मात्रा को हर खेत के लिए लागू करना सही नहीं है।
सिंचाई में खेत में लगातार पानी भरने से बचें। कंद बनने के दौरान पर्याप्त नमी जरूरी है, लेकिन जलभराव रोगों को बढ़ा सकता है। कटाई से कुछ समय पहले सिंचाई बंद करने से कंद की पकने और भंडारण क्षमता में मदद मिलती है।
लहसुन की बुवाई सामान्यतः सितंबर के अंत से अक्टूबर के दौरान की जाती है, लेकिन क्षेत्र और मौसम के अनुसार समय बदल सकता है। कलियों को स्वस्थ और रोगमुक्त बीज सामग्री से चुनना चाहिए।
लगभग 15 सेमी कतार दूरी और 7.5–10 सेमी के आसपास कली दूरी कई उत्पादन सिफारिशों में इस्तेमाल होती है। कलियों को बहुत गहरा लगाने से अंकुरण और पौधे की वृद्धि प्रभावित हो सकती है। सामान्यतः करीब 3–5 सेमी गहराई रखी जाती है और कली का नुकीला हिस्सा ऊपर की ओर रखा जाता है।
खेत की तैयारी में अच्छी तरह सड़ी गोबर की खाद उपयोगी हो सकती है। रासायनिक उर्वरकों की मात्रा मिट्टी जांच और क्षेत्रीय कृषि सिफारिश के अनुसार तय करें।
लहसुन की कलियों को बुवाई से पहले रोगमुक्त और स्वस्थ रखना बेहद जरूरी है। बीज उपचार के लिए स्थानीय कृषि विभाग, कृषि विज्ञान केंद्र या संबंधित कृषि विश्वविद्यालय द्वारा अनुशंसित दवा और मात्रा ही इस्तेमाल करें।
बिना विशेषज्ञ सलाह के अलग-अलग फफूंदनाशी और कीटनाशी को मिलाकर उपचार करना उचित नहीं है। दवा की मात्रा, उपचार की अवधि और सुरक्षा निर्देश हमेशा उत्पाद के लेबल तथा आधिकारिक कृषि सिफारिश के अनुसार रखें।
किस्म का चुनाव क्षेत्र, मौसम, बाजार और सिंचाई की उपलब्धता देखकर करना चाहिए। ICAR के अनुसार लहसुन की भीमा ओंकार किस्म 120–135 दिन में तैयार होती है और इसकी संभावित उपज 8–14 टन प्रति हेक्टेयर बताई गई है। इसे गुजरात, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली के लिए अनुशंसित किया गया है।
भीमा पर्पल भी लहसुन की प्रमुख किस्मों में शामिल है। ICAR के एक अध्ययन में इसके व्यावसायिक उत्पादन से किसानों को अच्छा आर्थिक लाभ मिलने की जानकारी दी गई है।
हालांकि, किसी किस्म की संभावित उपज को किसान की वास्तविक कमाई मानना सही नहीं होगा। मिट्टी, मौसम, सिंचाई, रोग-कीट, लागत और बाजार भाव के कारण वास्तविक उत्पादन और मुनाफा काफी अलग हो सकता है।
| उपाय | संभावित फायदा |
|---|---|
| अनुदानित बीज | शुरुआती लागत कम |
| प्रमाणित/गुणवत्तापूर्ण बीज | बेहतर अंकुरण और एकरूपता |
| सही दूरी | कंद के विकास के लिए पर्याप्त जगह |
| मिट्टी जांच | उर्वरक का संतुलित इस्तेमाल |
| नियंत्रित सिंचाई | पानी की बचत और जलभराव से बचाव |
| बीज उपचार | शुरुआती रोगों का जोखिम कम |
| उन्नत किस्म | क्षेत्र के अनुसार बेहतर उत्पादन की संभावना |
सबसे पहले अपने जिले के उद्यान या कृषि विभाग से पता करें कि प्याज और लहसुन पर इस समय कौन-सी योजना लागू है और आपका जिला उसके लक्ष्य में शामिल है या नहीं। योजना की पात्रता, क्षेत्र सीमा, दस्तावेज और आवेदन की अंतिम तारीख भी जांच लें।
इसके बाद कृषि विज्ञान केंद्र से अपने क्षेत्र के लिए उपयुक्त किस्म, बुवाई का समय, बीज दर, खाद और सिंचाई की सलाह लें। सरकारी अनुदान से लागत कम हो सकती है, लेकिन मुनाफा तभी बढ़ेगा जब किसान सही किस्म और वैज्ञानिक खेती के साथ उत्पादन की गुणवत्ता और बाजार को भी ध्यान में रखे।
प्याज और लहसुन की खेती में सरकारी अनुदान शुरुआती लागत का बोझ कम कर सकता है, लेकिन इसे ‘हर किसान के लिए मुफ्त बीज’ नहीं समझना चाहिए। सही योजना, गुणवत्तापूर्ण बीज, संतुलित खाद, उचित दूरी और वैज्ञानिक सिंचाई- इन सभी का संयोजन ही खेती को वास्तव में अधिक लाभदायक बना सकता है।