
AI Deepfake : डीपफेक वीडियो राजनीति पर भारी, PC- Chatgpt
राजनीति और तकनीक का मेल अब एक नए दौर में पहुंच चुका है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की मदद से बनाए या बदले गए वीडियो, तस्वीरें और आवाजें राजनीतिक प्रचार का हिस्सा बन रही हैं। समस्या तब पैदा होती है जब किसी नेता की आवाज या चेहरा ऐसी बात कहते हुए दिखाया जाता है, जो उन्होंने वास्तव में कही ही नहीं। यही वजह है कि डीपफेक अब केवल तकनीकी या मनोरंजन का विषय नहीं, बल्कि चुनावी भरोसे और लोकतांत्रिक संवाद की गंभीर चुनौती बन गया है।
जून 2026 में पंजाब में 40 सेकंड से छोटा एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें मुख्यमंत्री भगवंत मान और दूसरे नेताओं के बीच कथित बातचीत दिखाई गई। रिपोर्टों के अनुसार, वीडियो को लेकर राजनीतिक विवाद हुआ और AI के इस्तेमाल तथा उसकी प्रामाणिकता को लेकर दावे-प्रतिदावे सामने आए। यह मामला दिखाता है कि कुछ सेकंड का काल्पनिक वीडियो भी राजनीतिक बहस को प्रभावित कर सकता है।
बिहार के बांकीपुर उपचुनाव में भी AI को लेकर विवाद सामने आया। जनता दल (यूनाइटेड) की ओर से जारी एक 57 सेकंड के प्रचार वीडियो में नीतीश कुमार NDA उम्मीदवार के समर्थन की अपील करते दिखे। जन सुराज के प्रशांत किशोर ने वीडियो को AI-निर्मित और डीपफेक बताया। इसके बाद जेडीयू नेता नीरज कुमार ने उनके खिलाफ पुलिस शिकायत दर्ज कराई। यानी यहां भी मुद्दा सिर्फ वीडियो नहीं, बल्कि उसकी प्रामाणिकता और राजनीतिक इस्तेमाल बन गया।
जुलाई 2026 में केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल के नाम से एक कथित वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। गोयल ने इसे AI की मदद से बदला गया वीडियो बताते हुए पुलिस शिकायत दर्ज कराई। शिकायत के बाद एफआईआर दर्ज हुई और कई सोशल मीडिया लिंक हटाए जाने की जानकारी सामने आई। सरकारी पक्ष की फैक्ट-चेकिंग में भी वीडियो को fabricated बताया गया।
इस मामले में सबसे अहम खतरा यह है कि किसी नेता का वास्तविक चेहरा और आवाज इस्तेमाल होने से नकली सामग्री भी पहली नजर में विश्वसनीय लग सकती है।
मार्च 2026 में केरल पुलिस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को दिखाने वाले एक AI-निर्मित वीडियो के मामले में केस दर्ज किया। पुलिस के अनुसार, सामग्री भ्रामक थी और स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव के संचालन पर प्रतिकूल असर डाल सकती थी।
यही वह बिंदु है जहां डीपफेक सामान्य सोशल मीडिया फर्जीवाड़े से आगे बढ़कर चुनावी प्रक्रिया का मुद्दा बन जाता है। चुनाव के दौरान मतदाता के सामने आने वाली गलत जानकारी उसकी धारणा, उम्मीदवारों के प्रति भरोसे और संभावित मतदान व्यवहार को प्रभावित कर सकती है।
AI का इस्तेमाल केवल नेताओं के फर्जी बयान बनाने तक सीमित नहीं है। असम में फरवरी 2026 में BJP के आधिकारिक राज्य खाते से एक AI-आधारित वीडियो साझा किया गया, जिसमें मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा को दो मुस्लिम पहचान वाले लोगों पर गोली चलाते हुए दिखाया गया। वीडियो के खिलाफ व्यापक विरोध के बाद इसे हटा दिया गया।
बाद के विश्लेषणों में असम और पश्चिम बंगाल के राजनीतिक सोशल मीडिया अभियानों में AI-निर्मित सामग्री और सांप्रदायिक संदेशों के इस्तेमाल की भी पहचान की गई। ऐसे मामलों में AI केवल किसी व्यक्ति की छवि बदलने का माध्यम नहीं रहता, बल्कि भावनात्मक और सामुदायिक ध्रुवीकरण को बढ़ाने वाला औजार बन सकता है।
अगस्त 2026 में प्रकाशित 404 लोगों पर आधारित एक अध्ययन में AI को लेकर भारतीय मतदाताओं की जागरूकता बहुत ऊंची पाई गई। 99.5% प्रतिभागियों ने AI के बारे में जागरूकता जताई, जबकि 85.6% ने ‘डीपफेक’ या ‘चीपफेक’ जैसे शब्दों को पहचाना। अध्ययन में 58.4% प्रतिभागियों ने माना कि AI-जनित मीडिया राजनीतिक जानकारी की विश्वसनीयता को कमजोर करता है, जबकि 70.8% ने कहा कि ऐसी सामग्री ने उन्हें अपने फैसलों में अधिक सतर्क बनाया है।
हालांकि, यह 404 लोगों का अध्ययन है, इसलिए इसे पूरे भारतीय मतदाता वर्ग की राय मानना उचित नहीं होगा। फिर भी यह संकेत जरूर देता है कि AI-आधारित राजनीतिक सामग्री को लेकर संदेह बढ़ रहा है।
चुनाव आयोग ने राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों को AI-जनित या AI से बदली गई चुनावी सामग्री को स्पष्ट रूप से “AI-Generated”, “Digitally Enhanced” या “Synthetic Content” के रूप में लेबल करने का निर्देश दिया है। साथ ही सामग्री के मूल स्रोत की जानकारी देने पर भी जोर दिया गया है। आयोग ने यह भी कहा है कि भ्रामक या गैरकानूनी AI सामग्री की शिकायत मिलने पर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को तीन घंटे के भीतर कार्रवाई करनी होगी।
यानी चुनावी प्रचार में AI का इस्तेमाल अपने आप में प्रतिबंधित नहीं है, लेकिन मतदाता को यह पता होना चाहिए कि उसके सामने दिखाई जा रही सामग्री वास्तविक है या कृत्रिम रूप से बनाई या बदली गई है।
केंद्र सरकार ने फरवरी 2026 में IT Rules में बदलाव कर सिंथेटिक रूप से तैयार सामग्री से होने वाले नुकसान से निपटने के लिए प्रावधान मजबूत किए। नियमों में प्लेटफॉर्मों के लिए गैरकानूनी AI सामग्री की रोकथाम के लिए तकनीकी उपाय, अनुमत AI सामग्री की स्पष्ट लेबलिंग और उसके स्रोत की पहचान योग्य मेटाडेटा जैसी व्यवस्थाओं पर जोर दिया गया है।
इसके अलावा सरकार ने IT Act की विभिन्न धाराओं के तहत पहचान की चोरी, प्रतिरूपण, निजता के उल्लंघन और आपत्तिजनक सामग्री जैसे अपराधों पर लागू कानूनी प्रावधानों को भी रेखांकित किया है।
डीपफेक की सबसे बड़ी ताकत उसकी विश्वसनीयता है। अगर वीडियो में आवाज, चेहरा, हावभाव और पृष्ठभूमि सब कुछ वास्तविक जैसा दिखाई दे तो सामान्य उपयोगकर्ता के लिए उसकी सच्चाई जांचना मुश्किल हो सकता है।
इसलिए किसी भी सनसनीखेज राजनीतिक वीडियो को तुरंत आगे बढ़ाने के बजाय तीन सवाल पूछने चाहिए—क्या यह मूल स्रोत से आया है? क्या किसी विश्वसनीय समाचार माध्यम ने इसकी पुष्टि की है? और क्या संबंधित नेता या संस्था ने इसकी पुष्टि या खंडन किया है?
AI राजनीतिक संचार को अधिक रचनात्मक और प्रभावी बनाने की क्षमता रखता है, लेकिन वही तकनीक झूठी सामग्री को भी पहले से कहीं ज्यादा विश्वसनीय बना सकती है। इसलिए समाधान केवल AI पर रोक नहीं, बल्कि पारदर्शिता, लेबलिंग, तेज फैक्ट-चेकिंग और डिजिटल साक्षरता में है।
राजनीतिक दलों को AI के इस्तेमाल में स्पष्ट नैतिक सीमाएं तय करनी होंगी। चुनाव आयोग और सरकार को शिकायतों पर तेज कार्रवाई सुनिश्चित करनी होगी। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों को सामग्री की पहचान और स्रोत संबंधी जानकारी को अधिक पारदर्शी बनाना होगा। और मतदाताओं को भी यह समझना होगा कि अब वीडियो दिखना ही उसके सच होने का प्रमाण नहीं है।
Updated on:
31 Aug 2026 03:47 pm
Published on:
31 Aug 2026 03:47 pm
