31 अगस्त 2026,

सोमवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

मध्यप्रदेश की जहरीली मूंग की कहानी, जानिए प्राकृतिक खेती की ओर लौटना क्यों जरूरी? कैसे होगी कमाई?

Natrural Farming Tips: क्या आपने कभी सोचा है कि आपकी खेती कैसे न केवल आपके लिए, बल्कि पूरे पर्यावरण के लिए फायदेमंद हो सकती है? रासायनिक खेती के भयंकर नुकसान से बचने, प्राकृतिक खेती एक ऐसा विकल्प है, जहां मिट्टी, फसल और पशुधन का समन्वय आपके लिए समृद्धि और सुरक्षा का नया द्वार खोल सकता है!
4 min read
Google source verification

भारत

image

Sanjana Kumar

Aug 31, 2026

Natural Farming Tips

Natural Farming Tips: AI Creative

Natrural Farming Tips: आज जब खेती में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग मृदा, जल और स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है, तब प्राकृतिक खेती (Natural Farming) एक सशक्त और टिकाऊ विकल्प के रूप में उभरकर सामने आ रही है। यह पद्धति न केवल पर्यावरण की रक्षा करती है, बल्कि किसानों की आय और मिट्टी की सेहत को भी बेहतर बनाती है।

रासायनिक खेती के नुकसान को मध्यप्रदेश की जहरीली मूंग से समझें

मध्य प्रदेश में ग्रीष्मकालीन मूंग की खेती तेजी से बढ़ी है, लेकिन इस बीच कुछ किसान फसल को जल्दी सुखाकर मंडी पहुंचाने के लिए पैराक्वाट डाइक्लोराइड जैसे जहरीले रसायनों का उपयोग कर रहे हैं। यह केवल फसल को ही नहीं, बल्कि मिट्टी, पानी और हमारी थाली तक को प्रभावित कर रहा है।

मूंग में रसायन का उपयोग और खतरे कुछ किसान 60 दिनों में तैयार हो जाने वाली मूंग को और जल्दी मंडी भेजने के लिए पैराक्वाट डाइक्लोराइड जैसे रसायनों का छिड़काव करते हैं। यह रसायन फसल को तेजी से सुखा देता है, लेकिन इसके अवशेष मिट्टी और पानी में जमा हो जाते हैं, जिससे मिट्टी की जैविक गुणवत्ता और उपजाऊ शक्ति प्रभावित होती है।

हाल ही में सीहोर, रायसेन, नर्मदापुरम, हरदा, विदिशा और नरसिंहपुर जिलों में 800 मिट्टी के नमूनों की जांच में लगभग 180 में कीटनाशकों के अवशेष मिले। यानी हर पांचवें खेत की मिट्टी रसायनों से दूषित हो चुकी है।

जानिए क्या है पैराक्वाट

पैराक्वाट अत्यंत जहरीला हर्बीसाइड है, जिसका संपर्क या सेवन फेफड़ों, किडनी और श्वसन तंत्र को नुकसान पहुंचा सकता है। विशेषज्ञों ने इसके कैंसर, पार्किंसन और फाइब्रोसिस जैसी बीमारियों से संबंध की चेतावनी दी है।

सरकारी प्रतिक्रिया और खरीद में बदलाव की कहानी भी सामने आई

राज्य सरकार ने इस फसल को जहरीला मानते हुए समर्थन मूल्य (MSP) पर खरीद से इनकार कर दिया। इससे किसान मंडी में कम दाम पर फसल बेचने को मजबूर हुए, MSP 8,682 रुपए प्रति क्विंटल था, लेकिन बाजार में कीमत 5,000-5,500 रुपए तक गिर गई। केंद्रीय कीटनाशी बोर्ड ने स्पष्ट किया है कि पैराक्वाट जैसे रसायनों का उपयोग केवल बंजर भूमि या चाय बागानों में ही किया जाना चाहिए, उपजाऊ कृषि भूमि में इसका उपयोग प्रतिबंधित है।

यहां जानिए प्राकृतिक खेती की ओर कैसे लौंटें, यह कैसे काम करती है

प्राकृतिक खेती एक रसायन-मुक्त कृषि प्रणाली है, जो पारंपरिक ज्ञान और पारिस्थितिक सिद्धांतों पर आधारित है। इसमें फसल, पेड़ और पशुधन को एकीकृत कर जैव विविधता को बढ़ावा दिया जाता है, जिससे मिट्टी की उर्वरता, जल संरक्षण और लागत-कुशल उत्पादन सुनिश्चित होता है, जैसा कि ICAR-IARI, कुल्लू (हिमाचल प्रदेश) के शोधकर्ताओं ने बताया है।

नीति आयोग की वेबसाइट पर भी यह स्पष्ट किया गया है कि प्राकृतिक खेती मिट्टी की उर्वरता और पर्यावरणीय स्वास्थ्य को बहाल करते हुए ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने में मदद करती है।

सरकारी पहल और आंकड़े

केंद्र सरकार ने 25 नवंबर 2024 को राष्ट्रीय प्राकृतिक कृषि मिशन (NMNF) को 2481 करोड़ की मंजूरी दी। मार्च 2026 तक इस मिशन के तहत 8.80 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को कवर किया गया, 18,786 क्लस्टर बनाए गए और 18.19 लाख किसानों को नामांकित किया गया।

किसानों को प्रति एकड़ प्रति वर्ष 4000 तक का प्रोत्साहन दिया जा रहा है, साथ ही सरल प्रमाणन प्रणाली और प्रशिक्षण भी उपलब्ध कराया जा रहा है।

मृदा स्वास्थ्य और उपज में सुधार की क्या है स्थिति

हिमालयी क्षेत्रों जैसे हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और सिक्किम में प्राकृतिक खेती के तहत सोयाबीन के साथ ही मक्का, मटर और हरा धनिया की प्रणाली में उपज (सोयाबीन समतुल्य) औसतन 6475 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर प्रति वर्ष दर्ज की गई।

यह जैविक या एकीकृत प्रबंधन की तुलना में लगभग 5% अधिक है। साथ ही, 2-3 वर्षों में मृदा कार्बनिक कार्बन (SOC) लगभग 0.90% से बढ़कर 1.15% हो गया और सूक्ष्मजीवों की संख्या व विविधता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।

कृषि पारिस्थितिकी और जैविक स्वास्थ्य पर असर

Frontiers in Agronomy (जुलाई 2026) में प्रकाशित एक समीक्षा में बताया गया है कि प्राकृतिक खेती रासायनिक इनपुट को कम कर मिट्टी और जल की गुणवत्ता सुधारती है।

इसमें मल्चिंग, इंटरक्रॉपिंग, पशुधन का समावेश और स्थानीय संसाधनों का उपयोग शामिल है, जो जैव विविधता, लागत-कुशलता और जलवायु लचीलापन बढ़ाते हैं।

व्यावहारिक लाभ और किसानों की प्रतिक्रिया जानिए क्या कहते हैं किसान

अप्रैल 2024 में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, आंध्र प्रदेश के गुन्टूर में प्राकृतिक खेती अपनाने वाले किसान रत्ना राजू ने बताया कि चक्रवात के दौरान उनकी मिट्टी पानी को तेजी से सोखने में सक्षम थी, जबकि रासायनिक खेती वाले खेत चार दिनों तक जलमग्न रहे।

इससे प्राकृतिक खेती की मिट्टी में जल अवशोषण क्षमता और जड़ प्रणाली की मजबूती स्पष्ट होती है। वहीं, नीति आयोग की रिपोर्ट में लगभग 91.2% किसानों ने फसल उत्पादकता में वृद्धि, 90.1% ने इनपुट लागत में कमी और 68.5% ने मृदा स्वास्थ्य में सुधार की जानकारी दी है।

एक नया, अनछुआ पहलू है सामाजिक-शैक्षिक असर

एक अनूठा पहलू यह भी है कि प्राकृतिक खेती का सामाजिक और शैक्षिक प्रभाव भी दिखता है। MHRD की वार्षिक रिपोर्ट (2023–24) में उल्लेख है कि स्कूलों में प्राकृतिक खेती को पाठ्यक्रम में शामिल करने से बच्चों में व्यावहारिक कौशल और पर्यावरणीय चेतना बढ़ती है।

यह दृष्टिकोण भारत की कृषि विरासत पर गर्व उत्पन्न करता है और भावी पीढ़ियों को सतत कृषि चुनौतियों से निपटने के लिए तैयार करता है। यह पहल न केवल खेती को बदल रही है, बल्कि सामाजिक दृष्टिकोण और शिक्षा को भी स्थायी दिशा दे रही है।

प्राकृतिक खेती के लाभ भी जानना जरूरी

लाभ क्षेत्रविवरण
मृदा स्वास्थ्यSOC में वृद्धि, सूक्ष्मजीवों की संख्या व विविधता में सुधार
उपज और आय5% तक अधिक उपज, लागत में कमी, बेहतर बाजार मूल्य
पर्यावरणीय लाभरासायनिक इनपुट में कमी, जल संरक्षण, ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी
सामाजिक-शैक्षिक प्रभावस्कूलों में पाठ्यक्रम, पर्यावरणीय जागरूकता, भविष्य की पीढ़ी की तैयारी

प्राकृतिक खेती केवल एक कृषि विकल्प नहीं, बल्कि एक समग्र परिवर्तन है, जो मिट्टी, किसान और समाज तीनों को लाभ पहुंचाता है। यह पद्धति न केवल पर्यावरण की रक्षा करती है, बल्कि किसानों की आय, मिट्टी की सेहत और बच्चों की शिक्षा में भी सकारात्मक बदलाव लाती है। यदि हम इसे व्यापक रूप से अपनाएं, तो यह भारत को एक स्थायी, समृद्ध और स्वस्थ कृषि भविष्य की ओर ले जा सकती है।