
Patient Rights in India: अस्पताल में भर्ती होने के बाद मरीज और उनके परिजन अक्सर इलाज, मेडिकल रिकॉर्ड, बिल या डॉक्टर की जिम्मेदारियों को लेकर असमंजस में रहते हैं। बहुत कम लोगों को पता है कि भारत में मरीजों के अधिकारों को लेकर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC), स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) और आयुष्मान भारत योजना चलाने वाले राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण (NHA) ने अलग-अलग स्तर पर दिशा निर्देश जारी किए हैं। इसका मकसद मरीज को सम्मानजनक, सुरक्षित और पारदर्शी चिकित्सा सेवा उपलब्ध कराना है।
भारतीय कानून के मुताबिक, अगर किसी व्यक्ति की जान पर खतरा है या वह गंभीर आपातकालीन स्थिति में है तो किसी भी सरकारी या निजी अस्पताल को प्राथमिक आपातकालीन उपचार देने से इनकार करने की इजाजत नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने परमानंद कटारा बनाम भारत संघ (1989) मामले में स्पष्ट किया था कि जीवन बचाना डॉक्टर और अस्पताल का पहला दायित्व है।
पुलिस औपचारिकताएं, कागजी प्रक्रिया या भुगतान का इंतजार करने के बजाय पहले मरीज का इलाज शुरू किया जाना चाहिए। सड़क दुर्घटना, हार्ट अटैक, ब्रेन स्ट्रोक, गंभीर रक्तस्राव, जलने या अन्य जानलेवा परिस्थितियों में अस्पताल को तत्काल चिकित्सा सहायता देनी होती है। स्थिर होने के बाद ही अस्पताल मरीज को किसी उच्च स्तरीय केंद्र में रेफर कर सकता है।
मरीजों के अधिकारों से जुड़ा सबसे व्यापक दस्तावेज 'चार्टर ऑफ पेशेंट्स राइट्स' है, जिसे राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने 2018 में तैयार किया था। इस मसौदे में मरीजों के 17 बुनियादी अधिकार गिनाए गए हैं। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने जन आंदोलनों और स्वास्थ्य अधिकार संगठनों के दबाव के बाद जून 2019 में सभी राज्यों को इसका एक संक्षिप्त संस्करण, यानी 13 अधिकार और जिम्मेदारियों की सूची, अपनाने के लिए भेजा था।
इसके अलावा, आयुष्मान भारत योजना (PM-JAY) के तहत सूचीबद्ध अस्पतालों के लिए राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण (NHA) ने भी NHRC के चार्टर से प्रेरित एक अलग 'पेशेंट्स राइट्स एंड रिस्पॉन्सिबिलिटीज चार्टर' जारी किया है, जिसे संबंधित अस्पतालों में प्रमुखता से प्रदर्शित करना अनिवार्य है। इन दस्तावेजों के मुताबिक हर मरीज को सम्मान और गरिमा के साथ इलाज पाने का अधिकार है।
किसी मरीज के साथ धर्म, जाति, लिंग, भाषा, आर्थिक स्थिति या बीमारी के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता। मरीज को अपनी बीमारी, जांच, इलाज, संभावित जोखिम, खर्च और उपलब्ध विकल्पों की पूरी जानकारी सरल भाषा में पाने का अधिकार है। किसी भी बड़ी सर्जरी या जोखिम भरे उपचार से पहले मरीज या उसके अधिकृत परिजन से लिखित रूप में सूचित सहमति (Informed Consent) लेना जरूरी है।
मरीज की व्यक्तिगत और स्वास्थ्य संबंधी जानकारी गोपनीय रखना अस्पताल और डॉक्टर की जिम्मेदारी है। बिना कानूनी आवश्यकता के यह जानकारी किसी अन्य व्यक्ति को साझा नहीं की जा सकती है। मरीज को यह अधिकार भी दिया गया है कि वह हॉस्पिटल फार्मेसी से ही दवाएं खरीदने या वहीं जांच कराने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है। यानी की मरीज अस्पताल के बाहर सस्ती दवा लेने या जांच कराने के लिए स्वतंत्र है।
भारत में मरीज को अपने मेडिकल रिकॉर्ड प्राप्त करने का कानूनी अधिकार है। राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) की 'रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिशनर (प्रोफेशनल कंडक्ट) रेगुलेशंस 2023' के अनुसार अगर मरीज अधिकृत प्रतिनिधि या कानूनी प्राधिकारी मेडिकल रिकॉर्ड की मांग करता है तो डॉक्टर या अस्पताल को इसकी पावती देनी होगी। संबंधित डॉक्टर या अस्पताल को आवश्यक दस्तावेज 5 कार्य दिवसों (Working Days) के भीतर उपलब्ध कराने होंगे।
मेडिकल आपातकाल की स्थिति में रिकॉर्ड उसी दिन दिए जाने चाहिए। यह नियम पहले लागू 72 घंटे की समय-सीमा से थोड़ा अलग है, जिसे संशोधित नियमों में बदला गया। नियमानुसार, रिकॉर्ड में भर्ती और डिस्चार्ज सारांश, जांच रिपोर्ट, एक्स-रे, MRI व सीटी स्कैन रिपोर्ट, ऑपरेशन नोट्स, दवाओं का विवरण और उपचार की पूरी जानकारी शामिल है। ये दस्तावेज भविष्य में इलाज, दूसरी राय, बीमा दावा या किसी कानूनी प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। नियमों के तहत डॉक्टरों को हर मरीज का रिकॉर्ड अंतिम इलाज की तारीख से कम से कम 3 साल तक सुरक्षित रखना भी अनिवार्य है।
अगर मरीज किसी बीमारी या सर्जरी को लेकर संतुष्ट नहीं है तो उसे किसी अन्य विशेषज्ञ डॉक्टर से सेकंड ओपिनियन लेने का पूरा अधिकार है। अस्पताल या डॉक्टर इस अधिकार में बाधा नहीं डाल सकते हैं। मरीज अपनी जांच रिपोर्ट व मेडिकल रिकॉर्ड लेकर किसी भी दूसरे अस्पताल या विशेषज्ञ से सलाह ले सकता है।
मरीज को इलाज शुरू होने से पहले संभावित खर्च, पैकेज, जांच शुल्क और अन्य फीस की जानकारी दी जानी चाहिए। अस्पताल को बिल में सभी मदों का स्पष्ट विवरण देना चाहिए, ताकि मरीज को यह समझने में आसानी हो कि किस सेवा के लिए कितना शुल्क लिया गया है।
अगर मरीज को इलाज में लापरवाही, अनुचित व्यवहार, अत्यधिक शुल्क, रिकॉर्ड देने से इनकार या किसी अन्य समस्या का सामना करना पड़ता है तो शिकायत के कई विकल्प मौजूद हैं। सबसे पहले संबंधित अस्पताल के ग्रिवेंस रिड्रेसल सेल या पेशेंट रिलेशंस ऑफिस में शिकायत की जा सकती है। वहां समस्या का समाधान नहीं होने पर जिला स्तर पर पंजीकरण प्राधिकरण (जो क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट (रजिस्ट्रेशन एंड रेगुलेशन) एक्ट, 2010 के तहत बनता है), राज्य चिकित्सा परिषद (State Medical Council) या राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) के समक्ष शिकायत दर्ज कराई जा सकती है।
मेडिकल सेक्टर को सेवा (Service) मानते हुए उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 के तहत उपभोक्ता आयोग में भी वित्तीय हर्जाने के लिए शिकायत की जा सकती है। मानवाधिकार उल्लंघन से जुड़े मामलों में राष्ट्रीय या राज्य मानवाधिकार आयोग से संपर्क किया जा सकता है। अगर मामला गंभीर चिकित्सीय लापरवाही, धोखाधड़ी या किसी आपराधिक कृत्य का हो तो पुलिस में प्राथमिकी (FIR) दर्ज कराने का भी अधिकार है।
विशेषज्ञों का मानना है कि मरीजों के अधिकारों की जानकारी होने से स्वास्थ्य सेवाओं में पारदर्शिता बढ़ती है और अस्पतालों की जवाबदेही भी तय होती है। मरीजों और उनके परिजनों को अस्पताल में भर्ती होने से पहले अपने अधिकारों, इलाज की प्रक्रिया, मेडिकल रिकॉर्ड और शिकायत व्यवस्था की जानकारी अवश्य रखनी चाहिए। भारत में स्वास्थ्य सेवाओं का दायरा लगातार बढ़ रहा है, ऐसे में मरीजों का जागरूक होना उतना ही जरूरी है जितना समय पर इलाज कराना। अपने अधिकारों की जानकारी न केवल बेहतर चिकित्सा सेवा सुनिश्चित करती है, बल्कि जरूरत पड़ने पर न्याय पाने का रास्ता भी आसान बनाती है।