
सांकेतिक इमेज (सोर्स- Chatgpt)
अगर कोई व्यक्ति जरूरत से काफी कम या ज्यादा सोता है, तो इसका असर उसकी सेहत और शरीर की उम्र बढ़ने की प्रक्रिया पर पड़ सकता है। हेल्थ जर्नल नेचर में प्रकाशित एक बड़े अध्ययन में शोधकर्ताओं ने पाया है कि बहुत कम या बहुत ज्यादा नींद लेने वाले लोगों के शरीर में जल्दी बूढ़े होने के संकेत दिखाई दे सकते हैं। यह अध्यन 'स्लीप चार्ट ऑफ बायोलॉजिकल एजिंग क्लॉक्स इन मिडिल एंड लेट लाइफ' नाम से प्रकाशित हुआ। इस अध्ययन का नेतृत्व कोलंबिया यूनिवर्सिटी के कंप्यूटेशनल न्यूरोसाइंटिस्ट और रेडियोलॉजी के असिस्टेंट प्रोफेसर जुनहाओ वेन ने किया।
अध्ययन के लिए वेन और उनकी टीम ने यूके बायोबैंक के 37 से 84 साल की उम्र के करीब 5 लाख लोगों के हेल्थ डेटा का विश्लेषण किया। शोधकर्ताओं ने प्रतिभागियों की खुद बताई गई नींद की अवधि की तुलना 23 'एजिंग क्लॉक्स' यानी उम्र बढ़ने की जैविक घड़ियों से की, जो शरीर के 17 अलग-अलग अंग-तंत्रों (ऑर्गन सिस्टम) को कवर करती हैं।
ये एजिंग क्लॉक्स एमआरआई स्कैन, खून में मौजूद प्रोटीन (प्रोटिओमिक्स) और मेटाबोलिज्म से जुड़े छोटे अणुओं (मेटाबोलॉमिक्स) के डेटा पर मशीन लर्निंग की मदद से तैयार की गई हैं और बताती हैं कि किसी व्यक्ति का दिमाग, लिवर या इम्यून सिस्टम उसकी असल उम्र के मुकाबले कितना बूढ़ा या जवान दिख रहा है।
स्टडी के मुताबिक, रोजाना करीब 6.4 से 7.8 घंटे सोने वाले लोगों में शरीर के ज्यादातर अंगों में उम्र बढ़ने का 'गैप' यानी अंतर सबसे कम पाया गया, जबकि 6 घंटे से कम या 8 घंटे से ज्यादा सोने वाले लोगों में उम्र बढ़ने से जुड़े संकेत ज्यादा देखने को मिले। शोधकर्ताओं ने नींद की अवधि और शरीर की उम्र बढ़ने के बीच कई मामलों में 'यू आकार' का संबंध पाया।
यानी सामान्य अवधि की नींद लेने वालों की स्थिति बेहतर रही, जबकि बहुत कम या बहुत ज्यादा सोने वालों में उम्र बढ़ने के संकेत अधिक पाए गए। यह पैटर्न दिमाग, दिल, फेफड़े और इम्यून सिस्टम समेत लगभग हर अंग में एक जैसा दिखा, जिससे पता चलता है कि नींद पूरे शरीर के तालमेल जैसे- मेटाबॉलिज्म का संतुलन और स्वस्थ इम्यून सिस्टम बनाए रखने में अहम भूमिका निभाती है।
शोध में यह भी सामने आया कि सामान्य नींद (6 से 8 घंटे) के मुकाबले बहुत कम या बहुत ज्यादा सोने से माइग्रेन, डिप्रेशन और डायबिटीज जैसी बीमारियों के साथ-साथ किसी भी कारण से मृत्यु के जोखिम में भी बढ़ोतरी जुड़ी पाई गई। टीम ने बुजुर्गों में होने वाले डिप्रेशन पर भी खास तौर से गौर किया। विश्लेषण बताता है कि कम नींद सीधे तौर पर डिप्रेशन के बोझ से जुड़ी हो सकती है, जबकि ज्यादा नींद का असर दिमाग और शरीर की चर्बी (एडिपोज़ टिश्यू) से जुड़ी एजिंग क्लॉक्स के जरिए परोक्ष रूप से पड़ता दिखा।
रिसर्च यह साबित नहीं करती कि रोजाना 6 से 8 घंटे की नींद लेने से सीधे तौर पर सेहत बेहतर होती है या उम्र बढ़ने की प्रक्रिया धीमी हो जाती है। यह अध्ययन कार्य-कारण नहीं बल्कि सहसंबंध (एसोसिएशन) दिखाता है। शोधकर्ताओं का कहना है कि पहले के अध्ययनों में नींद का संबंध मुख्यतः दिमाग की उम्र बढ़ने और बीमारियों से जोड़ा गया था। यह अध्ययन आगे बढ़कर बताता है कि बहुत कम और बहुत ज्यादा नींद लगभग हर अंग में तेज उम्र बढ़ने से जुड़ी है, जिससे यह विचार मजबूत होता है कि नींद पूरे शरीर के अंग-तंत्रों के स्वास्थ्य को बनाए रखने में जरूरी भूमिका निभाती है।
आमतौर पर एजिंग क्लॉक्स पूरे शरीर के लिए एक ही आंकड़ा देती हैं, लेकिन अलग-अलग अंग अलग-अलग रफ्तार से बूढ़े होते हैं। शोधकर्ताओं के मुताबिक अंग-विशेष एजिंग क्लॉक्स मरीजों को उनकी सेहत को लेकर ज्यादा सटीक और व्यक्तिगत जानकारी दे सकती हैं, जिनका इस्तेमाल आगे चलकर बीमारियों के जोखिम का आकलन करने और नींद से जुड़ी इलाज-योजनाओं को बेहतर बनाने में किया जा सकता है। इस अध्ययन का सीधा संदेश यही है कि नींद न तो बहुत कम होनी चाहिए, न ही बहुत ज्यादा होनी चाहिए।
Updated on:
19 Sept 2026 06:36 pm
Published on:
19 Sept 2026 06:36 pm
