
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठक 5 से 7 अक्टूबर तक होनी है। इस बैठक से ठीक पहले SBI रिसर्च की रिपोर्ट ने ब्याज दर बढ़ने की चर्चा तेज कर दी है। शुक्रवार को जारी प्री-MPC रिपोर्ट में कहा गया कि RBI रेपो रेट में कम से कम 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी कर सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक जोखिमों का संतुलन अब निर्णायक रूप से बढ़ोतरी की तरफ झुक गया है।
एसबीआई रिसर्च ने रेपो रेट बढ़ने की संभावना के पीछे महंगाई के बढ़ते दायरे, बिगड़ती वैश्विक आर्थिक स्थिति, बदलती तरलता और जोखिमों के नए सिरे से आकलन को वजह बताया है। रिपोर्ट का तर्क है कि भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की कीमतों के जोखिम को देखते हुए पहले से कदम उठाना बेहतर है। रिपोर्ट के अनुसार RBI वित्त वर्ष 2026-27 के लिए जीडीपी अनुमान 30 बेसिस पॉइंट और महंगाई अनुमान 20 बेसिस पॉइंट बढ़ा सकता है। रिपोर्ट यह भी कहा गया कि घबराने की जरूरत नहीं, पर नीति निर्माताओं को कुछ असामान्य ब्याज दर उपायों के लिए तैयार रहना चाहिए।
RBI ने अगस्त की बैठक से रेपो रेट 5.25 प्रतिशत पर स्थिर रखी है, यानी लगातार 4 बैठकों से कोई बदलाव नहीं हुआ। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित खुदरा महंगाई अगस्त में जुलाई के 4.45 प्रतिशत से बढ़कर 4.82 प्रतिशत हो गई, जो RBI के 4 प्रतिशत लक्ष्य से लगातार तीसरे महीने ऊपर है। इसमें खाद्य महंगाई 5.95 प्रतिशत रही और प्याज, लहसुन व अदरक जैसी चीजों में तेज उछाल दिखा। थोक महंगाई भी 9.92 प्रतिशत रही, जिसमें ईंधन और बिजली खंड में 22.93 प्रतिशत की बढ़त दर्ज हुई। एसबीआई रिसर्च को सितंबर में खुदरा महंगाई करीब 5.65 प्रतिशत और अक्टूबर-नवंबर में 6.5 प्रतिशत से ऊपर रहने की आशंका है। सितंबर के आंकड़े MPC के फैसले के बाद आएंगे।
रेपो रेट वह दर है, जिस पर RBI बैंकों को कर्ज देता है। इसके बढ़ने के आमतौर पर कई प्रकार का असर होता है।
कर्ज महंगा: रेपो से जुड़े (एक्सटर्नल बेंचमार्क आधारित) होम लोन और अन्य फ्लोटिंग रेट कर्जों की ब्याज दर बढ़ती है। उदाहरण के लिए, एक आकलन के मुताबिक 50 लाख रुपये के 20 साल के होम लोन पर ब्याज 8.5 से 8.75 प्रतिशत होने पर EMI करीब 795 रुपये बढ़कर 44,186 रुपये हो जाती है। यह केवल उदाहरण है, हर बैंक का असर अलग होगा।
एफडी को फायदा: बैंक जमा दरें बढ़ा सकते हैं, जिससे बचतकर्ताओं को लाभ हो सकता है।
महंगाई पर लगाम: कर्ज महंगा होने से मांग घटती है, जिससे कीमतों का दबाव कम हो सकता है।
रुपये को सहारा: ऊंची दरें विदेशी निवेश को आकर्षित करती हैं, जिससे रुपये पर दबाव घट सकता है।
विकास पर असर: महंगे कर्ज से निवेश और खपत धीमी पड़ सकती है।
RBI ने आखिरी बार रेपो रेट 8 फरवरी 2023 को बढ़ाकर 6.50 प्रतिशत किया था। यह 2022 से शुरू हुए सख्ती के दौर की आखिरी कड़ी थी। इसके बाद दर लंबे समय तक स्थिर रही। फरवरी 2025 से जून 2025 तक RBI ने रेपो रेट में कुल 100 बेसिस पॉइंट घटाकर इसे 5.5 प्रतिशत किया, और 5 दिसंबर 2025 को 25 बेसिस पॉइंट कटौती कर इसे 5.25 प्रतिशत किया। यानी बढ़ोतरी हुई तो यह करीब साढ़े तीन साल बाद पहली वृद्धि होगी और कटौती के चक्र से पलटाव का संकेत होगी।
SBI ही नहीं, अन्य एजेंसियां भी सख्ती की बात कर रही हैं। S&P को चालू वित्त वर्ष में 25 बेसिस पॉइंट की एक बढ़ोतरी की उम्मीद है, जबकि Fitch दो बढ़ोतरियों के साथ 2027 की शुरुआत में दर 5.75 प्रतिशत तक जाने का अनुमान जताती है। एसबीआई रिसर्च ने सितंबर की रिपोर्ट में अक्टूबर और दिसंबर में 25-25 बेसिस पॉइंट बढ़ोतरी की बात कही थी। हालांकि, रेपो रेट बढ़ेगा या नहीं, इसका अंतिम निर्णय MPC की बैठक में होगा।