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राज्यसभा में बताया- ग्रामीण महिलाओं की आमदनी में 49% की बढ़ोतरी, SHG समूहों का सच आंकड़ों में देखिए

क्या आपने सोचा है कि एक छोटी सी बचत कितनी बड़ी बदलाव ला सकती है? स्वयं सहायता समूहों (SHG) के माध्यम से महिलाएं न केवल अपनी आमदनी बढ़ा रही हैं, बल्कि आत्मनिर्भरता और नेतृत्व की नई ऊंचाइयों तक भी पहुंच रही हैं!
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Aug 25, 2026
rural women SHG report
प्रतीकात्मक तस्वीर | ChatGPT

ग्रामीण इलाकों में महिलाओं की आमदनी बढ़ने की कहानी अब केवल एक सपना नहीं, बल्कि हकीकत बनकर सामने आ रही है। स्वयं सहायता समूह (SHG) की ताकत ने अनेक महिलाओं को आत्मनिर्भरता की राह पर अग्रसर किया है। आइए जानें कि ये समूह किस प्रकार महिलाओं की आर्थिक स्थिति बदल रहे हैं और गांवों में सकारात्मक परिवर्तन ला रहे हैं।

राज्यसभा में आमदनी के बारे में बताया

नीति आयोग (NITI Aayog) की देखरेख वाली डेवलपमेंट मॉनिटरिंग एंड इवैल्यूएशन ऑफिस (DMEO) के हालिया मूल्यांकन के हवाले से केंद्रीय ग्रामीण विकास राज्य मंत्री चंद्रशेखर पेम्मासानी ने राज्यसभा में लिखित जवाब में बताया कि डे-एनआरएलएम (DAY-NRLM) से जुड़े ग्रामीण परिवारों की औसत आय में 49 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

मंत्रालय के अनुसार, DAY-NRLM ने अब तक देशभर में 10.08 करोड़ महिलाओं को 92.30 लाख स्वयं सहायता समूहों (SHG) में संगठित किया है - यानी यह पहल अब दुनिया की सबसे बड़ी महिला-नेतृत्व वाली आर्थिक भागीदारी योजनाओं में से एक बन चुकी है।

नीति आयोग के मूल्यांकन में यह भी सामने आया कि योजना ने महिलाओं को रोजगार और आय के अवसरों से जोड़ने के साथ उनकी आर्थिक स्वतंत्रता, आत्मविश्वास और बैंकिंग सेवाओं तक पहुंच को भी बेहतर किया है।

बैंक खातों में जमा राशि तीन गुना

स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) के मुख्य आर्थिक सलाहकार सौम्य कांति घोष की मार्च 2024 की एक रिपोर्ट के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2018-19 को आधार वर्ष मानें तो SHG से जुड़ी महिलाओं के बैंक खातों में जमा होने वाली राशि तीन गुना से भी ज्यादा बढ़ी है। यानी अगर 2018-19 में यह राशि 100 रुपये थी, तो वित्त वर्ष 2023 के पहले नौ महीनों तक यह बढ़कर 307 रुपये के स्तर पर पहुंच गई। सबसे बड़ी छलांग युवा महिलाओं (27 वर्ष से कम आयु) में देखी गई, जिनकी आय में यह वृद्धि 4.7 गुना तक रही।

रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि रोज़गार में महिलाओं की भागीदारी दर (Female LFPR) 2017-18 के 21.7% से बढ़कर 2022-23 में 34.6% हो गई, और यह वृद्धि सीधे तौर पर SHG से जुड़ी महिलाओं की आय बढ़ोतरी से जुड़ी पाई गई।

इसके अलावा, नाबार्ड (NABARD) के आंकड़ों के मुताबिक, प्रति SHG औसत बचत राष्ट्रीय स्तर पर वर्ष 2021-22 के 39,721 रुपये से बढ़कर 2023-24 में 45,132 रुपये यानी 14% की वृद्धि दर्ज कर चुकी है। दक्षिणी राज्यों में यह औसत बचत (68,636 रुपये) देश में सबसे अधिक रही।

"लखपति दीदी" अभियान: लक्ष्य से आगे निकली योजना

महिलाओं की आर्थिक तरक्की को और गति देने के लिए 2023 में शुरू हुए "लखपति दीदी" अभियान के तहत उन SHG महिलाओं को यह दर्जा दिया जाता है जिनके परिवार की वार्षिक आय कम से कम 1 लाख रुपये या मासिक आय 10,000 रुपये तक पहुंच जाती है। सरकार ने शुरुआत में 2 करोड़ महिलाओं को लखपति दीदी बनाने का लक्ष्य रखा था, जिसे बाद में बढ़ाकर 3 करोड़ किया गया। जुलाई 2026 तक यह आंकड़ा 3.46 करोड़ को पार कर चुका है, और अब सरकार ने 2029-30 तक 6 करोड़ महिलाओं को लखपति दीदी बनाने का नया लक्ष्य तय किया है। बजट 2026-27 में DAY-NRLM के लिए 17,280 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया, जो पिछले साल की तुलना में 20% अधिक है।

उदाहरण के लिए उत्तराखंड में वित्त वर्ष 2025-26 तक 3.03 लाख महिलाएं लखपति दीदी बन चुकी हैं, और राज्य सरकार अगले वित्त वर्ष में 1.12 लाख और महिलाओं को इस दायरे में लाने का लक्ष्य रखे हुए है।

बैंक ऋण और साख से जुड़ाव

DAY-NRLM के तहत SHG को बैंकों से बिना गारंटी के संस्थागत ऋण दिलाने में मदद मिलती है। रिपोर्टों के अनुसार, 2024 तक SHG को दिए गए कुल बैंक ऋण की राशि 2.9 लाख करोड़ रुपये को पार कर चुकी थी, और SHG-बैंक लिंकेज में ऋण चुकौती दर 96% से अधिक रही है, जो सामान्य असुरक्षित वाणिज्यिक कर्ज़ों की तुलना में कहीं बेहतर है।

व्यक्तिगत बदलाव: आत्मनिर्भरता और नेतृत्व

SHG के ज़रिए मिलने वाला सिर्फ पैसा नहीं, बल्कि प्रशिक्षण, बैंकिंग की समझ और सामूहिक ताकत भी महिलाओं को आगे बढ़ा रही है। कई अध्ययनों में यह भी दर्ज हुआ है कि SHG सदस्यता से घरेलू निर्णयों में महिलाओं की भागीदारी और वित्तीय साक्षरता दोनों में सुधार होता है। इंडियास्पेंड की एक रिपोर्ट में राजस्थान के उदयपुर जिले के जयरा गांव की हेमलता देवी का उदाहरण दिया गया है, जिन्होंने "जय अंबे स्वयं सहायता समूह" से 25,000 रुपये का ऋण लेकर खेत में पानी की मोटर लगवाई - इससे उनकी खेती की उत्पादकता बढ़ी और वे 2% ब्याज पर यह कर्ज़ चुका पाईं।

क्या यह बदलाव टिकाऊ है?

शोध बताते हैं कि SHG सदस्यता से घरों में संपत्ति संचय (जैसे पशुधन और उपभोक्ता टिकाऊ वस्तुएं), घरेलू खर्च और खाद्य सुरक्षा में भी सकारात्मक असर देखा गया है। हालांकि यह भी सामने आया है कि SHG अकेले घरेलू हिंसा या गहरे सामाजिक मुद्दों जैसी चुनौतियों को हल करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।

एक अन्य आकलन के मुताबिक 13 राज्यों में हुए सर्वे में 74.6% प्रतिभागियों ने रिवॉल्विंग फंड (RF) का इस्तेमाल किया, जबकि सामुदायिक निवेश कोष (CIF) जो उद्यमशील गतिविधियों के लिए ढाई लाख रुपये तक मिलता है - का लाभ आधे से भी कम (49.9%) महिलाओं तक पहुंच पाया। इससे संकेत मिलता है कि योजना के लाभ ज़मीनी स्तर तक पूरी तरह पहुंचाने के लिए अभी और काम बाकी है।

ग्रामीण महिलाओं के लिए क्या मायने रखता है?

SHG से जुड़ने से महिलाओं को बैंकिंग, बचत, ऋण और उद्यमिता की जानकारी मिलती है। इससे वे घर की आर्थिक जिम्मेदारियों में सक्रिय भूमिका निभा पाती हैं। आत्मविश्वास बढ़ता है, निर्णय लेने की क्षमता आती है, और परिवार में उनकी आवाज़ मजबूत होती है।

सरपंच, पंचायत और स्थानीय संस्थाओं के लिए यह एक स्पष्ट संकेत है कि SHG को और मजबूत करने से गांव की आर्थिक तस्वीर बदल सकती है। SHG को प्रशिक्षण, बाजार तक पहुंच और डिजिटल बैंकिंग से जोड़ना गांव की महिलाओं को और आगे ले जा सकता है।

Updated on:
25 Aug 2026 11:20 am
Published on:
25 Aug 2026 11:20 am