
25 August history kings commission: क्या आप जानते हैं ये रोचक इतिहास? (AI Creative)
25 August History Kings Commission: आज की तारीख, 25 अगस्त, हमें भारतीय सेना के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ की याद दिलाती है। वह दिन जब पहली बार भारतीयों को 'किंग्स कमीशन' (King’s Commission) प्राप्त हुआ। यह कदम भारतीय सेना में बदलाव की पहली सीढ़ी था, जिसने बाद में स्वतंत्रता के बाद की भारतीय सेना की नींव रखी।
25 अगस्त 1917 को सात भारतीयों को किंग्स कमीशन प्रदान किया गया। यह भारतीयों को नियमित ब्रिटिश भारतीय सेना में अधिकारपूर्ण अधिकारी बनने की दिशा में पहला ठोस कदम था। इससे पहले भारतीयों को केवल वायसरॉय कमीशन मिलता था, जो अधिकारों और पदों में ब्रिटिश अधिकारियों से कमतर था।
1918 में ब्रिटिश सरकार ने रॉयल मिलिट्री कॉलेज, सैंडहर्स्ट में भारतीयों के लिए प्रति वर्ष दस सीटें आरक्षित करने की घोषणा की। इस आरक्षण का उद्देश्य भारतीयों को ब्रिटिश अधिकारियों के समकक्ष प्रशिक्षण देना था। लेकिन पहले बैच में 25 कैडेटों में से केवल दस पास हुए, दो की मृत्यु हो गई, दो ने इस्तीफा दे दिया और एक को कमीशन से वंचित कर दिया गया। यह दर्शाता है कि प्रारंभिक प्रयासों में चुनौतियां भी कम नहीं थीं।
17 फरवरी 1923 को 'एट यूनिट स्कीम' की घोषणा की गई, जिसके तहत केवल आठ इकाइयों को भारतीयीकरण के लिए चुना गया। पांच इन्फैंट्री बटालियन, दो कैवेलरी रेजिमेंट और एक पायनियर बटालियन। यह कदम सीमित था, लेकिन भारतीय अधिकारियों को नियमित पदों पर आने का पहला अवसर था।
जून 1925 में वायसरॉय लॉर्ड रीडिंग के कार्यकाल में 'इंडियन सैंडहर्स्ट कमेटी' गठित की गई, जिसका उद्देश्य भारतीय उम्मीदवारों की संख्या बढ़ाना, तकनीकी शाखाओं (आर्टिलरी, इंजीनियर्स, सिग्नल्स) में भी किंग्स कमीशन की पात्रता सुनिश्चित करना और भारत में एक सैन्य अकादमी स्थापित करना था।
इस समिति ने 14 नवंबर 1926 को रिपोर्ट सौंपी, जिसमें सैंडहर्स्ट में सीटों को 10 से बढ़ाकर 20 करने, तकनीकी शाखाओं में भारतीयों को अवसर देने और भारतीय सैन्य अकादमी (IMA) की स्थापना का सुझाव शामिल था। इस रिपोर्ट ने 1 अक्टूबर 1932 को देहरादून में इंडियन मिलिट्री अकादमी की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया।
आज, 25 अगस्त 2026 को, यह घटना हमें याद दिलाती है कि भारतीय सेना में अधिकारपूर्ण अधिकारी बनने की राह कितनी लंबी और संघर्षपूर्ण रही। उस समय यह बदलाव सीमित था, लेकिन आज की भारतीय सेना में भारतीय अधिकारियों का वर्चस्व है। और यह सब उस पहले कदम से शुरू हुआ।
कहना होगा कि ऐसा बिल्कुल नहीं है। यह कदम भारतीयों को ब्रिटिश अधिकारियों के समकक्ष अधिकार और सम्मान देने की दिशा में पहला वास्तविक प्रयास था। वायसरॉय कमीशन की तुलना में किंग्स कमीशन ने भारतीयों को व्यापक कमांड और नेतृत्व की जिम्मेदारियां दीं। यह बदलाव धीरे-धीरे स्वतंत्रता के बाद की भारतीय सेना की संरचना का आधार बना।
UPSC/PCS के छात्र, राजनीति में रुचि रखने वाले और मतदाता, सभी के लिए यह कहानी यह समझने में मदद करती है कि भारतीय सेना में नेतृत्व की नींव कैसे रखी गई। यह बताती है कि अधिकारों की लड़ाई सिर्फ राजनीतिक नहीं थी, बल्कि सैन्य संरचना में भी भारतीयों को बराबरी का दर्जा दिलाने की थी।
यह इतिहास हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि आज भारतीय सेना में नेतृत्व और प्रतिनिधित्व किस तरह विकसित हुआ है। क्या आज भी समान अवसर हैं? क्या तकनीकी शाखाओं में भारतीयों की भागीदारी संतोषजनक है? ये सवाल हमें आगे की दिशा में सोचने के लिए प्रेरित करते हैं।
इस तरह, 25 अगस्त 1917 की घटना सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि भारतीय सेना में बदलाव की पहली सीढ़ी थी। जो आज भी हमें प्रेरित करती है कि अधिकार और नेतृत्व की राह कभी आसान नहीं होती, लेकिन पहला कदम ही सबसे महत्वपूर्ण होता है।
Updated on:
25 Aug 2026 11:04 am
Published on:
25 Aug 2026 11:04 am
