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एक देश-एक चुनाव से क्या बदलेगा? पंचायत से लोकसभा तक चुनाव एक साथ कराने की असली चुनौती क्या है?

One Nation One Election India : जानें ‘एक देश-एक चुनाव’ (Simultaneous Elections) से भारत में क्या बदलेगा। लोकसभा से लेकर पंचायत चुनाव एक साथ कराने की संवैधानिक, राजनीतिक और व्यावहारिक चुनौतियों की पूरी जानकारी यहाँ पढ़ें।
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One Nation One Election India

One Nation One Election India : क्या देश में एक ही चुनाव?, PC- Chatgpt

भारत में चुनाव लगभग हर साल किसी न किसी राज्य में होते रहते हैं। लोकसभा, विधानसभा, नगर निकाय और पंचायत चुनाव अलग-अलग समय पर होने से सरकारों, राजनीतिक दलों और चुनाव आयोग की मशीनरी लगातार चुनावी मोड में रहती है। इसी वजह से ‘एक देश-एक चुनाव’ यानी Simultaneous Elections का प्रस्ताव चर्चा में है।

इसका मतलब यह नहीं है कि देश में हर स्तर का चुनाव बिल्कुल एक ही दिन होगा। मौजूदा प्रस्ताव के मुताबिक पहले लोकसभा और सभी राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने की व्यवस्था बनेगी। इसके बाद पंचायत और नगरपालिकाओं के चुनाव लोकसभा-विधानसभा चुनाव के 100 दिनों के भीतर कराने की सिफारिश है। लेकिन सवाल है-इसे लागू करना कितना आसान होगा?

अभी क्या होता है?

भारत में लोकसभा का सामान्य कार्यकाल पांच साल और राज्य विधानसभाओं का सामान्य कार्यकाल भी पांच साल होता है। लेकिन सदन समय से पहले भंग हो सकता है। इसी वजह से अलग-अलग राज्यों में चुनाव अलग-अलग वर्षों में होते हैं।

1951-52 से 1967 तक लोकसभा और अधिकांश राज्य विधानसभाओं के चुनाव साथ-साथ हुए थे। बाद में कुछ विधानसभाओं और लोकसभा के समय से पहले भंग होने के कारण यह चुनाव चक्र टूट गया।

आज स्थिति यह है कि लगभग हर साल कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होते हैं। इसके साथ उपचुनाव और स्थानीय निकाय चुनाव भी चलते रहते हैं।

सरकार क्यों चाहती है एक साथ चुनाव?

सरकार और एक देश-एक चुनाव की वकालत करने वालों के मुख्य तर्क चार हैं। पहला- खर्च कम हो सकता है। बार-बार चुनाव कराने में सरकारी मशीनरी, सुरक्षा बल, चुनाव कर्मचारियों और राजनीतिक दलों के संसाधन लगते हैं।

दूसरा-आचार संहिता का असर कम होगा। चुनाव के दौरान मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट लागू होने से सरकारों के नए फैसलों और विकास योजनाओं पर कुछ सीमाएं आती हैं। बार-बार चुनाव होने से यह अवधि भी बार-बार आती है।
तीसरा-सरकारी कर्मचारी और सुरक्षा बल बार-बार चुनाव ड्यूटी में नहीं लगेंगे।
चौथा-सरकारें पांच साल की अवधि में नीतियों पर ज्यादा लगातार ध्यान दे सकेंगी।

कोविंद समिति ने भी बार-बार चुनाव से होने वाले खर्च, सुरक्षा बलों की लंबे समय तक तैनाती और शासन में व्यवधान को एक साथ चुनाव के पक्ष में प्रमुख कारणों में गिना था।

प्रस्ताव क्या है?

पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली उच्चस्तरीय समिति ने दो चरणों में व्यवस्था लागू करने की सिफारिश की।

चरण/विषयप्रस्ताव
पहला चरणलोकसभा और सभी राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराना
दूसरा चरणपंचायत और नगरपालिका चुनाव लोकसभा-विधानसभा चुनाव के 100 दिनों के भीतर कराना
मतदाता सूचीएकल (सिंगल) मतदाता सूची की दिशा में व्यवस्था विकसित करना
चुनाव चक्रराज्यों के चुनावी चक्र को लोकसभा चुनाव के साथ जोड़ना

समिति के अनुसार पंचायत और नगरपालिकाओं के चुनावों को भी इसी चक्र से जोड़ने के लिए राज्यों की भूमिका और संवैधानिक बदलाव जरूरी होंगे।

लेकिन सबसे बड़ी चुनौती क्या है?

सरकार बीच में गिर गई तो क्या होगा? : यही सबसे कठिन संवैधानिक सवाल है। मान लीजिए किसी राज्य की विधानसभा में सरकार बहुमत खो देती है और विधानसभा समय से पहले भंग हो जाती है। या लोकसभा में सरकार गिर जाती है।

मौजूदा व्यवस्था में नई सरकार या सदन के लिए चुनाव हो सकता है और नया पांच साल का चक्र शुरू हो जाता है। लेकिन एक साथ चुनाव में ऐसा करने पर पूरा चुनाव चक्र फिर टूट जाएगा।

प्रस्तावित बिल में इसका समाधान यह है कि समय से पहले चुनाव होने पर बनी नई लोकसभा या विधानसभा सिर्फ बचे हुए कार्यकाल के लिए होगी। यानी अगर चुनाव मूल पांच साल के चक्र के दो साल बाद हुआ है, तो नई विधानसभा/लोकसभा का कार्यकाल सिर्फ बाकी तीन साल तक हो सकता है।

लेकिन इससे एक राजनीतिक सवाल भी पैदा होता है-क्या कोई सरकार सिर्फ दो-तीन साल के लिए चुनाव लड़ना चाहेगी? और क्या मतदाता ऐसी सरकार को स्थायी सरकार के रूप में देख पाएंगे?

अविश्वास प्रस्ताव का क्या होगा? : संसदीय लोकतंत्र में सरकार बहुमत खो सकती है। विधायक या सांसद अविश्वास प्रस्ताव ला सकते हैं। अगर सरकार गिरती है और कोई दूसरा दल या गठबंधन सरकार बनाने में सक्षम नहीं है तो क्या विधानसभा या लोकसभा को तुरंत भंग किया जाए?

उच्चस्तरीय समिति ने इस तरह के त्रिशंकु सदन, अविश्वास प्रस्ताव और दल-बदल की स्थितियों के लिए अलग व्यवस्था बनाने की जरूरत को स्वीकार किया था।

यानी एक साथ चुनाव कराने के लिए सिर्फ चुनाव की तारीख बदलना पर्याप्त नहीं है; सरकार गिरने की स्थिति में लोकतांत्रिक प्रक्रिया कैसे चलेगी, इसका भी स्पष्ट समाधान चाहिए।

पंचायत चुनाव सबसे जटिल क्यों हैं? : लोकसभा और विधानसभा चुनावों का संचालन मुख्य रूप से भारत निर्वाचन आयोग करता है। लेकिन पंचायत और नगरपालिकाओं के चुनाव राज्य निर्वाचन आयोगों के तहत होते हैं। इसके अलावा स्थानीय निकायों की अवधि और चुनावी व्यवस्था राज्यों में अलग-अलग हो सकती है।

इसलिए पंचायत से लोकसभा तक चुनाव को एक चक्र में लाने के लिए सिर्फ संसद का कानून पर्याप्त नहीं होगा। संविधान और राज्यों के चुनाव संबंधी कानूनों में भी बदलाव की जरूरत पड़ सकती है।

यही वजह है कि कोविंद समिति ने स्थानीय निकाय चुनावों को 100 दिनों के भीतर कराने के लिए अलग संवैधानिक व्यवस्था की सिफारिश की।

EVM और VVPAT की संख्या भी बड़ी चुनौती : एक साथ लोकसभा और विधानसभा चुनाव कराने के लिए हर मतदान केंद्र पर अलग-अलग EVM सेट की जरूरत होगी। चुनाव आयोग के अनुसार लोकसभा और विधानसभा के लिए दो अलग EVM सेट इस्तेमाल किए जाते हैं। यानी एक साथ बड़े पैमाने पर चुनाव कराने के लिए पर्याप्त संख्या में EVM और VVPAT मशीनें, रिजर्व मशीनें, परिवहन, भंडारण और सुरक्षा व्यवस्था तैयार करनी होगी।

इसके साथ करोड़ों मतदाताओं, लाखों मतदान कर्मचारियों और सुरक्षा बलों को एक बड़े चुनावी अभियान में तैनात करना होगा।

क्या इससे क्षेत्रीय मुद्दे दब जाएंगे? : यह राजनीतिक बहस का सबसे बड़ा हिस्सा है। विरोध करने वाले दलों का तर्क है कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव अलग-अलग होने से मतदाता राष्ट्रीय और स्थानीय मुद्दों पर अलग-अलग फैसला कर सकता है। एक साथ चुनाव में राष्ट्रीय मुद्दे, प्रधानमंत्री पद का चेहरा और केंद्र सरकार का प्रदर्शन विधानसभा चुनावों पर भी प्रभाव डाल सकता है।

दूसरी तरफ समर्थकों का कहना है कि मतदाता एक साथ भी अलग-अलग स्तरों पर अलग-अलग दलों को वोट देने में सक्षम है।
इसलिए इसका प्रभाव कितना होगा, यह सिर्फ चुनावी सिद्धांत से तय नहीं किया जा सकता; वास्तविक चुनावों के आंकड़ों से ही पता चलेगा।

संघीय ढांचे का सवाल : भारत में केंद्र और राज्य अलग-अलग सरकारें हैं। उनकी राजनीतिक प्राथमिकताएं और कार्यकाल भी अलग हो सकते हैं। आलोचकों की चिंता है कि एक ही समय पर चुनाव होने से राष्ट्रीय राजनीति का प्रभाव राज्यों की राजनीति पर बढ़ सकता है।

समर्थकों का जवाब है कि चुनाव की तारीख एक होने से मतदाता की पसंद खत्म नहीं होती और वह लोकसभा तथा विधानसभा के लिए अलग-अलग विकल्प चुन सकता है।

यही कारण है कि यह मुद्दा केवल चुनाव प्रबंधन का नहीं बल्कि भारतीय संघवाद और राजनीतिक प्रतिनिधित्व से भी जुड़ा है।

अभी स्थिति क्या है? : संविधान (129वां संशोधन) विधेयक, 2024 और संबंधित केंद्र शासित प्रदेश कानून संशोधन विधेयक दिसंबर 2024 में लोकसभा में पेश किए गए थे। दोनों विधेयक संयुक्त संसदीय समिति के पास हैं और अगस्त 2026 तक उनकी स्थिति ‘समिति में’ है। यानी एक देश-एक चुनाव अभी लागू नहीं हुआ है।

आखिर असली सवाल क्या है? : एक देश-एक चुनाव का सबसे बड़ा फायदा यह हो सकता है कि चुनाव कराने में लगने वाली प्रशासनिक और राजनीतिक ऊर्जा बार-बार खर्च न हो। लेकिन इसकी सबसे बड़ी चुनौती चुनाव एक साथ कराना नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था को लगातार एक साथ बनाए रखना है।

सरकार गिरने, विधानसभा भंग होने, त्रिशंकु सदन, अविश्वास प्रस्ताव, स्थानीय निकायों के अलग कार्यकाल, EVM-VVPAT की जरूरत और केंद्र-राज्य संबंध-इन सभी सवालों का स्थायी समाधान जरूरी होगा।

इसलिए ‘एक देश-एक चुनाव’ को केवल एक तारीख पर वोटिंग का प्रस्ताव समझना गलत होगा। यह भारत के चुनावी कैलेंडर, संविधान, संसद, विधानसभा, पंचायत, नगरपालिका और राजनीतिक व्यवस्था के काम करने के तरीके में बड़ा बदलाव होगा।

यही वजह है कि असली परीक्षा चुनाव आयोग की मशीनरी से ज्यादा संविधान और राजनीतिक सहमति की है।