
FCRA पर सरकार और विपक्ष आमने सामने क्यों?, PC- Chatgpt
भारत में विदेशी चंदे यानी Foreign Contribution को लेकर एक बार फिर बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। केंद्र सरकार Foreign Contribution (Regulation) Amendment Bill, 2026 के जरिए विदेशी फंड पाने वाले संगठनों पर निगरानी और जवाबदेही का दायरा बढ़ाना चाहती है। वहीं विपक्ष का आरोप है कि प्रस्तावित कानून से केंद्र सरकार को एनजीओ, धार्मिक संस्थानों, स्कूलों, अस्पतालों और सामाजिक संगठनों की संपत्तियों पर असाधारण अधिकार मिल जाएंगे।
फिलहाल यह कानून नहीं बना है। 25 मार्च 2026 को लोकसभा में पेश किया गया बिल 12 अगस्त को 31 सदस्यीय संयुक्त संसदीय समिति (JPC) को भेज दिया गया है। समिति को शीतकालीन सत्र के पहले सप्ताह में अपनी रिपोर्ट देनी है।
Foreign Contribution (Regulation) Act यानी FCRA विदेशी चंदे और विदेशी आतिथ्य को नियंत्रित करने वाला कानून है। मौजूदा कानून 2010 में बना और उसने 1976 के कानून की जगह ली। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विदेश से आने वाले पैसे का इस्तेमाल भारत के राष्ट्रीय हित के खिलाफ गतिविधियों में न हो।
विदेशी फंड पाने के लिए किसी पात्र संगठन को FCRA पंजीकरण लेना होता है। यह पंजीकरण पांच साल के लिए होता है और फिर इसका नवीनीकरण करना पड़ता है। कुछ संस्थाएं एक विशेष उद्देश्य और विशेष स्रोत के लिए पूर्व अनुमति के जरिए भी विदेशी चंदा ले सकती हैं।
गृह मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, 2019 से 2022 के बीच 13,520 संगठनों को करीब 55,741 करोड़ रुपये का विदेशी योगदान मिला था। 15 जुलाई 2026 तक 14,449 FCRA प्रमाणपत्र सक्रिय थे, जबकि बड़ी संख्या में प्रमाणपत्र रद्द या समाप्त भी हो चुके थे।
सबसे बड़ा बदलाव विदेशी पैसे से बनी संपत्तियों को लेकर है। अभी किसी संगठन का FCRA पंजीकरण रद्द या सरेंडर होने पर विदेशी योगदान और उससे बनी संपत्तियों को निर्धारित प्राधिकरण में निहित करने का प्रावधान है। नया बिल इस व्यवस्था को ज्यादा विस्तृत और संस्थागत बनाता है।
इसके लिए Designated Authority यानी नामित प्राधिकरण बनाया जाएगा। अगर किसी संगठन का FCRA प्रमाणपत्र रद्द होता है, वह खुद इसे सरेंडर करता है, नवीनीकरण नहीं कराता या नवीनीकरण का आवेदन खारिज हो जाता है, तो विदेशी फंड और उससे बनी संपत्तियां पहले अस्थायी रूप से इस प्राधिकरण के नियंत्रण में जा सकती हैं। तय अवधि में पंजीकरण बहाल या नवीनीकृत नहीं हुआ तो संपत्ति स्थायी रूप से भी प्राधिकरण के पास जा सकती है। यहीं से सबसे बड़ा विवाद पैदा हुआ है।
विपक्ष और कई नागरिक संगठनों की मुख्य चिंता संपत्ति जब्त या अपने नियंत्रण में लेने की व्यवस्था है। मान लीजिए किसी एनजीओ ने वर्षों पहले विदेशी चंदे से अस्पताल, स्कूल, पुस्तकालय या कोई अन्य इमारत बनाई। बाद में उसने विदेशी चंदा लेना बंद कर दिया और घरेलू दान से संस्था चलाने लगी। यदि उसका FCRA पंजीकरण नवीनीकृत नहीं हुआ, तो प्रस्तावित व्यवस्था के तहत विदेशी फंड से बनी संपत्ति भी नामित प्राधिकरण के नियंत्रण में जा सकती है।
और मामला सिर्फ 100 प्रतिशत विदेशी पैसे से बनी संपत्ति तक सीमित नहीं है। बिल में आंशिक रूप से विदेशी और आंशिक रूप से घरेलू फंड से बनी संपत्तियों को भी दायरे में रखा गया है। यही बात विपक्ष और संस्थाओं को सबसे ज्यादा चिंतित कर रही है।
2026 के FCRA नियमों में नवीनीकरण के लिए यह व्यवस्था जोड़ी गई है कि संगठन ने पिछले दो वित्तीय वर्षों में कम से कम 10 लाख रुपये का विदेशी योगदान इस्तेमाल किया हो, तो उसे अपने क्षेत्र में पर्याप्त सामाजिक गतिविधि करने वाला माना जाएगा।
इसका मतलब यह है कि कम विदेशी फंड पर निर्भर छोटे संगठनों के लिए FCRA पंजीकरण बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। खासकर वे संस्थाएं जो कभी-कभार विदेशी मदद लेती हैं, लेकिन जिनकी संपत्तियां पहले विदेशी योगदान से बनी थीं।
हालांकि, ₹10 लाख का नियम बिल का हिस्सा नहीं, बल्कि 2026 के FCRA नियमों में आया प्रावधान है। इसलिए बिल और नियमों को एक ही चीज मानना सही नहीं होगा।
सरकार का कहना है कि विदेशी फंड पर निगरानी जरूरी है और उसका मकसद किसी धर्म, समुदाय या संस्था को निशाना बनाना नहीं है। सरकार यह भी तर्क देती है कि मौजूदा FCRA में भी पंजीकरण रद्द या सरेंडर होने के बाद विदेशी फंड और उससे बनी संपत्तियों को प्राधिकरण में निहित करने का प्रावधान मौजूद है। नया बिल मुख्य रूप से संपत्तियों की निगरानी, प्रबंधन और निपटान की विस्तृत प्रक्रिया तय करता है।
सरकार के अनुसार, विदेशी धन का इस्तेमाल पारदर्शी तरीके से होना चाहिए और किसी संगठन की गतिविधियां राष्ट्रीय हित के खिलाफ नहीं जानी चाहिए।
यह मुद्दा इसलिए भी राजनीतिक रूप से संवेदनशील है क्योंकि कई धार्मिक संस्थाएं और चर्च-संबंधित संगठन विदेशी योगदान प्राप्त करते हैं। बिल में हालांकि पूजा स्थल के लिए विशेष प्रावधान है। अगर विदेशी योगदान से जुड़ी ऐसी संपत्ति स्थायी रूप से प्राधिकरण के पास चली जाती है, तो उसके धार्मिक चरित्र को बनाए रखने की व्यवस्था प्रस्तावित है।
इसके बावजूद विपक्ष और धार्मिक संगठनों को डर है कि संपत्ति के प्रबंधन का अधिकार सरकारी नियंत्रण में जाने से संस्थानों की स्वायत्तता प्रभावित हो सकती है।
बिल में किसी FCRA अपराध की जांच शुरू करने से पहले केंद्र सरकार की मंजूरी की जरूरत का प्रावधान प्रस्तावित है। सरकार इसे प्रक्रिया को व्यवस्थित करने वाला कदम मानती है, जबकि आलोचकों को लगता है कि इससे केंद्र के हाथ में ज्यादा नियंत्रण आ जाएगा।
वहीं एक दिलचस्प बदलाव यह है कि मौजूदा कानून में अधिकतम पांच साल की जेल का प्रावधान है, जिसे बिल एक साल करने का प्रस्ताव रखता है। यानी कुछ मामलों में सजा की अधिकतम अवधि घटाने का भी प्रस्ताव है।
| समूह | संभावित असर |
| विदेशी फंड लेने वाले एनजीओ | नवीनीकरण और अनुपालन की निगरानी बढ़ेगी |
| छोटे सामाजिक संगठन | ₹10 लाख के नियम के कारण दबाव बढ़ सकता है |
| विदेशी फंड से बनी संपत्ति वाले संस्थान | पंजीकरण खत्म होने पर संपत्ति जोखिम में आ सकती है |
| स्कूल और अस्पताल चलाने वाले संगठन | संपत्ति और प्रशासन पर असर की आशंका |
| धार्मिक संस्थान | संपत्ति प्रबंधन को लेकर चिंता |
| सरकार | निगरानी और संपत्ति प्रबंधन के अधिक अधिकार |
| घरेलू फंड पर चलने वाले पूर्व FCRA संगठन | पुरानी विदेशी फंड से बनी संपत्तियों को लेकर विशेष जोखिम |
FCRA विवाद को सिर्फ 'विदेशी पैसा लेना चाहिए या नहीं' के सवाल से समझना अधूरा होगा। असली सवाल यह है कि विदेशी पैसे से बनी संपत्ति और उस पर संस्था का अधिकार कितना रहेगा, जब उसका FCRA पंजीकरण खत्म हो जाए।
विपक्ष का सवाल है कि अगर नवीनीकरण खारिज होने पर संपत्ति चली जाती है तो संस्था को पर्याप्त सुनवाई और अपील का अधिकार क्यों नहीं होना चाहिए। PRS ने भी नोट किया है कि नवीनीकरण से इनकार के मामले में बिल में स्पष्ट अपील व्यवस्था नहीं है।
सरकार के सामने दूसरी तरफ यह चुनौती है कि विदेशी फंड के दुरुपयोग को रोकने के लिए प्रभावी व्यवस्था भी हो और वैध सामाजिक, धार्मिक तथा परोपकारी संस्थाओं के काम में अनावश्यक बाधा भी न आए।
अभी अंतिम फैसला नहीं हुआ है। बिल JPC के पास है और समिति की सिफारिशों के बाद इसमें बदलाव संभव हैं। इसलिए फिलहाल यह कहना सही नहीं होगा कि नया FCRA कानून लागू हो चुका है। लेकिन इतना साफ है कि यह बहस आने वाले समय में विदेशी चंदे, नागरिक समाज की स्वतंत्रता और केंद्र-राज्य अधिकारों के बीच संतुलन का बड़ा सवाल बनने वाली है।
Updated on:
25 Aug 2026 11:35 am
Published on:
25 Aug 2026 10:43 am
