
अमेरिका की हार्वर्ड यूनिवर्सिटी और ब्रॉड इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने बड़ी सफलता प्राप्त की है। वैज्ञानिकों ने लैब में निर्मित इंसानी 'मिनी-ब्रेन' यानी ब्रेन ऑर्गेनॉइड को करीब 7 साल तक जिंदा रखने में सफलता हासिल की है। इस शोध का नेतृत्व हार्वर्ड की स्टेम सेल एंड रीजेनरेटिव बायोलॉजी विभाग की प्रोफेसर पाओला अर्लोटा ने किया। हार्वर्ड की अपनी न्यूज साइट FAS करंट और ब्रॉड इंस्टीट्यूट के आधिकारिक बयान के मुताबिक, टीम ने 5 साल तक के आंकड़ों का विस्तृत विश्लेषण किया, जबकि कुछ ऑर्गेनॉइड्स को करीब 7 साल तक जीवित रखा गया। प्रयोग पूरा होने के बाद नियमों के तहत इन ऊतकों को नष्ट कर दिया गया। यह अध्ययन 19 अगस्त 2026 को प्रतिष्ठित जर्नल 'नेचर' में प्रकाशित हुआ।
स्टेम सेल्स की मदद से तैयार किए गए 3D ऑर्गेनॉइड्स आकार में काली मिर्च के दाने जितने छोटे थे, लेकिन इनमें 10 लाख से भी ज्यादा जीवित मस्तिष्क कोशिकाएं यानी न्यूरॉन्स मौजूद थीं। शोधकर्ताओं ने कल्चर मीडियम यानी न्यूट्रिएंट लिक्विड में सुधार करके 70वें दिन से एक 'एक्टिविटी-परमिसिव' यानी विद्युत गतिविधि को बढ़ावा देने वाला माध्यम अपनाकर न्यूरॉन्स को महीनों की बजाय सालों तक जीवित और सक्रिय बनाए रखा। परिणामस्वरूप ये कोशिकाएं लंबे समय तक आपस में इलेक्ट्रिकल सिग्नल भेजती रहीं।
अमेरिकन साइंस पत्रिका 'साइंटिफिक अमेरिकन' और समाचार एजेंसी 'AFP' की रिपोर्टों के अनुसार, इससे पहले ब्रेन ऑर्गेनॉइड को अधिकतम 694 दिन यानी करीब दो साल तक ही जीवित रखा जा सका था। यह पुराना रिकॉर्ड 2021 में UCLA और स्टैनफर्ड के वैज्ञानिकों आरोन गॉर्डन और सर्गियू पासका ने 'नेचर न्यूरोसाइंस' जर्नल में प्रकाशित अपने अध्ययन में बनाया था। हार्वर्ड की नई उपलब्धि इस पुराने रिकॉर्ड से करीब साढ़े तीन गुना ज्यादा है, जिसने साबित कर दिया कि लैब में भी दिमाग की कोशिकाएं वर्षों तक फल-फूल सकती हैं।
अध्ययन का सबसे चौंकाने वाला हिस्सा वह प्रयोग रहा, जिसे अर्लोटा की टीम ने 'काइमेरा' नाम दिया। शोधकर्ताओं ने करीब एक साल पुरानी कोशिकाओं को महज दो हफ्ते पुरानी युवा कोशिकाओं के साथ मिलाया। नतीजा यह निकला कि पुरानी कोशिकाएं शुरुआती चरणों को छोड़कर सीधे आगे की, ज्यादा परिपक्व अवस्था की कोशिकाएं बनाने लगीं। मानो उन्हें अपनी 'जैविक उम्र' का भान हो।
हार्वर्ड गजट FAS करंट में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, इसे टीम ने कोशिकाओं की एक तरह की 'टाइम मेमोरी' करार दिया है। साथ ही, तीन स्वतंत्र जेनेटिक और एपिजेनेटिक 'घड़ियों' (मॉलिक्युलर क्लॉक्स) से यह भी पुष्टि हुई कि ऑर्गेनॉइड्स ठीक उसी क्रम में परिपक्व हो रहे थे, जिस क्रम में मां के गर्भ से जन्म के बाद तक असली इंसानी दिमाग विकसित होता है न कि किसी तेज या असामान्य रफ्तार से।
अर्लोटा प्रयोगशाला पहले से ही ऑटिज्म और स्किजोफ्रेनिया जैसे मनोरोगों को समझने के लिए मरीजों की कोशिकाओं से बने ऑर्गेनॉइड्स पर काम करती रही है। नए, लंबी उम्र के ऑर्गेनॉइड मॉडल से अब वैज्ञानिक यह भी देख सकेंगे कि ऑटिज्म, स्किजोफ्रेनिया जैसी बीमारियां बचपन में दिमाग के विकास के किस मोड़ पर आकार लेती हैं।
ये ऑर्गेनॉइड्स अब बड़ी उम्र तक जीवित रह सकते हैं। इसलिए अल्जाइमर और डिमेंशिया जैसी उम्र से जुड़ी बीमारियों में मस्तिष्क कोशिकाएं समय के साथ कैसे क्षतिग्रस्त होती हैं। इसका अध्ययन भी अब लैब में संभव होगा। मरीज की अपनी कोशिकाओं से 'पर्सनलाइज्ड' ऑर्गेनॉइड बनाकर भविष्य में दवाओं के असर का परीक्षण भी तेज़ किया जा सकेगा।
प्रोफेसर अर्लोटा के हवाले से ब्रॉड इंस्टीट्यूट के बयान में कहा गया है कि शोध टीम का लक्ष्य महज रिकॉर्ड बनाना नहीं था। टीम का लक्ष्य यह समझना था कि लैब की परिस्थितियों में इंसानी मस्तिष्क ऊतक कितनी दूर तक विकसित हो सकता है। अब जब यह सिद्ध हो चुका है, शोधकर्ताओं की अगली प्राथमिकता 7 साल इंतजार करने की बजाय 'टाइम वार्प' यानी काइमेरा तकनीक का इस्तेमाल कर दिमाग के अहम विकास-चरणों को प्रयोगशाला में तेज़ी से दोहराना है, ताकि नई दवाओं और उपचारों का परीक्षण जल्दी किया जा सके। वैज्ञानिकों ने साफ किया है कि इन ऑर्गेनॉइड्स में सोचने-समझने या चेतना (कॉन्शियसनेस) जैसी क्षमता नहीं पाई गई है, और अनुसंधान से जुड़े नैतिक नियमों का पूरा पालन किया गया।