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भारत का इंटरनेट समुद्र के नीचे चलता है: एक केबल कट गई तो देश कितने घंटे में ठप हो सकता है?

Submarine Cables Internet Security India : दुनिया का 99% डेटा समुद्र के नीचे बिछी सबमरीन केबलों से गुजरता है। जानें कि यदि ये केबल कट जाएं तो भारत के इंटरनेट, UPI, डेटा सेंटर और सुरक्षा पर क्या असर पड़ेगा।
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Aug 24, 2026
Submarine Cables Internet Security India
Submarine Cables Internet Security India : कैसे समुद्र में बिछा है केबल का जाल, PC- Chatgpt

आप मोबाइल पर वीडियो देखते हैं, यूपीआई से भुगतान करते हैं, शेयर खरीदते हैं, किसी विदेशी वेबसाइट पर जाते हैं या क्लाउड पर अपना डेटा रखते हैं। आपको लगता है कि यह सब मोबाइल टावर, फाइबर और सैटेलाइट से चल रहा है। लेकिन इंटरनेट की वैश्विक रीढ़ जमीन पर नहीं, समुद्र के नीचे बिछी है।

दुनिया के अंतरराष्ट्रीय डेटा ट्रैफिक का 99% से ज्यादा हिस्सा सबमरीन कम्युनिकेशन केबलों से गुजरता है। दुनिया में ऐसी केबलों का नेटवर्क 17 लाख किलोमीटर से ज्यादा लंबा हो चुका है और हर साल करीब 200 केबल फॉल्ट सामने आते हैं।

भारत भी इसी नेटवर्क पर निर्भर है। इसलिए सवाल यह नहीं है कि “एक केबल कटेगी तो इंटरनेट बंद होगा या नहीं?” असली सवाल है। कितनी केबलें एक साथ प्रभावित हों तो भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था गंभीर संकट में आ सकती है?

भारत का इंटरनेट विदेशों तक कैसे पहुंचता है?

भारत में आपके फोन से निकला डेटा पहले स्थानीय मोबाइल नेटवर्क या फाइबर नेटवर्क तक जाता है। अगर आपको किसी विदेशी सर्वर से जुड़ना है तो डेटा International Gateway तक पहुंचता है।

इसके बाद रास्ता समुद्र के नीचे बिछी फाइबर-ऑप्टिक केबल का होता है। केबल समुद्र के तल से हजारों किलोमीटर की दूरी तय करती हुई दूसरे देश तक जाती है। वहां से डेटा यूरोप, अमेरिका, एशिया या किसी दूसरे क्षेत्र के डेटा सेंटर तक पहुंचता है।

इसे ऐसे समझिए-आपका मोबाइल → टेलीकॉम नेटवर्क → इंटरनेट गेटवे → Cable Landing Station → समुद्र के नीचे केबल → दूसरे देश का नेटवर्क → सर्वर

समुद्र के किनारे जहां यह केबल जमीन पर आती है, उसे Cable Landing Station (CLS) कहा जाता है। यही स्टेशन भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं।

भारत में कितनी सबमरीन केबलें हैं?

यहां आंकड़ा थोड़ा सावधानी से समझना जरूरी है क्योंकि active, planned और commissioning वाली केबलों की संख्या अलग-अलग हो सकती है। TRAI के उपलब्ध आंकड़ों में भारत में पांच प्रमुख तटीय शहरों-मुंबई, चेन्नई, कोच्चि, तिरुवनंतपुरम और तूतीकोरिन में कई केबल लैंडिंग स्टेशन हैं। TRAI के एक पूर्व आधिकारिक आकलन में दिसंबर 2021 तक 17 submarine cables और 15 cable landing stations का उल्लेख था। इसके बाद नेटवर्क तेजी से बढ़ा है।

मार्च 2026 में सरकार ने लोकसभा में बताया कि चार नए submarine cable systems commissioning के अलग-अलग चरण में थे और तीन अन्य की योजना बनाई जा रही थी। इनमें India-Europe Xpress, SEA-ME-WE-6, 2Africa और Raman Cable शामिल हैं।

यानी भारत अब सिर्फ पुरानी केबलों पर निर्भर नहीं है, बल्कि नई और ज्यादा क्षमता वाली केबलें भी नेटवर्क में जुड़ रही हैं। मसलन, SEA-ME-WE-6 की कुल लंबाई करीब 21,700 रूट किलोमीटर है और Airtel के मुताबिक भारत के लिए इसमें 220 Tbps क्षमता उपलब्ध होगी।

फिर एक केबल कटने पर क्या होगा?

पूरा भारत ठप नहीं होगा। यही सबसे जरूरी बात है। इंटरनेट नेटवर्क को इस तरह डिजाइन किया जाता है कि एक केबल खराब होने पर डेटा को दूसरी केबल या दूसरे रूट से भेजा जा सके। इसे redundancy कहते हैं। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब-

  • एक साथ कई केबल कट जाएं
  • किसी महत्वपूर्ण Cable Landing Station पर समस्या आए
  • किसी खास क्षेत्र की ज्यादातर क्षमता एक ही रूट से गुजरती हो
  • वैकल्पिक रूट में पर्याप्त क्षमता न हो

ऐसी स्थिति में इंटरनेट पूरी तरह बंद होने के बजाय धीमा, महंगा या अस्थिर हो सकता है। यानी सवाल “इंटरनेट बंद होगा?” से ज्यादा महत्वपूर्ण है-

'कितनी अंतरराष्ट्रीय बैंडविड्थ बची रहेगी?'

UPI, बैंकिंग और शेयर बाजार पर क्या असर होगा? यहां भी एक जरूरी अंतर समझना होगा। भारत में UPI और भुगतान संबंधी सिस्टम का महत्वपूर्ण डेटा देश में रखने के लिए RBI के नियम हैं। सरकार ने भी 2026 में बताया कि payment-system data को भारत में स्टोर करने की व्यवस्था लागू है। इसलिए एक अंतरराष्ट्रीय submarine cable कटते ही UPI पूरे देश में बंद हो जाएगा, ऐसा कहना गलत होगा। लेकिन इसका अप्रत्यक्ष असर हो सकता है।

UPI और बैंकिंग

अगर किसी बैंक, फिनटेक, क्लाउड सेवा या विदेशी नेटवर्क से जुड़ी अंतरराष्ट्रीय कनेक्टिविटी प्रभावित होती है तो कुछ सेवाओं में धीमापन, timeout या अस्थायी व्यवधान आ सकता है।

शेयर बाजार

भारतीय एक्सचेंजों के घरेलू कारोबार के लिए इंटरनेट की पूरी निर्भरता समुद्री केबल पर नहीं है। लेकिन वैश्विक बाजारों, विदेशी निवेशकों, डेटा फीड, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों और क्लाउड सेवाओं से जुड़ी कनेक्टिविटी प्रभावित हो सकती है।

क्लाउड और AI

यह सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में से एक है। भारत में डेटा सेंटर क्षमता 2020 के 375 MW से बढ़कर 2025 तक 1,500 MW से ज्यादा हो चुकी थी। मुंबई/नवी मुंबई और चेन्नई बड़े डेटा सेंटर केंद्र हैं।

अगर किसी क्षेत्र की अंतरराष्ट्रीय कनेक्टिविटी कमजोर होती है तो क्लाउड, SaaS, विदेशी सर्वर और वैश्विक डिजिटल सेवाओं में latency बढ़ सकती है।

केबल टूटती कैसे है?

लोग अक्सर सोचते हैं कि इतनी महत्वपूर्ण केबल समुद्र में किसी विस्फोट या दुश्मन के हमले से ही टूटती होगी। असलियत काफी अलग है। दुनिया में 70-80% केबल फॉल्ट मानव गतिविधियों से जुड़े हैं, खासकर fishing और ship anchors से। यानी समुद्र में मछली पकड़ने वाला कोई भारी उपकरण या जहाज का लंगर केबल से उलझ जाए तो वह टूट सकती है। इसके अलावा कारण हैं-

  • समुद्र के नीचे भूकंप
  • समुद्री भूस्खलन
  • तेज समुद्री धाराएं
  • तूफान
  • उपकरण की खराबी
  • समुद्र तल का घिसाव

ITU के अनुसार 2025 में दुनिया भर में 170 से ज्यादा cable repairs दर्ज किए गए। इसलिए हर केबल कटने को “साजिश” या 'साइबर अटैक' मानना सही नहीं है।

क्या केबल जानबूझकर भी काटी जा सकती है?

हां, यह सुरक्षा चिंता है- लेकिन हर घटना को sabotage कहना गलत होगा। पिछले कुछ वर्षों में यूरोप, एशिया और मध्य-पूर्व के आसपास submarine cable incidents ने देशों की चिंता बढ़ाई है। मार्च 2026 में पश्चिम एशिया में बढ़े तनाव के बीच भारत सरकार ने भी टेलीकॉम कंपनियों और केबल ऑपरेटरों से risk assessment और fallback plans तैयार करने को कहा था।

क्योंकि युद्ध या भू-राजनीतिक तनाव की स्थिति में समुद्र के नीचे का infrastructure भी रणनीतिक निशाना बन सकता है। लेकिन यहां एक अहम तथ्य है- दुनिया में अधिकांश केबल क्षति अभी भी दुर्घटनाओं के कारण होती है।

अगर केबल कट गई तो कितने घंटे में भारत ठप होगा?

इसका कोई एक तय जवाब नहीं है। एक अकेली केबल कटने पर भारत कुछ घंटों में ठप हो जाएगा, ऐसा कहना गलत होगा। अगर नेटवर्क में पर्याप्त वैकल्पिक क्षमता है तो ट्रैफिक दूसरी केबलों पर भेजा जा सकता है और आम उपभोक्ता को बहुत कम असर महसूस हो सकता है।

दूसरी तरफ, अगर किसी महत्वपूर्ण क्षेत्र में कई केबल एक साथ प्रभावित होती हैं तो असर घंटों से लेकर कई दिनों तक रह सकता है।

मरम्मत में भी समय लगता है। ITU के अनुसार cable repair शुरू होने में regulatory approvals, repair ship की उपलब्धता और मौसम जैसी चीजें बाधा बन सकती हैं।

तकनीकी मानकों के मुताबिक समुद्र में क्षतिग्रस्त हिस्से को निकालकर नया हिस्सा जोड़ने की पूरी प्रक्रिया में एक से तीन सप्ताह तक लग सकते हैं, हालांकि वास्तविक समय fault की जगह और परिस्थितियों पर निर्भर करता है। इसलिए असली सुरक्षा कवच तेजी से मरम्मत से ज्यादा वैकल्पिक रास्ते हैं।

भारत की सबसे बड़ी कमजोरी क्या है?

भारत के लिए समस्या सिर्फ समुद्र में केबलों की संख्या नहीं है। Landing points का भौगोलिक केंद्रीकरण भी बड़ा जोखिम है।
भारत के अंतरराष्ट्रीय submarine network का बड़ा हिस्सा मुंबई और चेन्नई जैसे कुछ प्रमुख तटीय केंद्रों पर केंद्रित है। TRAI ने भी पहले मुंबई और चेन्नई में submarine cable landing की उच्च concentration को रेखांकित किया था।

यही कारण है कि अब नए landing locations और अलग-अलग समुद्री routes विकसित करने पर जोर है। अगर सारी सड़कें एक ही पुल से गुजरें तो पुल टूटने पर पूरा शहर फंस जाएगा। इंटरनेट की कहानी भी कुछ ऐसी ही है।

क्या भारत अपनी submarine cable खुद बना सकता है?

भारत के पास optical fibre, telecom equipment और cable-related manufacturing में मजबूत क्षमता है। उदाहरण के लिए STL भारत में optical fibre manufacturing और advanced optical connectivity पर काम कर रही है और 2026 में उसने भारत में विकसित hollow-core fibre technology भी पेश की। लेकिन यहां एक बड़ा अंतर है।

Optical fibre बनाना और पूरी deep-sea submarine cable system बनाना एक ही बात नहीं है। समुद्री केबल में fibre के अलावा विशेष protective layers, repeaters, power-feeding equipment, marine installation technology, cable ships और repair ecosystem की जरूरत होती है। उदाहरण के लिए SEA-ME-WE-6 को SubCom ने engineer, manufacture और install किया है।

हालिया भारतीय डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर आकलन में भी subsea cable manufacturing को उन क्षेत्रों में शामिल किया गया है जहां भारत अभी विदेशी तकनीक और आपूर्ति शृंखलाओं पर निर्भर है।

इसलिए भारत के सामने अगला लक्ष्य सिर्फ “हमारी अपनी केबल” नहीं, बल्कि पूरी subsea ecosystem विकसित करना है।

क्या समुद्र के नीचे का इंटरनेट अगली राष्ट्रीय सुरक्षा चुनौती है?

तेजी से हां। आज बैंकिंग, शेयर बाजार, क्लाउड, सरकारी सेवाएं, AI, ई-कॉमर्स, वीडियो कॉल और अंतरराष्ट्रीय व्यापार—सब डिजिटल नेटवर्क पर निर्भर हैं और इस पूरे डिजिटल सिस्टम का एक बड़ा हिस्सा समुद्र के नीचे है। ITU ने submarine cables को वैश्विक डिजिटल अर्थव्यवस्था की critical infrastructure माना है।

भारत के लिए चुनौती तीन स्तरों पर है-

  • पहला-भौगोलिक: कुछ landing points पर ज्यादा निर्भरता।
  • दूसरा-तकनीकी: केबल निर्माण, repair और specialised equipment में विदेशी निर्भरता।
  • तीसरा-रणनीतिक: युद्ध, समुद्री तनाव या जानबूझकर नुकसान की स्थिति में वैकल्पिक नेटवर्क की जरूरत।

इसीलिए TRAI ने अगस्त 2026 में submarine cable landing के licensing और regulatory framework पर नई recommendations भी जारी की हैं।

हम इंटरनेट को हवा में चलने वाली चीज समझते हैं। असल में उसका सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा कांच के बेहद पतले fibre strands में और समुद्र के तल पर चलता है।

एक केबल कटने से भारत बंद नहीं होगा। लेकिन अगर कई महत्वपूर्ण केबल, कुछ प्रमुख landing stations और वैकल्पिक routes एक साथ प्रभावित हुए तो असर सिर्फ YouTube या Instagram तक सीमित नहीं रहेगा। बैंकिंग, क्लाउड, कारोबार, वित्तीय बाजार और सरकारी सेवाओं तक इसकी लहर पहुंच सकती है।

और यही वजह है कि भारत के डिजिटल भविष्य की सुरक्षा के लिए अब सिर्फ डेटा सेंटर, 5G और AI बनाना काफी नहीं है। समुद्र के नीचे जाने वाली उस डिजिटल सड़क की भी सुरक्षा करनी होगी, जिस पर भारत की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा दौड़ रहा है।

Updated on:
24 Aug 2026 03:54 pm
Published on:
24 Aug 2026 03:54 pm