
Thyroid History: आज थायरॉयड को लोग वजन बढ़ने, थकान, बाल झड़ने या हार्मोन की समस्या के रूप में जानते हैं। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इस बीमारी का इतिहास करीब 2700 साल पुराना है। इस बीमारी को आज आधुनिक जांच और दवाओं से नियंत्रित किया जाता है, लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि इसका इलाज हजारों साल पहले समुद्री शैवाल (Seaweed) से किया जाता था। उस समय न हार्मोन की जानकारी थी और ना ही आयोडीन का पता था। इसके अलावा थायरॉयड ग्रंथि के काम करने की वैज्ञानिक समझ भी विकसित नहीं हुई थी। इसके बावजूद प्राचीन चिकित्सकों ने अनुभव के आधार पर इसका ऐसा उपचार खोज लिया था, जिसे आधुनिक विज्ञान ने बाद में सही साबित किया। patrika.com पर संजना कुमार के साथ पढ़ें 'थायरॉयड इतिहास विज्ञान और समाधान' सीरीज का पहला भाग...थायरॉयड का हजारों साल पुराना इतिहास..
थायरॉयड का सबसे प्राचीन उल्लेख लगभग 2697 BCE में प्राचीन चीन के चिकित्सा ग्रंथों में मिलता है। उस समय गर्दन में होने वाली असामान्य सूजन (Goiter) का वर्णन किया गया था। मरीजों को समुद्री शैवाल और समुद्री जीवों से बने पदार्थ खिलाए जाते थे। बाद में वैज्ञानिकों ने पाया कि समुद्री शैवाल आयोडीन का प्राकृतिक स्रोत है। इसके साथ ही यह बात सामने आई कि आयोडीन की कमी ही गॉइटर का प्रमुख कारण है। इससे साफ है कि हजारों साल पहले अपनाया गया उपचार आधुनिक विज्ञान की कसौटी पर भी बिल्कुल सही साबित हुआ।
इसके बाद 17वीं सदी में थायरॉयड के इलाज में चिकित्सा विज्ञान ने एक नया मोड़ लिया। सन 1656 में ब्रिटिश चिकित्सक थॉमस व्हार्टन (Thomas Wharton) ने पहली बार इस ग्रंथि का गहराई से वैज्ञानिक वर्णन किया। गले की इस ग्रंथी को थायरॉयड नाम दिया। दरअसल यह नाम ग्रीक शब्द Thyreos से लिया गया था। थाइरिओस का अर्थ है ढाल। इसकी आकृति ढाल जैसी दिखाई देने के कारण इसे यह नाम दिया गया था। हालांकि उस समय भी यह स्पष्ट नहीं था कि यह ग्रंथि शरीर में क्या भूमिका निभाती है।
सन् 1811 में फ्रांसीसी रसायनशास्त्री बर्नार्ड कोर्टुआ (Bernard Courtois) ने आयोडीन की खोज की। इसके कुछ साल बाद ही चिकित्सक जीन फ्रांस्वा कॉइंडे (Jean-François Coindet) ने गॉइटर के मरीजों पर आयोडीन का सफल प्रयोग किया। इसे चिकित्सा विज्ञान की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक माना गया। दरअसल ऐसा पहली बार था कि यह स्पष्ट हो सका कि थायरॉयड और आयोडीन का गहरा संबंध है। आगे चलकर कई देशों में आयोडीन युक्त नमक की शुरुआत हुई, इससे गॉइटर और आयोडीन की कमी से होने वाली बीमारियों में उल्लेखनीय कमी देखी गई।
20वीं सदी में थायरॉयड से जुड़ी एक और बड़ी खोज हुई। सन् 1912 में जापानी डॉक्टर हाकारू हाशिमोटो (Hakaru Hashimoto) ने पहली बार एक ऐसी बीमारी का वर्णन किया, जिसमें इम्यून सिस्टम खुद ही थायरॉयड ग्रंथि पर हमला करती है। आज इसे हाशिमोटो थायरॉइडाइटिस कहा जाता है और यह हाइपोथायरॉयडिज्म का सबसे सामान्य कारण माना जाता है।
इस खोज से यह समझने में मदद मिली कि थायरॉयड की हर समस्या केवल आयोडीन की कमी से नहीं होती, बल्कि कई मामलों में ऑटोइम्यून कारण भी इस बीमारी के लिए जिम्मेदार होते हैं।
आज विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और विभिन्न अंतरराष्ट्रीय शोध बताते हैं कि आयोडीन की कमी दुनिया के कई हिस्सों में अब भी सार्वजनिक स्वास्थ्य की चुनौती बनी हुई है। वहीं मॉडर्न लाइफस्टाइल, जेनेटिक कारण, ऑटोइम्यून रोग और पर्यावरणीय कारक भी थायरॉयड की बढ़ती संख्या में भूमिका निभा रहे हैं। यही कारण है कि यह बीमारी केवल एक हार्मोन संबंधी समस्या नहीं है, बल्कि वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य का महत्वपूर्ण विषय बन चुकी है।
गौरतलब है कि करीब 2700 साल पहले शैवाल से शुरू हुई थायरॉयड की कहानी आज की आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के सबसे महत्वपूर्ण अध्यायों में शामिल है। समय के साथ आयोडीन की, हार्मोन और ऑटोइम्यून से जुड़ी बीमारियों पर हुई खोजों और शोधों ने इस रोग को जानने और समझने का नजरिया पूरी तरह से बदल दिया है। लेकिन सवाल यह भी है कि इतनी वैज्ञानिक प्रगति के बावजूद थायरॉयड के मरीज लगातार बढ़ रहे हैं। आखिर क्या है थायरॉयड... अगले भाग में हम आसान भाषा में ढूंढेंगे इस सवाल का जवाब...तब तक ऐसी रोचक खबरों और जानकारी के लिए पढ़ते रहिए patrika.com और जुड़े रहिए हमारे साथ।