
Muscle Loss after 40 in Indian: भारतीयों की डाइट में प्रोटीन बहुत कम, 40 की उम्र से ही कम हो रहीं मांसपेशियों को लेकर जताई चिंता। भारत के मशहूर एक्सपर्ट्स से जानें प्रोटीन कैसे बनाएगा हेल्दी मसल्स? (AI Creative)
Muscle Loss After 40: क्या आपको भी सीढ़ियां चढ़ते समय सांस फूलने लगती है? कुर्सी से उठने पर जोर लगाना पड़ रहा है? उंगलियों की पकड़ कमजोर हो रही है? क्या पहले जैसी ताकत महसूस नहीं हो रही? 40 की उम्र पार करते ही अगर आप भी महसूस कर रह हैं ये लक्षण तो भूलकर भी इन्हें नजरअंदाज न करें। विशेषज्ञों के मुताबिक यह सारकोपेनिया (Sarcopenia) यानी मांसपेशियों के लगातार कम होने का संकेत हो सकता है। क्या है सारकोपनिया, 60 साल में होने वाली बीमारी अब कम उम्र में ही क्यों कर रही परेशान? patrika.com पर पढ़ें भारत के मशहूर डॉक्टर्स और डायटिशियन्स की सलाह और शोध पर आधारित खास पेशकश...
एक्सपर्ट्स बताते हैं कि भारत में यह समस्या तेजी से बढ़ रही है। पहले इसे 60 साल से ज्यादा उम्र के लोगों यानी बुढ़ापे की बीमारी माना जाता था, लेकिन अब डॉक्टर्स का कहना है कि बिगड़ती लाइफ स्टाइल और बढ़ती डायबिटीज के कारण 40-45 साल की उम्र से ही मांसपेशियों का क्षय होना शुरू हो सकता है। सबसे बड़ी चिंता यह है कि ज्यादातर लोगों को इसका पता तब चलता है, जब शरीर की ताकत काफी कम हो चुकी होती है।
अंजना बताती है भारतीयों की थाली में कार्बोहाइड्रेट ज्यादा मात्रा में रहता है और प्रोटीन कम होता है। रोटी, चावल और आलू भरपूर मात्रा में खाए जाते हैं, लेकिन दाल, दूध, अंडे, पनीर या अन्य प्रोटीन स्रोत अक्सर पर्याप्त मात्रा में नहीं लिए जाते। शरीर को नई मांसपेशियां बनाने के लिए प्रोटीन चाहिए। इसकी कमी होने पर मांसपेशियां धीरे-धीरे घटने लगती हैं।
इसके अलावा भारत दुनिया में सबसे ज्यादा डायबिटीज मरीजों वाले देशों में शामिल है। लगातार बढ़ी हुई ब्लड शुगर मांसपेशियों की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाती है। इसके अलावा मोटापा, विटामिन-डी की कमी और घंटों बैठकर काम करने की आदत इस खतरे को और बढ़ा देती है।
मांसपेशियां शरीर को केवल ताकत ही नहीं देतीं, बल्कि संतुलन बनाए रखने, ब्लड शुगर नियंत्रित करने और हड्डियों को सहारा देने का भी काम करती हैं। जब मांसपेशियां कम होने लगती हैं, तो गिरने, फ्रैक्चर, अस्पताल में भर्ती होने और समय से पहले दूसरों पर निर्भर होने का खतरा बढ़ जाता है।
दरअसल मसल्स लॉस के कारण मेटाबॉलिज्म धीमा हो जाता है। इसके कारण बॉडी में फैट तेजी से बढ़ता है और वजन कम करना मुश्किल हो जाता है। इसका नतीजा बाद में कमजोरी, थकान, संतुलन बिगड़ने और मामूली चोट से हड्डियों में गंभीर फ्रैक्चर होने का खतरा भी बढ़ जाता हैं और दिखने लगते हैं कई संकेत।
विशेषज्ञों का कहना है कि रजोनिवृत्ति यानी मेनोपॉज के बाद महिलाओं में हार्मोनल बदलाव के कारण मांसपेशियां तेजी से कम हो सकती हैं। यदि इसके साथ कैल्शियम, विटामिन-डी और प्रोटीन की कमी भी हो, तो हड्डियां और मांसपेशियां दोनों कमजोर होने लगती हैं।
डॉक्टरों का कहना है कि रोजाना पर्याप्त प्रोटीन लेना, सप्ताह में कम से कम दो से तीन दिन स्ट्रेंथ एक्सरसाइज करना, नियमित पैदल चलना और विटामिन-डी की जांच कराना इस समस्या से बचाव के सबसे प्रभावी उपाय हैं। विशेषज्ञ यह भी सलाह देते हैं कि 40 साल के बाद साल में कम से कम एक बार मांसपेशियों की ताकत और शरीर की संरचना यानी बॉडी कॉम्पोजिशन (Body Composition) की जांच करानी चाहिए। खासकर यदि व्यक्ति को डायबिटीज, मोटापा या थायरॉयड जैसी समस्या हो तो यह टेस्ट और भी जरूरी हो जाता है।
भारत में औसत आयु बढ़ रही है, लेकिन यदि लोग हेल्दी मसल्स के साथ उम्र नहीं बढ़ाएंगे, तो आने वाले वर्षों में फ्रैक्चर, विकलांगता और बुजुर्गों की निर्भरता का बोझ तेजी से बढ़ सकता है। इसलिए डॉक्टरों का कहना है कि 'फिट एजिंग' की शुरुआत 60 नहीं, बल्कि 40 की उम्र से ही हो जानी चाहिए।
Updated on:
28 Jul 2026 11:59 am
Published on:
28 Jul 2026 11:59 am
