
उत्तर प्रदेश के आलू किसानों के लिए सरकार ने वित्तीय वर्ष 2026-27 में तीन महत्वपूर्ण योजनाएं शुरू की हैं। इनका मकसद आलू की खेती में बढ़ती लागत, बाजार भाव में गिरावट, भंडारण खर्च और महंगे बीज की समस्या से किसानों को राहत देना है। इसके लिए 1,000 करोड़ रुपये का भामाशाह भाव स्थिरता कोष बनाया गया है। साथ ही निजी शीतगृह में आलू रखने पर सहायता और गुणवत्तापूर्ण बीज खरीदने पर छूट का प्रावधान किया गया है। योजनाओं के लिए ऑनलाइन पोर्टल भी शुरू किया गया है।
आलू की बंपर पैदावार के समय अक्सर बाजार में कीमत गिर जाती है। ऐसी स्थिति में किसान को लागत से कम भाव पर फसल बेचनी पड़ सकती है। इसी समस्या को देखते हुए सरकार ने 1,000 करोड़ रुपये का भामाशाह भाव स्थिरता कोष बनाया है। इसके लिए शुरुआती तौर पर 100 करोड़ रुपये की टोकन राशि का प्रावधान किया गया है।
योजना के तहत कृषि उत्पादन आयुक्त की अध्यक्षता वाली समिति आलू की उत्पादन लागत निर्धारित करेगी। किसान को निर्धारित उत्पादन लागत के 25 प्रतिशत या उत्पादन लागत और बिक्री मूल्य के अंतर, दोनों में से जो राशि कम होगी, उतना अनुदान दिया जाएगा। एक किसान को अधिकतम 2 हेक्टेयर क्षेत्र और प्रति हेक्टेयर अधिकतम 240 क्विंटल आलू तक इस योजना का लाभ मिलेगा।
योजना की क्रियान्वयन अवधि दो चरणों में रखी गई है—1 जनवरी से 15 अप्रैल और 1 जुलाई से 31 अक्टूबर।
आलू की फसल तुरंत बेचने के बजाय किसान उसे निजी कोल्ड स्टोरेज में रखकर बेहतर भाव का इंतजार कर सकते हैं। लेकिन लंबे समय तक भंडारण करने पर किराये का खर्च बढ़ जाता है।
इसी बोझ को कम करने के लिए निजी शीतगृह में रखे आलू के भंडारण शुल्क पर ₹100 प्रति क्विंटल की सहायता दी जाएगी। एक किसान को अधिकतम ₹20,000 तक का लाभ मिल सकता है। यानी अधिकतम 200 क्विंटल आलू पर इस दर से ₹20 हजार तक सहायता बनती है।
इससे किसान को फसल मजबूरी में कम कीमत पर बेचने के बजाय बाजार की स्थिति देखकर बिक्री का फैसला लेने में मदद मिल सकती है।
तीसरी योजना आलू बीज मूल्य छूट योजना है। इसके तहत किसानों को विभाग के आधार बीज की बिक्री दर पर अधिकतम ₹1,000 प्रति क्विंटल तक की छूट मिलेगी। इसका उद्देश्य किसानों को बेहतर गुणवत्ता वाला बीज उपलब्ध कराना और आलू की उत्पादकता व गुणवत्ता में सुधार करना है।
बेहतर बीज का फायदा तभी मिलेगा जब किसान प्रमाणित और उपयुक्त किस्म का चयन करें। इसलिए केवल सस्ती कीमत देखकर बीज खरीदने के बजाय उसकी गुणवत्ता और स्रोत की जांच करना जरूरी है।
तीनों योजनाओं के लिए ऑनलाइन आवेदन करना होगा। सरकार ने इसके लिए potato.uphorticulture.in पोर्टल शुरू किया है। ऑफलाइन आवेदन स्वीकार नहीं किए जाएंगे। पात्र किसानों को स्वीकृत सहायता राशि आधार-सीडेड बैंक खाते में DBT के जरिए भेजी जाएगी।
भाव स्थिरता योजना का लाभ लेने के लिए क्रेता-विक्रेता सौदा प्रपत्र भी जरूरी है। किसान मंडी, उपमंडी, शीतगृह परिसर या अपने खेत से आलू बेचकर निर्धारित शर्तों के तहत योजना का लाभ ले सकते हैं।
किसानों को आवेदन से पहले आधार, बैंक खाते की जानकारी, खेत से जुड़े दस्तावेज और योजना के अनुसार बिक्री या भंडारण से संबंधित कागजात तैयार रखने चाहिए। शीतगृह वाली योजना में स्थानीय स्तर पर मांगे जाने वाले दस्तावेज अलग हो सकते हैं, इसलिए आवेदन करते समय पोर्टल पर दी गई शर्तों और जिला उद्यान विभाग की जानकारी जरूर देखें।
इन योजनाओं को अलग-अलग देखने के बजाय किसान इन्हें खेती के अलग-अलग चरणों से जोड़कर समझ सकते हैं।
बीज पर छूट → उत्पादन लागत में कमी → भाव गिरने पर स्थिरता कोष से राहत → फसल का भंडारण करने पर ₹100 प्रति क्विंटल सहायता।
यानी सरकार ने आलू किसान के सामने आने वाली तीन बड़ी समस्याओं- उत्पादन लागत, बिक्री मूल्य और भंडारण खर्च—को एक साथ संबोधित करने की कोशिश की है। हालांकि वास्तविक लाभ इस बात पर निर्भर करेगा कि किसान योजना की पात्रता पूरी करता है या नहीं और समय पर आवेदन करता है।
किसान केवल योजना शुरू होने की खबर देखकर आवेदन न करें, बल्कि अपने जिले में लागू प्रक्रिया और पात्रता की पुष्टि जरूर करें। खासकर भाव स्थिरता योजना में बिक्री से जुड़े दस्तावेज संभालकर रखना जरूरी है। बैंक खाता आधार से जुड़ा होना और आवेदन में सही जानकारी देना भी महत्वपूर्ण है।