
Hari Khaad : हरी खाद को कब पलटाएं, PC- Chatgpt
रासायनिक उर्वरकों की बढ़ती लागत और लगातार खेती से मिट्टी की सेहत में आ रही गिरावट किसानों के लिए बड़ी चुनौती है। ऐसे में हरी खाद खेती की लागत घटाने और मिट्टी की उर्वरता सुधारने का प्राकृतिक तरीका हो सकती है। इसमें ऐसी फसल उगाई जाती है, जिसे बाद में हरी अवस्था में ही खेत में पलट दिया जाता है। इसके सड़ने से मिट्टी में जैविक पदार्थ और पोषक तत्व जुड़ते हैं तथा मिट्टी की संरचना में सुधार होता है।
हरी खाद के लिए मुख्य फसल के बीच या उससे पहले ऐसी फसल उगाई जाती है, जिसे हरी अवस्था में खेत में जुताई करके मिला दिया जाता है। इसके लिए ढैंचा, सनई, लोबिया, मूंग और उड़द जैसी फसलें इस्तेमाल की जाती हैं।
खासकर दलहनी फसलों की जड़ों में मौजूद राइजोबियम बैक्टीरिया वायुमंडलीय नाइट्रोजन के स्थिरीकरण में मदद करते हैं। जब पूरी हरी फसल मिट्टी में मिला दी जाती है, तो उसके जैविक अवशेष धीरे-धीरे सड़कर मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ बढ़ाते हैं। इससे मिट्टी की जलधारण क्षमता, भुरभुरापन और सूक्ष्मजीव गतिविधि बेहतर हो सकती है।
हरी खाद का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इससे मिट्टी में जैविक पदार्थ की मात्रा बढ़ाने में मदद मिलती है। लगातार रासायनिक उर्वरकों पर निर्भर रहने वाले खेतों में जैविक पदार्थ कम होने पर मिट्टी की संरचना प्रभावित हो सकती है।
हरी खाद मिट्टी को ढीला और भुरभुरा बनाने, पानी को रोककर रखने तथा जड़ों के विकास के लिए बेहतर वातावरण बनाने में मदद करती है। इससे अगली फसल को पोषक तत्व उपलब्ध कराने में भी सहायता मिल सकती है।
हालांकि, उपज में 15–20 प्रतिशत बढ़ोतरी का दावा हर खेत और हर फसल पर लागू नहीं किया जा सकता। वास्तविक फायदा मिट्टी की स्थिति, हरी खाद की फसल, मौसम और अगली फसल के प्रबंधन पर निर्भर करता है।
हरी खाद के लिए ढैंचा सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाली फसलों में से एक है। यह अपेक्षाकृत तेजी से बढ़ता है और पर्याप्त हरा जैव पदार्थ तैयार कर सकता है।
इसे खेत में उगाकर करीब 40–50 दिन के आसपास, स्थानीय परिस्थितियों और फसल की अवस्था को देखते हुए, हरी अवस्था में मिट्टी में पलटा जा सकता है। बहुत अधिक परिपक्व होने पर तना कठोर हो जाता है और उसके अवशेषों के सड़ने में अधिक समय लग सकता है।
हरी खाद की बुवाई का समय क्षेत्र, मौसम और अगली मुख्य फसल पर निर्भर करता है। सामान्य तौर पर इसे उस अवधि में बोया जाता है, जब खेत में पर्याप्त नमी उपलब्ध हो और अगली फसल की बुवाई से पहले इसे मिट्टी में मिलाने के लिए पर्याप्त समय हो।
सामान्य तरीका-
यह हरी खाद की खेती में सबसे महत्वपूर्ण सावधानियों में से एक है। फसल बहुत अधिक बढ़ जाने और तना कठोर होने के बाद उसे मिट्टी में मिलाने पर उसके अपघटन में अधिक समय लग सकता है।
हरी खाद के अवशेषों में कार्बन की मात्रा अधिक होने पर सूक्ष्मजीवों को अपघटन के दौरान मिट्टी के उपलब्ध नाइट्रोजन का इस्तेमाल करना पड़ सकता है। इससे कुछ समय के लिए अगली फसल को नाइट्रोजन की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। इसलिए समय पर हरी खाद को मिट्टी में पलटना जरूरी है।
नहीं। हरी खाद अपनाने का मतलब यह नहीं है कि किसान हर स्थिति में रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल पूरी तरह बंद कर दें। हरी खाद मिट्टी में जैविक पदार्थ और कुछ पोषक तत्व जोड़ती है, लेकिन अगली फसल की पोषक तत्वों की पूरी जरूरत मिट्टी की जांच और फसल की आवश्यकता के अनुसार तय करनी चाहिए। सबसे बेहतर तरीका मृदा परीक्षण के आधार पर संतुलित उर्वरक प्रबंधन अपनाना है।
छत्तीसगढ़ के कुछ क्षेत्रों में कृषि विभाग हरी खाद को बढ़ावा दे रहा है। जशपुर जिले में हरी खाद के इस्तेमाल को बढ़ाने के लिए क्षेत्रीय स्तर पर पहल की गई है और किसानों को इसके बीज उपलब्ध कराने की व्यवस्था भी की गई है।
ऐसी पहल का उद्देश्य किसानों को जैविक पदार्थ बढ़ाने वाली कम लागत वाली तकनीकों से जोड़ना है। हालांकि किसी एक जिले के अनुभव को पूरे राज्य या देश के सभी खेतों पर सीधे लागू नहीं किया जा सकता।
हरी खाद की फसल → हरी अवस्था में जुताई → मिट्टी में जैविक पदार्थ → बेहतर मिट्टी संरचना → उर्वरक प्रबंधन में मदद → लंबे समय में टिकाऊ खेती।
हरी खाद कोई तात्कालिक चमत्कारी उपाय नहीं है, बल्कि मिट्टी की सेहत सुधारने की लंबी अवधि की रणनीति है। किसान इसे फसल चक्र और मृदा परीक्षण आधारित उर्वरक प्रबंधन के साथ अपनाएं तो इसका फायदा अधिक प्रभावी हो सकता है।
Updated on:
01 Sept 2026 11:06 am
Published on:
01 Sept 2026 11:06 am
