
गृहमंत्री अमित शाह, सम्राट चौधरी और हेमंत सोरेन समझौता पत्र के साथ | Gemini
सोन नदी के पानी को लेकर बिहार और झारखंड के बीच दशकों से चला आ रहा विवाद आखिरकार सुलझ गया है। यह समझौता केवल एक तकनीकी मसला नहीं, बल्कि राजनीतिक जमीन पर एक बड़ा मोड़ है। आइए, इस कहानी को विस्तार से समझते हैं।
झारखंड के गठन के बाद, नवंबर 2000 में, सोन नदी के पानी का बंटवारा तय नहीं हो पाया था। झारखंड ने पानी के स्पष्ट हिस्से की मांग की, जबकि बिहार 1973 के बाणसागर समझौते के आधार पर पूरा हिस्सा चाहता था। इसलिए यह विवाद लगभग 25 साल तक चला।
जनवरी 2026 में झारखंड की कैबिनेट ने इस मसौदे को मंजूरी दी, और बिहार की कैबिनेट ने 13 जनवरी 2026 को इसे हरी झंडी दी। 31 अगस्त 2026 को नई दिल्ली में गृह मंत्री अमित शाह, जल शक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत, और दोनों राज्यों के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी (बिहार) और हेमंत सोरेन (झारखंड) की मौजूदगी में औपचारिक रूप से समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर हुए।
जुलाई 2025 में रांची में पूर्वी क्षेत्रीय परिषद की बैठक में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में दोनों राज्यों के प्रतिनिधियों ने पहली बार इस मसले पर सार्थक बातचीत की। इस बैठक ने तकनीकी समिति बनाने का रास्ता खोला, जिसने पानी के बंटवारे का फार्मूला तैयार किया।
बाणसागर समझौते के तहत बिहार को 7.75 मिलियन एकड़-फीट (MAF) पानी मिलता था। नए समझौते के अनुसार, बिहार को 5.75 MAF और झारखंड को 2.0 MAF पानी मिलेगा। यह स्पष्ट बंटवारा लंबे समय से अटके इंद्रपुरी जलाशय परियोजना को आगे बढ़ाने का रास्ता भी खोलता है।
यह समझौता 25 साल तक अटका रहा। अब अचानक यह मसला सुलझना, खासकर चुनावी माहौल में, सवाल खड़े करता है कि क्या यह सच्ची सुलह है या राजनीतिक रणनीति? केंद्र की सक्रियता और अमित शाह की व्यक्तिगत भूमिका ने इस गतिरोध को तोड़ा।
इस समझौते से बिहार के भोजपुर, बक्सर, रोहतास, कैमूर, औरंगाबाद, अरवल, गया और पटना जिलों में सिंचाई और पीने के पानी की उपलब्धता बेहतर होगी। वहीं झारखंड के पलामू, गढ़वा और आसपास के इलाके भी लाभान्वित होंगे। यह किसानों और ग्रामीण इलाकों के लिए बड़ी राहत है, खासकर उन क्षेत्रों में जहां पानी की कमी खेती और जीवन दोनों को प्रभावित करती रही है।
यह समझौता दोनों राज्यों की सरकारों के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। बिहार में सम्राट चौधरी और झारखंड में हेमंत सोरेन इसे अपनी राजनीतिक ताकत के रूप में पेश कर सकते हैं। साथ ही, केंद्र की भूमिका - ‘टीम भारत’ और ‘सहकारी संघवाद’ की बात ने इसे राष्ट्रीय स्तर पर भी एक सकारात्मक संदेश बना दिया है।
अब इंद्रपुरी जलाशय परियोजना को गति मिल सकती है, जिससे क्षेत्रीय विकास को नई दिशा मिलेगी। लेकिन यह भी देखना होगा कि यह समझौता कितनी जल्दी जमीन पर लागू होता है, और क्या इससे जुड़े अन्य जल विवादों पर भी केंद्र समान सक्रियता दिखाएगा।
सोन नदी जल विवाद का समाधान तकनीकी रूप से सरल था, लेकिन राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी ने इसे 25 साल तक टाला रखा। अब यह समझौता एक सुलह की तरह दिखता है, लेकिन चुनावी माहौल में इसकी टाइमिंग सवाल खड़े करती है। असल मायने यह होंगे कि क्या यह समझौता जमीन पर असर दिखाएगा, किसानों और ग्रामीणों की जिंदगी में बदलाव लाएगा, और क्या यह केंद्र की नीति में एक स्थायी बदलाव की शुरुआत है।
Updated on:
01 Sept 2026 10:46 am
Published on:
01 Sept 2026 10:46 am
