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भारत में घर खरीदना इतना महंगा क्यों हो गया? जमीन से EMI तक पूरा हिसाब

House Prices in India : जानें भारत के बड़े शहरों में घर खरीदना इतना महंगा क्यों हो गया है। NHB RESIDEX डेटा, जमीन की बढ़ती कीमतें, निर्माण लागत और होम लोन ईएमआई के पूरे गणित को समझें।
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Aug 20, 2026
House Prices in India
House Prices in India : भारत में घर खरीदना इतना महंगा क्यों?

भारत में अपना घर खरीदना आज भी करोड़ों परिवारों का सबसे बड़ा सपना है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इस सपने की कीमत लगातार बढ़ी है। खासकर बड़े शहरों में घर की कीमतें इतनी तेजी से बढ़ी हैं कि मध्यमवर्गीय परिवार के लिए घर खरीदना सिर्फ बचत का नहीं, बल्कि 20-30 साल की ईएमआई का फैसला बन गया है।

राष्ट्रीय आवास बैंक यानी NHB के ताजा RESIDEX मार्च 2026 के आंकड़ों के मुताबिक जनवरी-मार्च 2026 में 50 शहरों का आवास मूल्य सूचकांक सालाना आधार पर 4.5% बढ़ा। 50 में से 44 शहरों में घरों की कीमतों में बढ़ोतरी दर्ज हुई। बड़े शहरों में बेंगलुरु में कीमतें 13.1%, चेन्नई में 8.6%, अहमदाबाद में 7.2%, कोलकाता में 5.3%, मुंबई में 4.5%, हैदराबाद में 3.3% और पुणे में 2.9% बढ़ीं।

लेकिन सवाल है- घर आखिर इतना महंगा क्यों हो रहा है?

सबसे पहले जमीन महंगी हुई : घर की कीमत में सबसे बड़ा हिस्सा अक्सर जमीन का होता है। शहर जितना बड़ा और रोजगार के जितना करीब होगा, जमीन की मांग उतनी ज्यादा होगी।

मुंबई, दिल्ली-एनसीआर, बेंगलुरु, हैदराबाद और पुणे जैसे शहरों में आईटी पार्क, मेट्रो, एक्सप्रेसवे, एयरपोर्ट और नए कारोबारी केंद्रों के आसपास जमीन की कीमत तेजी से बढ़ती है।

डेवलपर को जमीन महंगी मिलेगी तो वह उस लागत को फ्लैट की कीमत में शामिल करेगा। यही कारण है कि शहर के केंद्र से कुछ किलोमीटर दूर जाते ही कीमतों में बड़ा अंतर दिखाई देता है।

यहां एक महत्वपूर्ण बदलाव भी आया है। पहले लोग शहर के मुख्य हिस्से में घर खरीदना चाहते थे, लेकिन अब नए रोजगार केंद्रों और बेहतर कनेक्टिविटी के कारण शहर की सीमा से बाहर के इलाकों में भी मांग बढ़ रही है। इससे दिल्ली-एनसीआर के गुरुग्राम, नोएडा, ग्रेटर नोएडा और फरीदाबाद जैसे क्षेत्रों में कीमतों पर दबाव बढ़ा है।

बेंगलुरु में घरों की कीमत सबसे तेज क्यों बढ़ी?

NHB के मार्च 2026 के आंकड़ों में सात प्रमुख आवासीय बाजारों में बेंगलुरु की सालाना वृद्धि 13.1% रही, जो इस समूह में सबसे ज्यादा थी।

इसका एक बड़ा कारण लगातार बढ़ती आवास मांग है। आईटी और सेवा क्षेत्र के बड़े रोजगार केंद्र होने के कारण शहर में देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग आते हैं। रोजगार के साथ किराये और खरीद-दोनों की मांग बढ़ती है।

लेकिन बेंगलुरु सिर्फ शहर के अंदर महंगा नहीं हो रहा। शहर के आसपास के इलाकों में भी सड़क, मेट्रो और अन्य बुनियादी ढांचे के विकास से जमीन की कीमतों पर असर पड़ता है। यही पैटर्न दूसरे तेजी से बढ़ते शहरों में भी देखा जा रहा है।

सिर्फ जमीन ही महंगी नहीं हुई, निर्माण भी सस्ता नहीं रहा

एक फ्लैट बनाने में सीमेंट, स्टील, ईंट, रेत, कांच, बिजली का सामान, पाइप, लिफ्ट, लकड़ी, टाइल और मजदूरी- सबकी लागत जुड़ती है। इनमें स्टील और सीमेंट जैसे प्रमुख निर्माण सामान की कीमत में बदलाव सीधे निर्माण लागत को प्रभावित करता है। इसके अलावा मजदूरी, मशीनरी, परिवहन और परियोजना को पूरा करने में लगने वाला समय भी लागत बढ़ाता है।

मान लीजिए किसी परियोजना में निर्माण शुरू करते समय लागत एक स्तर पर थी, लेकिन दो-तीन साल की परियोजना अवधि में मजदूरी, सामग्री और वित्तीय लागत बढ़ गई। डेवलपर के लिए प्रति वर्ग फुट लागत बढ़ जाएगी। इसलिए घर की कीमत में सिर्फ 'जमीन + ईंट-पत्थर' नहीं, बल्कि पूरी परियोजना की लागत शामिल होती है।

बिल्डर की लागत में ब्याज भी शामिल है

रियल एस्टेट परियोजना के लिए डेवलपर को भी पैसा चाहिए। जमीन खरीदने, निर्माण शुरू करने और परियोजना पूरी करने में कई साल लग सकते हैं। अगर परियोजना पर वित्तीय लागत बढ़ती है तो उसका असर अंतिम कीमत पर पड़ सकता है।

यानी घर खरीदने वाला सिर्फ अपने होम लोन का ब्याज नहीं देता। किसी न किसी रूप में डेवलपर की वित्तीय लागत भी फ्लैट की कीमत में शामिल हो सकती है।

यही वजह है कि ब्याज दरें कम होने पर केवल खरीदार की ईएमआई ही कम नहीं होती, बल्कि आवास की मांग बढ़ने से बाजार की कीमतों पर भी असर पड़ सकता है।

फिर होम लोन सस्ता हुआ या महंगा?

अगस्त 2026 में कई बैंकों और आवास वित्त कंपनियों की होम लोन दरें अभी भी लगभग 7-8% या उससे ऊपर के स्तर पर हैं। उदाहरण के लिए HDFC Bank की वेबसाइट पर होम लोन की दरें 7.75% से शुरू होने की जानकारी दी गई है और दरें रेपो रेट से जुड़ी हैं।

अब इसका असर समझिए

अगर कोई व्यक्ति 50 लाख रुपये का होम लोन 20 साल के लिए लगभग 8% ब्याज पर लेता है, तो उसकी मासिक ईएमआई करीब 41,800 रुपये बैठती है। 20 साल में वह करीब 1 करोड़ रुपये चुका सकता है। यानी 50 लाख रुपये का घर खरीदने के लिए लिया गया कर्ज अंततः लगभग दोगुने भुगतान में बदल सकता है। इसलिए घर की कीमत के साथ ब्याज दर भी तय करती है कि वास्तविक बोझ कितना होगा।

शहरों में कीमत इतनी अलग क्यों?

भारत में “घर की कीमत” का कोई एक आंकड़ा नहीं है। शहर बदलते ही जमीन, मांग, रोजगार और निर्माण लागत बदल जाती है। NHB के मार्च 2026 के आंकड़े इसका अच्छा उदाहरण हैं। सात प्रमुख शहरों में सालाना वृद्धि बेंगलुरु में 13.1%, चेन्नई में 8.6%, अहमदाबाद में 7.2%, कोलकाता में 5.3%, मुंबई में 4.5%, हैदराबाद में 3.3% और पुणे में 2.9% रही।

लेकिन पूरे 50 शहरों में तस्वीर और भी अलग है। मार्च 2026 में सालाना बदलाव लुधियाना में 22.2% की वृद्धि से लेकर दिल्ली में 4.3% की गिरावट तक रहा। छह शहरों में कीमतें सालाना आधार पर घटीं। इससे साफ है कि पूरे भारत में घर एक समान महंगे नहीं हो रहे।

मुंबई में घर महंगा क्यों है?

मुंबई इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है। शहर समुद्र और भौगोलिक सीमाओं से घिरा हुआ है। जमीन की उपलब्धता सीमित है, जबकि रोजगार और आबादी का दबाव बहुत ज्यादा है। जब जमीन सीमित और मांग ज्यादा हो तो कीमत बढ़ना स्वाभाविक है।

इसके अलावा मुंबई में पुरानी इमारतों का पुनर्विकास, प्रीमियम लोकेशन और बुनियादी ढांचे की उपलब्धता भी कीमतों को प्रभावित करती है।यानी मुंबई में घर महंगा होने की कहानी सिर्फ निर्माण लागत की नहीं, बल्कि जमीन की दुर्लभता और लगातार बनी रहने वाली मांग की कहानी है।

दिल्ली में उलटी तस्वीर क्यों दिखी?

NHB के मार्च 2026 के आंकड़ों में दिल्ली का आवास मूल्य सूचकांक सालाना आधार पर 4.3% नीचे था। इसका मतलब यह नहीं कि दिल्ली में हर इलाके का घर सस्ता हो गया। सूचकांक पूरे बाजार की औसत दिशा बताता है। अलग-अलग इलाकों, संपत्ति के प्रकार और लेन-देन में तस्वीर अलग हो सकती है। यही कारण है कि राष्ट्रीय स्तर के आंकड़े को किसी एक इलाके की कीमत समझना सही नहीं होगा।

घर की कीमत में सरकार को कितना पैसा जाता है?

जब आप घर खरीदते हैं तो सिर्फ फ्लैट की कीमत नहीं देते। इसके साथ स्टांप ड्यूटी, पंजीकरण शुल्क, जीएसटी-जहां लागू होऔर अन्य शुल्क भी हो सकते हैं। निर्माणाधीन संपत्ति और तैयार संपत्ति पर कर व्यवस्था अलग हो सकती है। इसलिए खरीदार को विज्ञापन में लिखी कीमत और वास्तविक कुल भुगतान के बीच अंतर समझना जरूरी है।

कई बार '80 लाख का फ्लैट' खरीदने के बाद जमीन, पार्किंग, रजिस्ट्री, कर, क्लब या अन्य शुल्क जोड़ने पर अंतिम खर्च काफी बढ़ सकता है।

क्या बिल्डर बहुत ज्यादा मुनाफा कमा रहे हैं?

हर परियोजना के लिए एक ही जवाब देना सही नहीं होगा। बिल्डर को जमीन, निर्माण, कर्मचारियों, वित्त, मार्केटिंग, मंजूरी, बुनियादी ढांचे और परियोजना में फंसी पूंजी पर खर्च करना पड़ता है।

लेकिन यह भी सच है कि जिस इलाके में घरों की मांग बहुत ज्यादा हो और आपूर्ति सीमित हो, वहां डेवलपर को ज्यादा कीमत वसूलने की गुंजाइश मिल सकती है। यानी घर की कीमत सिर्फ लागत से नहीं, मांग और आपूर्ति से भी तय होती है।

क्या आने वाले समय में घर सस्ते होंगे?

इसका जवाब शहर-दर-शहर अलग होगा। NHB के ताजा आंकड़े बताते हैं कि जनवरी-मार्च 2026 में 50 शहरों का आवास मूल्य सूचकांक सालाना 4.5% बढ़ा और तिमाही आधार पर भी 1.9% बढ़ा।

अगर रोजगार और आय बढ़ती है, शहरों में आबादी आती रहती है और जमीन की उपलब्धता सीमित रहती है तो प्रमुख शहरों में कीमतों पर दबाव बना रह सकता है।

लेकिन अगर ब्याज दरें घटती हैं, निर्माण सामग्री सस्ती होती है, नए इलाकों में बड़ी मात्रा में आवास बनता है और परिवहन बेहतर होता है तो कुछ बाजारों में कीमतों की वृद्धि धीमी हो सकती है। इसलिए आने वाले समय में 'भारत में घर सस्ते होंगे या महंगे?' का एक ही जवाब नहीं होगा।

असली समस्या घर की कीमत नहीं, आय और कीमत का अंतर है। घर महंगा होने की सबसे बड़ी समस्या यह है कि मकान की कीमत और आम परिवार की आय एक ही गति से नहीं बढ़ती।

अगर किसी शहर में घर की कीमत सालाना 10-13% बढ़ रही है, लेकिन परिवार की आय उससे काफी धीमी गति से बढ़ती है, तो घर खरीदना लगातार मुश्किल होता जाएगा। यही कारण है कि आज सवाल सिर्फ यह नहीं है कि एक फ्लैट कितने लाख का है।

असल सवाल है

एक सामान्य परिवार को उस घर के लिए कितने साल बचत करनी होगी, कितनी ईएमआई देनी होगी और अपनी आय का कितना हिस्सा अगले 20-30 साल तक सिर्फ घर के कर्ज में लगाना पड़ेगा?

भारत के बड़े शहरों में बढ़ती जमीन की कीमत, निर्माण लागत, मजबूत आवास मांग और कर्ज की लागत- इन चारों का दबाव मिलकर घर को महंगा बना रहा है। और जब तक शहरों में रोजगार के मुकाबले सस्ता आवास, बेहतर सार्वजनिक परिवहन और पर्याप्त आवासीय जमीन की व्यवस्था नहीं होती, तब तक घर खरीदने की चुनौती सिर्फ रियल एस्टेट की समस्या नहीं, बल्कि मध्यम वर्ग की आय और जीवन-यापन की बड़ी समस्या बनी रहेगी।

Updated on:
20 Aug 2026 12:13 pm
Published on:
20 Aug 2026 12:12 pm