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ग्रीन इंडिया मिशन पर CAG की रिपोर्ट ने क्या सवाल खड़े किए? 10 साल में लक्ष्य कितना पूरा हुआ, जानें दावों और हकीकत में अंतर?

Green India Mission CAG Report : जानें CAG की ग्रीन इंडिया मिशन रिपोर्ट ने 10 साल के लक्ष्यों पर क्या सवाल उठाए हैं। भारत के वन क्षेत्र के दावों और ज़मीनी हकीकत के अंतर को विस्तार से समझें।
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Green India Mission CAG Report

Green India Mission CAG Report : CAG की रिपोर्ट में ग्रीन इंडिया मिशन पर उठे सवाल, PC- Chatgpt

भारत लगातार अपने वन और वृक्ष क्षेत्र में बढ़ोतरी के आंकड़े पेश करता रहा है। सरकार के मुताबिक, 2013 से 2023 के बीच देश के वन क्षेत्र में शुद्ध रूप से 16,630 वर्ग किमी की वृद्धि हुई। वहीं India State of Forest Report 2023 के अनुसार भारत का कुल वन और वृक्ष क्षेत्र 8.27 लाख वर्ग किमी, यानी देश के भौगोलिक क्षेत्र का करीब 25.17% हो चुका है।

लेकिन इसी बीच 13 अगस्त 2026 को सामने आई CAG की ग्रीन इंडिया मिशन पर प्रदर्शन ऑडिट रिपोर्ट ने बिल्कुल अलग तस्वीर पेश की। CAG के मुताबिक 2015-16 से 2024-25 के 10 साल के ऑडिट में मिशन के तहत वन क्षेत्र बढ़ाने और उसकी गुणवत्ता सुधारने के लक्ष्य से काफी कम प्रगति हुई। ऑडिट में खराब योजना, गलत जगहों का चयन, योजनाओं के बीच तालमेल की कमी, वित्तीय प्रबंधन और निगरानी पर सवाल उठाए गए।

तो सबसे बड़ा सवाल है- अगर भारत का वन क्षेत्र बढ़ रहा है, तो ग्रीन इंडिया मिशन लक्ष्य से इतना पीछे कैसे रह गया? इसका जवाब आंकड़ों की परिभाषा और अलग-अलग योजनाओं के दायरे में छिपा है।

पहले समझिए ग्रीन इंडिया मिशन क्या था?

ग्रीन इंडिया मिशन यानी GIM, राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य योजना की आठ प्रमुख मिशनों में से एक है। इसका बड़ा लक्ष्य केवल नए पेड़ लगाना नहीं था। मिशन के मूल उद्देश्यों में शामिल था:

  • 50 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में वन और वृक्ष आवरण बढ़ाना
  • अन्य 50 लाख हेक्टेयर में मौजूदा वन की गुणवत्ता सुधारना
  • जैव विविधता, जल सेवाएं और कार्बन भंडारण बढ़ाना
  • वन पर निर्भर करीब 30 लाख परिवारों की आजीविका में सुधार करना

यानी कुल मिलाकर 1 करोड़ हेक्टेयर भूमि पर काम करने की परिकल्पना थी। लेकिन 10 साल बाद CAG के ऑडिट ने मिशन की प्रगति पर गंभीर सवाल खड़े किए।

10 साल में लक्ष्य कितना पूरा हुआ?

CAG के ऑडिट में 16 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में 2015-16 से 2024-25 के बीच मंजूर भौतिक और वित्तीय लक्ष्यों की जांच की गई। सबसे बड़ा अंतर यहां दिखाई दिया:

कामलक्ष्यउपलब्धिकमी
वन क्षेत्र की गुणवत्ता में सुधार14 लाख हेक्टेयर1.1 लाख हेक्टेयर92%
वन/वृक्ष आवरण में वृद्धि14 लाख हेक्टेयर30 हजार हेक्टेयर98%

यानी जिस हिस्से में वन आवरण बढ़ाने का लक्ष्य था, वहां 14 लाख हेक्टेयर के मुकाबले केवल लगभग 30 हजार हेक्टेयर की वृद्धि दर्ज की गई। यह ध्यान रखना जरूरी है कि ये आंकड़े मिशन के पूरे मूल 1 करोड़ हेक्टेयर लक्ष्य की तुलना नहीं, बल्कि CAG द्वारा जांची गई 10 साल की ऑडिट अवधि के स्वीकृत लक्ष्यों की तुलना हैं।

आसान भाषा में समझिए…लक्ष्य बड़ा था → मंजूर परियोजनाएं बनीं → राज्यों में काम होना था → लेकिन जमीन पर परिणाम लक्ष्य से बहुत पीछे रहे।

CAG ने सबसे बड़ी गड़बड़ियां क्या बताईं?

जहां सबसे ज्यादा जरूरत थी, वहां पेड़ नहीं लगाए गए?

ग्रीन इंडिया मिशन का उद्देश्य जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशील और खराब हो चुके परिदृश्यों को प्राथमिकता देना था। लेकिन CAG ने पाया कि कई जगह कम या मध्यम प्राथमिकता वाले क्षेत्रों को चुना गया, जबकि जलवायु परिवर्तन के प्रति ज्यादा संवेदनशील क्षेत्रों को प्राथमिकता नहीं मिली। यानी सवाल सिर्फ कितने पेड़ लगाए गए का नहीं है। असल सवाल है…

क्या पेड़ सही जगह लगाए गए? : अगर पानी की कमी वाले इलाके में गलत प्रजाति लगा दी जाए, या ऐसे क्षेत्र को चुना जाए जहां पहले से बेहतर वन मौजूद है, तो कागज पर वृक्षारोपण हो सकता है लेकिन जलवायु और पारिस्थितिकी को अपेक्षित फायदा नहीं मिलेगा।

आंकड़ों में उपलब्धि ज्यादा दिखाई गई?

CAG की जांच में एक और गंभीर सवाल उठा। ऑडिट के दौरान उपलब्धियों से जुड़े आंकड़ों में फुलाए गए या बढ़ा-चढ़ाकर बताए गए परिणामों की बात सामने आई। GIS विश्लेषण में CAG ने पाया कि जांचे गए नमूना स्थलों में से करीब 70% में ऐसा कोई स्पष्ट बदलाव नहीं दिखा जिसे सीधे ग्रीन इंडिया मिशन से जोड़ा जा सके। इसका मतलब यह नहीं कि उन सभी जगहों पर कोई पेड़ नहीं था। बल्कि सवाल यह है कि जो बदलाव दिखाई दिया, क्या उसे वास्तव में GIM की परियोजना का परिणाम साबित किया जा सकता है? यह मॉनिटरिंग और परिणाम मापने की पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है।

निगरानी व्यवस्था कमजोर क्यों रही?

CAG ने पाया कि कई राज्यों में पारदर्शिता और निगरानी के लिए जरूरी व्यवस्थाएं कमजोर थीं। ऑडिट के अनुसार 14 राज्यों ने जरूरी सार्वजनिक वेब लिंक तक उपलब्ध नहीं कराए। इससे परियोजनाओं की प्रगति, स्थान, खर्च और परिणामों की सार्वजनिक निगरानी मुश्किल हो जाती है। यही कारण है कि केवल 'इतने पौधे लगाए गए' कहना पर्याप्त नहीं है।

असली सवाल होना चाहिए:

  • कितने पौधे जीवित हैं?
  • कितने साल तक बचे?
  • कितना क्षेत्र वास्तव में हरा हुआ?
  • वन की गुणवत्ता कितनी सुधरी?
  • कितना कार्बन बढ़ा?
  • स्थानीय लोगों को क्या फायदा हुआ?

फिर सरकार के वन क्षेत्र बढ़ने के दावे और CAG रिपोर्ट में अंतर क्यों?

यहां दोनों आंकड़ों को समझना बहुत जरूरी है। सरकार का ISFR 2023 पूरे देश में उपग्रह और फील्ड डेटा के आधार पर कुल वन और वृक्ष आवरण का आकलन करता है। दूसरी तरफ CAG ने विशेष रूप से ग्रीन इंडिया मिशन की योजना, खर्च, परियोजना चयन और परिणामों का ऑडिट किया। इसलिए दोनों आंकड़े एक ही चीज नहीं माप रहे।

  • सरकारी वन आंकड़ा CAG का ग्रीन इंडिया मिशन ऑडिट
  • पूरे देश का वन और वृक्ष आवरण एक विशेष मिशन का प्रदर्शन
  • सभी नीतियों और प्राकृतिक/अन्य कारणों का कुल असर GIM के तहत मंजूर परियोजनाओं का परिणाम
  • ISFR में उपग्रह आधारित राष्ट्रीय आकलन योजना, खर्च, साइट चयन और उपलब्धि का ऑडिट
  • 2013-2023 में राष्ट्रीय स्तर पर वन क्षेत्र बढ़ने की बात 2015-16 से 2024-25 में GIM लक्ष्यों से भारी कमी

यानी देश का कुल वन क्षेत्र बढ़ सकता है, लेकिन इसका मतलब यह जरूरी नहीं कि ग्रीन इंडिया मिशन ने अपने लक्ष्य पूरे कर लिए।
वन क्षेत्र में बढ़ोतरी CAMPA, राज्य सरकारों की योजनाओं, सामाजिक वानिकी, कृषि वानिकी, निजी भूमि पर पेड़, प्राकृतिक पुनरुत्थान और दूसरी परियोजनाओं से भी हो सकती है। यही इसका सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष है।

CAMPA का क्या हुआ?

CAMPA यानी Compensatory Afforestation Fund का पैसा उस स्थिति में वृक्षारोपण और वन बहाली के लिए इस्तेमाल किया जाना है जब विकास परियोजनाओं के लिए वन भूमि का उपयोग किया जाता है। जून 2026 में सरकार ने बताया कि पिछले पांच वर्षों में CAMPA समर्थित गतिविधियों के तहत करीब 3.20 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में वनीकरण किया गया।

लेकिन CAMPA की वित्तीय व्यवस्था पर भी CAG ने अलग ऑडिट में सवाल उठाए थे। CAG की रिपोर्ट के अनुसार वित्त वर्ष 2023-24 के अंत तक 15,103 करोड़ रुपये संबंधित राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के CAMPA फंडों को जारी किए जाने बाकी थे। यह आंकड़ा सीधे ग्रीन इंडिया मिशन की असफलता का प्रमाण नहीं है, क्योंकि CAMPA और GIM अलग फंडिंग व्यवस्थाएं हैं।

लेकिन यह एक बड़ा सवाल जरूर उठाता है…जब वनीकरण के लिए कई योजनाएं और फंड मौजूद हैं, तो पैसा, योजना और जमीन पर काम एक साथ क्यों नहीं चल पा रहे?

MGNREGA का क्या हुआ?

MGNREGA को केवल रोजगार योजना के रूप में देखना भी अधूरा है। इसके तहत जल संरक्षण, भूमि सुधार, वृक्षारोपण और प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन के काम भी होते हैं। NITI Aayog के एक आकलन के आधार पर PRS ने कहा है कि 2017-18 में MGNREGS के वृक्षारोपण और मिट्टी सुधार कार्यों से अनुमानित 102 मिलियन टन CO₂ sequestration हुआ था।

यानी MGNREGA के पास मजदूर भी हैं, ग्रामीण स्तर पर ढांचा भी है और प्राकृतिक संसाधन सुधार के कामों का अनुभव भी। फिर भी CAG ने ग्रीन इंडिया मिशन में विभिन्न योजनाओं के बीच convergence यानी समन्वय की कमी को एक बड़ी समस्या बताया।

यही सबसे बड़ा नीति-संबंधी सवाल है। उदाहरण से समझिए एक गांव में…

  • GIM पेड़ लगाने की योजना बना सकता है
  • MGNREGA मजदूरी और भूमि सुधार दे सकता है
  • CAMPA फंड उपलब्ध करा सकता है
  • जल संरक्षण योजना पानी की व्यवस्था कर सकती है

लेकिन अगर ये सभी योजनाएं अलग-अलग काम करें, तो एक ही इलाके में संसाधन बंट सकते हैं और परिणाम कमजोर हो सकते हैं।

पैसों का इस्तेमाल भी सवालों के घेरे में

2026-27 के बजट विश्लेषण के मुताबिक ग्रीन इंडिया मिशन में कई वर्षों से फंड का पूरा इस्तेमाल नहीं हो रहा है। PRS के अनुसार 2025-26 के संशोधित अनुमान में GIM के लिए उपलब्ध बजट का केवल 28% उपयोग होने का अनुमान था। दिसंबर 2025 तक 2015-16 से मिशन के तहत करीब 0.17 मिलियन हेक्टेयर यानी 1.7 लाख हेक्टेयर में वृक्षारोपण गतिविधियां हुई थीं।

यह आंकड़ा जून 2026 में सरकार द्वारा बताए गए लगभग 1.7 लाख हेक्टेयर GIM restoration/greening आंकड़े से भी broadly मेल खाता है। यानी समस्या सिर्फ फंड की कमी नहीं दिखती। फंड का उपयोग, राज्यों की क्षमता, परियोजना डिजाइन और निगरानी भी बड़ी चुनौती हैं।

CAG रिपोर्ट से निकले 5 बड़े सवाल

  • क्या वृक्षारोपण सही जगह हो रहा है?
  • क्या लगाए गए पौधे वर्षों तक जीवित रहते हैं?
  • क्या अलग-अलग योजनाओं का पैसा एक ही लक्ष्य के लिए समन्वय से इस्तेमाल हो रहा है?
  • क्या सरकार केवल पौधे गिन रही है या वन की गुणवत्ता और कार्बन बढ़ोतरी भी माप रही है?
  • क्या भारत के वन क्षेत्र में बढ़ोतरी का श्रेय किसी एक मिशन को देना सही है?

आगे क्या करना होगा?

भारत का लक्ष्य केवल पेड़ लगाने का नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन के खिलाफ मजबूत प्राकृतिक सुरक्षा तंत्र तैयार करने का है। इसके लिए तीन बदलाव जरूरी होंगे।

  • पहला-पौधों की संख्या से आगे बढ़कर उनकी जीवित रहने की दर और वन की गुणवत्ता मापनी होगी।
  • दूसरा-GIM, CAMPA, MGNREGA, जल संरक्षण और राज्य वृक्षारोपण योजनाओं को एक ही लैंडस्केप योजना के तहत जोड़ना होगा।
  • तीसरा-सार्वजनिक निगरानी को मजबूत करना होगा ताकि हर कोई देख सके कि पैसा कहां खर्च हुआ और जमीन पर क्या बदला।

CAG की रिपोर्ट का सबसे बड़ा संदेश यही है कि भारत में पेड़ लगाने वाली योजनाओं की कमी नहीं है। चुनौती यह है कि क्या इन योजनाओं से वास्तव में जंगल बन रहे हैं, पुराने जंगल मजबूत हो रहे हैं और जलवायु संकट से जूझ रहे क्षेत्रों को फायदा मिल रहा है?

क्योंकि अंततः सवाल यह नहीं है कि कितने करोड़ पौधे लगाए गए। असली सवाल है… 10 साल बाद उनमें से कितने पेड़ बचे, कहां बचे और क्या उन्होंने भारत को वास्तव में ज्यादा हरा बनाया?