20 अगस्त 2026,

गुरुवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

साहित्य ने कैसे समृद्ध किया सिनेमा: असगर वजाहत के नाटक से ‘बंटवारा 1947’ और इन यादगार फ़िल्मों का सफ़र

Literary Adaptations: असगर वजाहत के चर्चित नाटक पर बनी ‘बंटवारा 1947’ साहित्य और सिनेमा के पुराने रिश्ते की नई कड़ी है। ‘देवदास’, ‘तीसरी कसम’, ‘गाइड’, ‘नदिया के पार’, ‘मकबूल’ और ‘हैदर’ जैसी फिल्मों ने साहित्यिक रचनाओं को पर्दे पर नई पहचान दी।
10 min read
Google source verification

भारत

image

MI Zahir

Aug 20, 2026

Literary Adaptations In Hindi Cinema News

साहित्यिक रचनाओं ने भारतीय सिनेमा को कई यादगार कहानियां दीं। ( फोटो: AI)

साहित्य और सिनेमा का रिश्ता सिर्फ कहानी को पर्दे पर उतारने तक सीमित नहीं है। कई बार किसी लेखक की रचना फिल्मकार को ऐसा संसार देती है, जिसमें किरदार, संघर्ष, भावनाएं और सामाजिक सवाल पहले से मौजूद होते हैं। भारतीय सिनेमा में यह परंपरा कई दशकों से चली आ रही है। उपन्यास, कहानी, नाटक, आत्मकथा और विदेशी साहित्यिक कृतियों से प्रेरित होकर अनेक यादगार फिल्में बनी हैं। वर्ष 2026 में रिलीज हुई ‘बंटवारा 1947’ इसी परंपरा की नई कड़ी है। मिर्ज़ा हादी रुस्वा के उपन्यास पर आधारित फिल्म ‘उमराव जान’ सेल्युलाइड का शाहकार मानी जाती है, इसमें मशहूर शाइर शहरयार के लिए गीत आज भी सुने जाते हैं।

साहित्यकार असगर वजाहत का चर्चित नाटक ‘जिस लाहौर नई देख्या, ओ जम्याई नई’

‘बंटवारा 1947’ साहित्यकार असगर वजाहत के चर्चित नाटक ‘जिस लाहौर नई देख्या, ओ जम्याई नई’ से प्रेरित है। फिल्म का निर्देशन राजकुमार संतोषी ने किया है। इसमें सनी देओल, प्रीति जिंटा, शबाना आजमी, अली फजल और करण देओल प्रमुख भूमिकाओं में हैं। फिल्म का निर्माण आमिर खान प्रोडक्शंस ने किया है और यह 14 अगस्त 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज हुई।

‘देवदास’ से शुरू नहीं, लेकिन सबसे चर्चित उदाहरण जरूर

जब साहित्य पर बनी फिल्मों की बात होती है तो शरतचंद्र चट्टोपाध्याय का ‘देवदास’ सबसे पहले याद आने वाले नामों में शामिल है। इस उपन्यास ने भारतीय सिनेमा में प्रेम, सामाजिक बंधन और व्यक्तिगत त्रासदी को कई रूपों में प्रस्तुत किया।

मजबूत साहित्यिक पात्र फिल्मकारों को अलग-अलग तरह से आकर्षित करता है

‘देवदास’ के अलग-अलग भारतीय भाषाओं में अनेक फिल्मी रूपांतरण हुए। हिंदी सिनेमा में 1955 की बिमल रॉय निर्देशित फिल्म और 2002 में संजय लीला भंसाली की फिल्म विशेष रूप से चर्चित रहीं। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि एक मजबूत साहित्यिक पात्र अलग-अलग दौर के फिल्मकारों को अलग-अलग तरह से आकर्षित कर सकता है।

‘परिणीता’ ने इसे नई पीढ़ी के दर्शकों तक पहुंचाया

शरतचंद्र की ‘परिणीता’ भी फिल्मी रूपांतरण का हिस्सा बनी। 1953 की हिंदी फिल्म के बाद 2005 में विद्या बालन और सैफ अली खान अभिनीत ‘परिणीता’ ने इसे नई पीढ़ी के दर्शकों तक पहुंचाया।

‘तीसरी कसम’: जब कहानी ने लोकजीवन को पर्दे पर उतारा

फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी ‘मारे गए गुलफाम’ पर बनी ‘तीसरी कसम’ साहित्यिक रूपांतरणों की सबसे महत्वपूर्ण मिसालों में गिनी जाती है।

राज कपूर और वहीदा रहमान अभिनीत इस फिल्म में ग्रामीण भारत, लोक संस्कृति, नौटंकी, प्रेम और सामाजिक सोच का संवेदनशील चित्रण दिखाई देता है। फिल्म ने रेणु की कहानी के ग्रामीण परिवेश और मानवीय संवेदना को सिनेमाई रूप दिया।

मन्नू भंडारी की ‘यही सच है’ से ‘रजनीगंधा’ तक

नई कहानी आंदोलन से जुड़ी मन्नू भंडारी की कहानी ‘यही सच है’ पर बासु चटर्जी ने ‘रजनीगंधा’ बनाई। 1974 की यह फिल्म हिंदी सिनेमा में मध्यवर्गीय जीवन, रिश्तों और भावनात्मक उलझनों की एक अलग शैली लेकर आई।

‘रजनीगंधा’ को साहित्य से निकली फिल्मों में याद किया जाता है

विद्या और उसके अतीत से जुड़े दो पुरुषों के बीच भावनात्मक द्वंद्व को फिल्म ने बेहद सहज अंदाज में पेश किया। यही वजह है कि ‘रजनीगंधा’ को साहित्य से निकली उन फिल्मों में याद किया जाता है, जिनमें बड़े घटनाक्रम के बजाय रोजमर्रा की जिंदगी और रिश्तों को केंद्र बनाया गया।

‘बंदिनी’: जेल की कहानी से स्त्री के संघर्ष तक

बिमल रॉय की ‘बंदिनी’ भी साहित्यिक रूपांतरण की उल्लेखनीय फिल्म है। 1963 में बनी यह फिल्म जरासंध यानी चारु चंद्र चक्रवर्ती के बंगाली उपन्यास ‘तमसी’ पर आधारित थी। फिल्म में नूतन, अशोक कुमार और धर्मेंद्र प्रमुख भूमिकाओं में थे।

‘तमसी’ और ‘बंदिनी’ : साहित्यिक आधार

‘तमसी’ के लेखक चारु चंद्र चक्रवर्ती स्वयं जेल विभाग से जुड़े रहे थे और उनके लेखन में जेल जीवन तथा वहां के अनुभवों की छाप दिखाई देती थी। ‘बंदिनी’ ने इसी साहित्यिक आधार को लेकर कल्याणी के माध्यम से प्रेम, अपराध, पश्चाताप, त्याग और स्वतंत्रता के सवालों को सामने रखा। यह बिमल रॉय की अंतिम निर्देशित फीचर फिल्मों में से एक थी और नूतन के अभिनय को आज भी हिंदी सिनेमा के उल्लेखनीय प्रदर्शनों में गिना जाता है।

‘गाइड’: आर.के. नारायण की रचना का सिनेमाई रूप

आर.के. नारायण के उपन्यास ‘The Guide’ पर बनी ‘गाइड’ ने साहित्यिक रूपांतरण को एक अलग ऊंचाई दी। विजय आनंद निर्देशित 1965 की इस फिल्म में देव आनंद और वहीदा रहमान मुख्य भूमिकाओं में थे।

‘नदिया के पार’ और ग्रामीण भारत

‘नदिया के पार’ साहित्य और लोकप्रिय सिनेमा के मेल का एक बड़ा उदाहरण है। राजश्री प्रोडक्शंस की 1982 की इस फिल्म को केशव प्रसाद मिश्र के उपन्यास ‘कोहबर की शर्त’ से जोड़ा जाता है। फिल्म में ग्रामीण उत्तर भारत की भाषा, परिवार, रिश्ते और विवाह की परंपराओं को केंद्र में रखा गया।

‘27 डाउन’: साहित्य से समानांतर सिनेमा तक

साहित्यिक रूपांतरणों की चर्चा सिर्फ लोकप्रिय फिल्मों तक सीमित नहीं है। भारतीय समानांतर सिनेमा में ‘27 डाउन’ महत्वपूर्ण उदाहरण है। अवतार कृष्ण कौल की यह फिल्म रमेश बक्षी के उपन्यास ‘अठारह सूरज के पौधे’ पर आधारित थी।

रस्किन बॉन्ड की रचना और ‘जुनून’

रस्किन बॉन्ड के उपन्यास ‘A Flight of Pigeons’ पर श्याम बेनेगल की ‘जुनून’ बनी। 1970 के दशक के उत्तरार्ध की यह फिल्म 1857 के विद्रोह की पृष्ठभूमि में प्रेम, सत्ता, हिंसा और सांस्कृतिक टकराव को सामने लाती है।

आगा हश्र कश्मीरी के चर्चित नाटक यहूदी पर : यहूदी

आगा हश्र कश्मीरी के चर्चित नाटक ‘यहूदी की लड़की’ पर आधारित। बिमल रॉय ने 1958 में इसे फ़िल्मी रूप दिया। दिलीप कुमार, मीना कुमारी और सोहराब मोदी प्रमुख भूमिकाओं में थे। कहानी रोमन साम्राज्य में यहूदियों के उत्पीड़न और प्रेम के संघर्ष पर केंद्रित है।

शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास पर :परिणीता

शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के प्रसिद्ध उपन्यास ‘परिणीता’ पर आधारित। इस रचना में प्रेम, सामाजिक वर्ग और पारिवारिक रिश्तों की कहानी है। उपन्यास का कई बार फ़िल्मी रूपांतरण हुआ है। 2005 की प्रदीप सरकार निर्देशित ‘परिणीता’ इसका चर्चित आधुनिक रूपांतरण है।

शरतचंद्र चट्टोपाध्याय का उपन्यास: देवदास

शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के इसी नाम के प्रसिद्ध उपन्यास पर आधारित। देवदास, पारो और चंद्रमुखी के रिश्तों ने भारतीय सिनेमा को यादगार कथा दी। बिमल रॉय की 1955 की फ़िल्म विशेष रूप से चर्चित रही। संजय लीला भंसाली ने 2002 में इसे भव्य सिनेमाई रूप में फिर प्रस्तुत किया।

कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी के उपन्यास पर: पृथ्वीवल्लभ

कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी के ऐतिहासिक उपन्यास पर आधारित। कहानी में सत्ता, प्रेम, प्रतिशोध और राजनीतिक संघर्ष के तत्व हैं। उपन्यास के ऐतिहासिक परिवेश ने फ़िल्मकारों को आकर्षित किया। यह भारतीय ऐतिहासिक साहित्य के सिनेमाई इस्तेमाल का उल्लेखनीय उदाहरण है।

फ़िल्म गुलशन नंदा के लेखन का चमस्कार: काजल

यह फ़िल्म गुलशन नंदा की लोकप्रिय लेखन-परंपरा से जुड़ी रही। फ़िल्म में प्रेम, परिवार और भावनात्मक संघर्ष को प्रमुखता दी गई। मीना कुमारी, धर्मेंद्र और राज कुमार इसके प्रमुख कलाकारों में थे। गुलशन नंदा के उपन्यासों ने हिंदी सिनेमा को कई लोकप्रिय कथानक दिए।

भगवती चरण वर्मा का उपन्यास: चित्रलेखा

भगवती चरण वर्मा के प्रसिद्ध उपन्यास ‘चित्रलेखा’ पर आधारित। कहानी प्रेम, वासना, वैराग्य और जीवन-दर्शन जैसे सवाल उठाती है। 1964 में केदार कपूर ने इसका चर्चित फ़िल्मी रूपांतरण किया। अशोक कुमार, प्रदीप कुमार और मीना कुमारी फ़िल्म के प्रमुख कलाकार थे।

थॉमस हार्डी के उपन्यास पर : दुल्हन एक रात की


यह फ़िल्म थॉमस हार्डी के उपन्यास ‘Tess of the d'Urbervilles’ से जुड़ी है। कहानी एक युवती के जीवन, प्रेम और सामाजिक परिस्थितियों के संघर्ष को सामने लाती है। फ़िल्म में नूतन और धर्मेंद्र प्रमुख भूमिकाओं में थे। विदेशी साहित्य को भारतीय सामाजिक संदर्भ में ढालने का यह उदाहरण है।

राहुल सांकृत्यायन के उपन्यास पर: फिर सुबह होगी

राहुल सांकृत्यायन के हिंदी रूपांतरण के बजाय इसे फ़्योदोर दोस्तोयेव्स्की के उपन्यास ‘Crime and Punishment’ से प्रेरित माना जाता है। सन 1958 की इस फ़िल्म का निर्देशन रमेश सहगल ने किया था। राज कपूर, माला सिन्हा और रहमान प्रमुख भूमिकाओं में थे। कहानी अपराध, अपराधबोध और सामाजिक असमानता के सवालों से जुड़ती है।

राजेंद्र सिंह बेदी की इसी नाम की कहानी पर: गरम कोट

राजेंद्र सिंह बेदी की इसी नाम की कहानी पर आधारित फ़िल्म। यह साधारण मध्यवर्गीय परिवार की आर्थिक कठिनाइयों को सामने लाती है। कहानी में ठंड से बचने के लिए कोट की जरूरत एक बड़े सामाजिक प्रतीक में बदल जाती है। फ़िल्म यथार्थवादी हिंदी सिनेमा की महत्वपूर्ण कृतियों में गिनी जाती है।

गुलशन नंदा की लोकप्रिय कथा: पत्थर के सनम

यह फ़िल्म गुलशन नंदा की लोकप्रिय कथा-परंपरा से जुड़ी मानी जाती है। इसमें प्रेम, गलतफ़हमी और रिश्तों के भावनात्मक उतार-चढ़ाव हैं। मनोज कुमार, वहीदा रहमान और मुमताज़ प्रमुख कलाकारों में थे। गुलशन नंदा की कहानियों की तरह इसमें भी लोकप्रिय भावनात्मक कथानक प्रमुख है।

सुबोध घोष की कहानी पर आधारित बिमल रॉय की फ़िल्म: सुजाता

सुबोध घोष की इसी नाम की कहानी पर आधारित बिमल रॉय की फ़िल्म। कहानी जाति व्यवस्था और सामाजिक भेदभाव के सवाल को केंद्र में रखती है। नूतन ने सुजाता की भूमिका को बेहद संवेदनशीलता से निभाया। फ़िल्म ने प्रेम और सामाजिक रूढ़ियों के बीच संघर्ष को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया।

रवींद्रनाथ ठाकुर की कहानी ‘क्षुधित पाषाण’ से प्रेरित: लेकिन

गुलज़ार निर्देशित 1991 की फ़िल्म ‘लेकिन…’ रवींद्रनाथ ठाकुर की 1895 में प्रकाशित कहानी ‘क्षुधित पाषाण’ से प्रेरित थी। कहानी की रहस्यमय और अलौकिक दुनिया को गुलज़ार ने राजस्थान की पृष्ठभूमि में नए सिनेमाई रूप में पेश किया। फ़िल्म में रहस्य, प्रेम, पुनर्जन्म और अतीत की अनसुलझी स्मृतियों का मेल दिखाई देता है।

टैगोर के उपन्यास पर आधारित : चोखेर बाली

रवींद्रनाथ ठाकुर के प्रसिद्ध उपन्यास ‘चोखेर बाली’ पर आधारित। कहानी बिनोदिनी के माध्यम से स्त्री की इच्छा, अकेलेपन और सामाजिक बंधनों को सामने लाती है। ऐश्वर्या राय बच्चन ने 2003 की ऋतुपर्णो घोष निर्देशित फ़िल्म में बिनोदिनी की भूमिका निभाई। यह टैगोर के साहित्य का आधुनिक भारतीय सिनेमा में चर्चित रूपांतरण है।

समरेश बसु की कहानी पर आधारित: खंडहर

मृणाल सेन की 1984 की फ़िल्म ‘खंडहर’ बंगाली लेखक समरेश बसु की कहानी पर आधारित है। कहानी एक उजड़े हुए घर और वहां रह रही मां-बेटी की त्रासदी के इर्द-गिर्द घूमती है। नसीरुद्दीन शाह, शबाना आजमी और गीता सेन प्रमुख भूमिकाओं में थे।

समरेश बसु की रचना से प्रेरित फ़िल्म : नमकीन

गुलज़ार निर्देशित ‘नमकीन’ समरेश बसु की रचना से प्रेरित फ़िल्म है। कहानी पहाड़ी इलाके में रहने वाली मां और उसकी बेटियों के जीवन को केंद्र में रखती है। वहीदा रहमान, शर्मिला टैगोर और शबाना आजमी प्रमुख भूमिकाओं में थीं।

मन्नू भंडारी की कहानी पर बनी: रजनीगंधा

बासु चटर्जी की लोकप्रिय फ़िल्म मन्नू भंडारी की कहानी ‘यही सच है’ पर आधारित है। फ़िल्म प्रेम, पुराने रिश्ते और भावनात्मक दुविधा को सरल अंदाज़ में प्रस्तुत करती है। विद्या सिन्हा, अमोल पालेकर और दिनेश ठाकुर प्रमुख भूमिकाओं में थे।

मृणाल सेन की 1969 की फ़िल्म: भुवन शोम

मृणाल सेन की 1969 की फ़िल्म ‘भुवन शोम’ बनफूल की इसी नाम की कहानी पर आधारित है। फ़िल्म एक कठोर और अकेले अधिकारी के जीवन में आए बदलाव की कहानी है। उत्पल दत्त और सुहासिनी मुले ने प्रमुख भूमिकाएं निभाईं। इसे भारतीय समानांतर सिनेमा के शुरुआती महत्वपूर्ण पड़ावों में माना जाता है।

गुलशन नंदा का शाहकार : महबूबा

‘महबूबा’ गुलशन नंदा की लोकप्रिय साहित्यिक दुनिया से जुड़ी फ़िल्म है। कहानी प्रेम, पुनर्जन्म और अधूरे रिश्तों के इर्द-गिर्द बुनी गई है। राजेश खन्ना, हेमा मालिनी और प्रेम चोपड़ा प्रमुख कलाकारों में थे। फ़िल्म ने लोकप्रिय रोमांस को रहस्य और पुनर्जन्म के तत्वों के साथ जोड़ा।

बासु भट्टाचार्य की फ़िल्म : पंचवटी

बासु भट्टाचार्य की फ़िल्म ‘पंचवटी’ कुसुम अंसल के उपन्यास ‘उसकी पंचवटी’ पर आधारित है। कहानी रिश्तों, अकेलेपन और भावनात्मक जटिलताओं को केंद्र में रखती है। अकादमिक और साहित्यिक पृष्ठभूमि वाली कुसुम अंसल ने फ़िल्म की पटकथा और संवाद भी लिखे।

एरिक सीगल के उपन्यास से प्रेरित : मासूम

शेखर कपूर की ‘मासूम’ एरिक सीगल के उपन्यास ‘Man, Woman and Child’ से प्रेरित है। फ़िल्म विवाह, परिवार और एक बच्चे के भावनात्मक संघर्ष को सामने लाती है। नसीरुद्दीन शाह, शबाना आजमी और जुगल हंसराज प्रमुख भूमिकाओं में थे।

बासु चटर्जी की फ़िल्म : चितचोर

बासु चटर्जी की ‘चितचोर’ सुबोध घोष की कहानी ‘चित्तचकोर’ पर आधारित मानी जाती है। फ़िल्म ग्रामीण परिवेश और सरल प्रेम कहानी के माध्यम से रिश्तों की मासूमियत दिखाती है। अमोल पालेकर, ज़रीना वहाब और विजयेंद्र घाटगे प्रमुख कलाकार थे।

अमृता प्रीतम के इसी नाम के उपन्यास पर आधारित: पिंजर

चंद्रप्रकाश द्विवेदी की ‘पिंजर’ अमृता प्रीतम के इसी नाम के उपन्यास पर आधारित है। कहानी भारत विभाजन के दौरान स्त्री की पीड़ा और विस्थापन को केंद्र में रखती है। उर्मिला मातोंडकर और मनोज बाजपेयी ने प्रमुख भूमिकाएं निभाईं।

हंसा वाडकर की आत्मकथा पर आधारित : भूमिका

श्याम बेनेगल की ‘भूमिका’ अभिनेत्री हंसा वाडकर की आत्मकथा ‘Sangtye Aika’ पर आधारित है। स्मिता पाटिल ने फ़िल्म में अभिनेत्री उषा की केंद्रीय भूमिका निभाई। कहानी सिनेमा, रिश्तों, निजी स्वतंत्रता और महिला कलाकार के संघर्ष को सामने लाती है।

गोवर्धनराम माधवराम त्रिपाठी के उपन्यास पर आधारित: सरस्वतीचंद्र

यह फ़िल्म पंडित गोवर्धनराम माधवराम त्रिपाठी के प्रसिद्ध गुजराती उपन्यास ‘सरस्वतीचंद्र’ पर आधारित है। सन 1968 की फ़िल्म में मनीष और नूतन ने प्रमुख भूमिकाएं निभाईं। उपन्यास की विशाल कथा को फ़िल्म ने लोकप्रिय सिनेमाई रूप में प्रस्तुत किया।

संस्कृत नाटककार शूद्रक के ‘मृच्छकटिकम्’ पर आधारित :उत्सव

गिरीश कर्नाड निर्देशित ‘उत्सव’ संस्कृत नाटककार शूद्रक के ‘मृच्छकटिकम्’ पर आधारित है। कहानी प्राचीन उज्जैन की पृष्ठभूमि में प्रेम, राजनीति और सामाजिक जीवन को सामने लाती है। फ़िल्म ने प्राचीन संस्कृत साहित्य को रंगीन और लोकप्रिय सिनेमाई रूप दिया।

धर्मवीर भारती के इसी नाम के उपन्यास पर आधारित: सूरज का सातवां घोड़ा

श्याम बेनेगल की यह फ़िल्म धर्मवीर भारती के इसी नाम के उपन्यास पर आधारित है। कहानी एक कथाकार और उसके सुनाए प्रेम प्रसंगों के माध्यम से आगे बढ़ती है। फ़िल्म प्रेम और रिश्तों के अलग-अलग सामाजिक रूपों को सामने रखती है।

बिमल मित्र के उपन्यास पर आधारित: साहब बीवी और ग़ुलाम

अबरार अल्वी की चर्चित फ़िल्म बिमल मित्र के इसी नाम के उपन्यास पर आधारित थी। कहानी ढलते सामंती समाज और हवेली की दुनिया को केंद्र में रखती है। मीना कुमारी, गुरु दत्त और रहमान ने प्रमुख भूमिकाएं निभाईं। छोटी बहू का किरदार हिंदी सिनेमा के यादगार स्त्री पात्रों में शामिल है।

निहार रंजन गुप्त की बांग्ला रचना पर आधारित: ममता

‘ममता’ निहार रंजन गुप्त की बांग्ला रचना ‘उत्तर फाल्गुनी’ का हिंदी रूपांतरण है। असित सेन ने 1966 में इसे हिंदी फ़िल्म के रूप में बनाया।सुचित्रा सेन ने फ़िल्म में दोहरी भूमिका निभाई, जबकि धर्मेंद्र और अशोक कुमार प्रमुख भूमिकाओं में थे। कहानी मां, बेटी, प्रेम और सामाजिक परिस्थितियों के भावनात्मक संघर्ष पर आधारित है।

प्रेमचंद की कहानी पर आधारित: शतरंज के खिलाड़ी

सत्यजीत रे की फ़िल्म प्रेमचंद की इसी नाम की कहानी पर आधारित है। कहानी 1856 के अवध और नवाबी व्यवस्था के अंतिम दौर की पृष्ठभूमि में है। संजय लीला भंसाली की तरह भव्यता के बजाय रे ने सामाजिक-राजनीतिक विडंबना पर जोर दिया।

प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी पर केंद्रित: सद्गति

सत्यजीत रे की टेलीफ़िल्म प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी ‘सद्गति’ पर आधारित है। कहानी जातिगत भेदभाव और शोषण की कठोर सामाजिक वास्तविकता सामने रखती है। ओम पुरी और स्मिता पाटिल ने इसमें प्रभावशाली अभिनय किया। फ़िल्म प्रेमचंद की सामाजिक दृष्टि को बेहद तीखे और यथार्थवादी रूप में प्रस्तुत करती है।

थॉमस हार्डी से लेकर शेक्सपियर तक

भारतीय फिल्मों ने विदेशी साहित्य को भी अपनाया है। ‘दुल्हन एक रात की’ को थॉमस हार्डी के उपन्यास ‘Tess of the d'Urbervilles’ से जोड़ा जाता है। फिल्म में धर्मेंद्र और नूतन प्रमुख भूमिकाओं में थे। उपलब्ध फिल्म संदर्भ भी इसे हार्डी के उपन्यास पर आधारित बताते हैं।

इसके अलावा शेक्सपियर की रचनाओं ने भारतीय सिनेमा को कई अलग रूप दिए। विशाल भारद्वाज की ‘मकबूल’, ‘ओंकारा’ और ‘हैदर’ को क्रमशः ‘Macbeth’, ‘Othello’ और ‘Hamlet’ से प्रेरित माना जाता है।

इन फिल्मों की खासियत यह है कि शेक्सपियर के मूल कथानक को भारतीय सामाजिक और राजनीतिक परिवेश में ढाला गया। ‘मकबूल’ में मुंबई के अपराध जगत, ‘ओंकारा’ में उत्तर भारत की राजनीतिक-सामाजिक दुनिया और ‘हैदर’ में कश्मीर की पृष्ठभूमि ने मूल रचनाओं को नया संदर्भ दिया।

साहित्यिक रूपांतरणों की सबसे बड़ी ताकत

साहित्य पर फिल्म बनाना सिर्फ कहानी खरीद लेने या किताब को स्क्रीनप्ले में बदल देने का काम नहीं है। लेखक के शब्दों को दृश्य, आवाज, अभिनय, संगीत और कैमरे की भाषा में बदलना पड़ता है।

कई बार फिल्म मूल रचना के बिल्कुल करीब रहती है, तो कई बार उसमें बड़े बदलाव किए जाते हैं। कुछ रूपांतरण आलोचकों को पसंद आते हैं, कुछ दर्शकों को। लेकिन हर सफल साहित्यिक फिल्म एक महत्वपूर्ण काम करती है—वह किसी पुरानी रचना को नए दर्शकों के सामने फिर से जीवित कर देती है।

आज जब दर्शक थिएटर के साथ-साथ ओटीटी प्लेटफॉर्म पर भी कंटेंट देख रहे हैं, साहित्यिक रूपांतरणों की संभावनाएं और बढ़ी हैं। हाल के वर्षों में हिंदी साहित्य और समानांतर सिनेमा के रिश्ते पर भी फिर से चर्चा तेज हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि मजबूत साहित्यिक कथानक आज भी फिल्मकारों को आकर्षित कर सकते हैं, हालांकि व्यावसायिक दबाव के कारण ऐसी फिल्मों की संख्या सीमित हुई है।

‘बंटवारा 1947’ इस परंपरा की नई कड़ी

‘बंटवारा 1947’ को इसी व्यापक परंपरा में देखना चाहिए। यह सिर्फ 1947 के विभाजन की कहानी नहीं, बल्कि उस दौर में टूटते रिश्तों और बची हुई इंसानियत का सिनेमाई रूपांतरण है।

असगर वजाहत के नाटक की मूल ताकत सांप्रदायिक विभाजन के बीच मानवीय रिश्तों को देखने में है। फिल्म ने इस विचार को बड़े पर्दे पर पहुंचाया है। हालांकि समीक्षकों ने इसके प्रस्तुतीकरण को लेकर अलग-अलग राय दी है, लेकिन साहित्य से सिनेमा तक इसकी यात्रा अपने आप में महत्वपूर्ण है।

इस पूरी परंपरा को देखें तो ‘देवदास’, ‘बंदिनी’, ‘तीसरी कसम’, ‘रजनीगंधा’, ‘गाइड’, ‘नदिया के पार’, ‘27 डाउन’, ‘जुनून’, ‘मकबूल’, ‘ओंकारा’ और ‘हैदर’ जैसी फिल्मों ने साबित किया है कि साहित्य और सिनेमा एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं।

साहित्यिक कृतियों पर बनी फिल्मों से सिनेमा की धरोहर बनी

किताब का पन्ना जब पर्दे पर आता है तो कहानी का माध्यम बदल जाता है, लेकिन अच्छी रचना का मूल सवाल अक्सर वही रहता है—इंसान कौन है, उसके रिश्ते क्या हैं और बदलते समय में उसकी पहचान किस तरह बनती और टूटती है। यही वजह है कि साहित्यिक कृतियों पर बनी फिल्में दशकों बाद भी दर्शकों और पाठकों के बीच चर्चा में बनी रहती हैं।