रायपुर

थम गईं सांसें…पर यादों में ‘टाइगर अभी जिंदा है’… दहाड़ गूंजती रहेगी…

Surendra Dubey Passed away: पद्मश्री डॉ. सुरेन्द्र दुबे, छत्तीसगढ़ी भाषा-साहित्य के गौरव और हास्य-कविता के स्तंभ, अब नहीं रहे। उनका साहित्यिक योगदान और हास्य की अनूठी शैली उन्हें हमेशा श्रोताओं और कवियों के दिलों में जीवित रखेगी।

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Jun 27, 2025
थम गईं सांसें…पर यादों में ‘टाइगर अभी जिंदा है’… दहाड़ गूंजती रहेगी…(photo-patrika)

Surendra Dubey Passed away: छत्तीसगढ़ के रायपुर में छत्तीसगढ़ी भाषा-साहित्य का समृद्ध बनाने वाले, राज्य और हर छत्तीसगढ़िया को विश्वभर में सम्मान दिलाने वाले पद्मश्री, छत्तीसगढ़ रत्न, हास्य रत्न, काका हाथरसी जैसे कई सारे सम्मान से नवाजे जाने डॉ. सुरेन्द्र दुबे देशभर के लाखों श्रोताओं, प्रशंसकों, साहित्यकारों, कवियों के जेहन में उनके किस्से-कहानी व यादें कविताओं के रूप में हमेशा जिंदा रहेंगी।

उन्होंने अपनी मृत्यु की अफवाह के बीच भी कविता लिखकर हास्य व संवेदना निकाल ली। कोविड महामारी के दौरान उनकी कविताएं लोगों के लिए आशा की किरण बनीं। मनोरंजन ही नहीं, बल्कि सामाजिक जागरुकता का माध्यम भी बनीं। ऐसे अनूठे विरले हास्य व्यंग्य के संवेदनशील कवि के बारे में छत्तीसगढ़ के साहित्यकारों की शब्द-भावांजलि यहां प्रस्तुत है…

Surendra Dubey Passed away: टाइम नहीं है तो अतका, टाइम रहतीस तो कतका

पलभर में बहुत कुछ सोच कर बोल देने की क्षमता वाले सुरेंद्र दुबेजी ने व्यंग्य की दो लाइन में बड़ी लंबी बात कह दी थी कि - टाइम नहीं है तो अतका, टाइम रहतीस तो कतका? आशय था कि जब लोग कहते हैं कि टाइम नहीं है तो जनसंख्या के ये हाल हैं, अगर लोगों के पास वक्त होता तो क्या हाल होता..। वे खुद को ब्लैक डायमंड कहकर हंसाते थे।

दरअसल ब्लैक डायमंड तो व्हाइट से महंगा व दुर्लभ होता है। जब 2018 में राजस्थान के कवि सुरेंद्र दुबे का निधन हुआ था, तब खबर फैल गई कि छत्तीसगढ़ के सुरेंद्र दुबे का निधन हो गया है। इस अफवाह पर भी उन्होंने कविता बना दी कि अरे चुप यह हास्य का कोकड़ा है ठहाके का परिंदा है।

टेंशन में मत रहना बाबू टाइगर अभी जिंदा है

कवि सम्मेलनों में सबसे अंत में वे ब्रह्मास्त्र की तरह उतारे जाते हैं। मुझे गर्व है कि ऐसी शख्सियत के साथ मुझे तीन बार मंच संचालन का अवसर मिला।

( जैसा कवि लक्ष्मीनारायण लाहोटी ने पत्रिका को बताया)

परदा गिरे के बाद भी ताली बाजत रहय

वर्ष 1982-83 में मेरी पहली मुलाकात उनसे दुर्ग में हुई थी। उस दौरान नाट्य संस्था क्षितिज रंग शिविर में हम रंगकर्मियों का दल सक्रिय था। हमने उनके लिखे नाटक का मंचन किया था। पद्मश्री दुबे जी कहते थे ’’ मनखे अपन जिनगी म रोजाना, हर पल, हर घड़ी नवा नवा नाटक करत रहिथे। नवा नवा किरदार ल जीयत रहिथे’’।

विजय भाई, याद रखना चाहिए कि सीमेंटसे बने रंगमंच पर जारी नाटक के अंत का पता होता है, किन्तु जिंदगी के नाटक में किसका पर्दा कब गिरेगा? कोई नहीं जानता। उनकी ए बातें याद करके आंखें नम हैं। वे हौसला बढ़ाते हुए कहते थे- ’’विजय भाई, ते तों रंगकर्मी आस, कुछू न कुछू करते रहिथस। बस अतेक सुरता राखबे कि अपन काम ल हमेशा उम्दा करबे,ताकि परदा गिरे के बाद भी ताली बाजत रहय।’’। आज सोच रहा हूं कि उनकी जिंदगी का पर्दा भले गिर गया, पर उनके यश की चर्चा चहुंओर है। वे अपने किरदार को जी भरकर जिए।

( जैसा कि लोक रंगकर्मी विजय मिश्रा ’अमित’ ने पत्रिका को बताया)

थक गया हूं, जितना करना था कर चुका हूं..

22 जून की शाम थी, डीडीयू ऑडिटोरियम में काव्य कुंभ था। मंच के पीछे दो कवि चुपचाप बैठे थे। एक मीर अली मीर, दूसरे पद्मश्री डॉ. सुरेंद्र दुबे। दोनों ने बिना शक्कर की चाय पी और फिर वो शब्द जो अब याद बन चुके हैं। तब डॉ. दुबे ने कहा था - मीर, अब मैं कम कार्यक्रम लेता हूं। थक गया हूं…जितना करना था, कर दिया।

फीस भी बढ़ा दी, लेकिन फिर भी बुलाते हैं। ये मोहब्बत है। फिर वो मंच पर उतरे, ठहाकों की चादर बिछी और एक संस्मरण सुनाया- जब राजस्थान वाले सुरेंद्र गुजर गए थे, लोगों ने गलती से मेरी तस्वीर पर माला चढ़ा दी थी। तब मैंने लिखा- ये हास्य का कोकड़ा है, ठहाके का परिंदा है टेंशन मत लेना बाबू, टाइगर अभी जिंदा है..। मैंने उनके साथ 20 से ज्यादा मंच साझा किए। वो केवल मंच के राजा ही नहीं थे, दिल के भी बहुत बड़े इंसान थे।

( जैसा कि मीर अली मीर ने पत्रिका को बताया)

‘तुमड़ीबोड़’ से शुरू हुआ था सफर

सन् 1984 में तुमड़ीबोड़ में मैंने और लक्ष्मण मस्तुरिया ने डॉ. दुबे को पहले मंच के लिए आमंत्रित किया। वहां उन्होंने पहली कविता पढ़ी थी। उसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुडक़र नहीं देखा। वैष्णव कहते हैं, वे सबसे ज्यादा हवाई यात्रा करने वाले छत्तीसगढ़ी कवि थे। मंचीय कविता को उन्होंने नई ऊंचाई दी। उनके शब्द, उनकी हंसी, उनके व्यंग्य साहित्य के आसमान में एक सितारे की तरह चमकते रहेंगे। उन्होंने कहा था- टेंशन में मत रहना बाबूज् टाइगर अभी जिंदा है।

( जैसा कि वरिष्ठ साहित्यकार रामेश्वर वैष्णव ने पत्रिका को बताया)

ओबामा को छत्तीसगढ़ी में कविता सुनाई

डॉ. सुरेन्द्र दुबे आयुर्वेद चिकित्सक थे, लेकिन श्रोताओं की नब्ज टटोलने में माहिर थे। उन्होंने बराक ओबामा को छत्तीसगढ़ी में कविता सुनाकर और अंग्रेजी अनुवाद देकर छत्तीसगढ़ी के सामर्थ्य को साबित किया। अमेरिका में जब मैंने उनसे पूछा कि भैया ये तो छत्तीसगढ़ी नहीं समझते, फिर आप कविता क्यों सुना रहे हैं। वे कहते समझना उनकी समस्या है पर छत्तीसगढ़ी में कविता पढ़ना मेरी महतारी भाषा का सम्मान है।

पद्मश्री ग्रहण करते हुए उनकी मुलाकात आमिर ख़ान से हुई। उनके आग्रह पर नक्सलवाद पर उन्होंने कविता सुनाई। आमिर ने उन्हें बस्तर पर फिल्म के लिए पटकथा लिखने की सलाह दी। बाद में उन्होंने सरफरोश के निर्देशक को रायपुर भी भेजा। हालांकि यह काम अधूरा रह गया। डॉ. दुबे छत्तीसगढ़ी को कामकाज की भाषा बनाना चाहते थे। वे छत्तीसगढ़ी के लिए नेताओं और अधिकारियों से लड़ लेते थे।

  • डॉ सुधीर शर्मा, अध्यक्ष, हिंदी एवं पत्रकारिता विभाग कल्याण स्ना.महाविद्यालय, भिलाई
Published on:
27 Jun 2025 10:05 am
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