CG News: अगरबती कहती हैं कि जब हमें बड़ा ऑर्डर मिलता है तो हमारा पूरा परिवार इसे बनाने में सहयोग करता है क्योंकि पूरा परिवार ही इस कला से जुड़ा हुआ है।
CG News: सरिता दुबे/कला तो विरासत में मिलती है और इसे सहेजने से इसका रूप और निखरता है। कुछ इसी तरह का काम कोंडागांव से 7 किलोमीटर दूर बसे गुना गांव की अगरबती कर रही हैं। पांचवीं तक पढ़ी अगरबती पोयम ने शादी के बाद पति नरेंद्र पोयम के साथ तुमा और रॉक आयरन का काम सीखा और उसी काम को आगे बढ़ाने के लिए तुमा क्राफ्ट में कई सारे नवाचार किए।
देसी लौकी, जिसे एक प्रोसेस के तहत सुखा कर तुमा का रूप दिया जाता है। छत्तीसगढ़ के आदिवासी क्षेत्रों में रहने वाले लोग तुमा को पानी की बोतल के तौर पर इस्तेमाल करते है, लेकिन अब यही तुमा क्राफ्ट का रूप ले चुका है और इसे बस्तर में क्राफ्ट का रूप देने वाले अगरबती के पति नरेंद्र ही हैं। अगरबती बताती हैं कि अब हम लोग तुमा से नाइट लैंप, वॉल हैंगिंग बना रहे हैं, जिसे लोग बहुत पसंद करते हैं।
अगरबती पोयम बताती हैं कि समय के साथ सभी चीजें महंगी हो गई हैं। इस कारण अब इस कला के खरीदार भी कम हुए है। जब हमारे पास काम रहता है तो हम पूरा समय कला को ही देते हैं लेकिन जब हमारे पास काम नहीं रहता तब हम खेतों में जाकर काम भी करते हैं। अगरबती कहती हैं कि जब हमें बड़ा ऑर्डर मिलता है तो हमारा पूरा परिवार इसे बनाने में सहयोग करता है क्योंकि पूरा परिवार ही इस कला से जुड़ा हुआ है।
CG News: विदेशी इसे बहुत खरीदते उन्होंने बताया कि 18 साल की उम्र में जब शादी करके पोयम परिवार में आईं तो परिवार के लोगों से ही तुमा, बांस और रॉक आयरन की चीजें बनानी सीखीं। विदेश इन कलाकृतियों को खरीदकर ले जाती हैं। पोयम परिवार अपने पुरखों की कला को सहेजने में लगा हुआ है।