रायपुर

CG Election 2018: सरगुजा के जंगलों में जिंदगी की जंग लड़ रहे आदिवासी

लुल्ह, बैजनपाठ और भुंडा के लोग आज भी "विकास" की बाट जोह रहे हैं। इन गांवों तक पहुंचने के लिए न सडक़ है, न बिजली।

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Oct 28, 2018
CG Election 2018: सरगुजा के जंगलों में जिंदगी की जंग लड़ रहे आदिवासी

रायपुर. लुल्ह, बैजनपाठ और भुंडा के लोग आज भी "विकास" की बाट जोह रहे हैं। इन गांवों तक पहुंचने के लिए न सडक़ है, न बिजली। गांव के हालात कुछ ऐसे हैं कि उन्हें पीने के पानी के लिए भी 3 किलोमीटर लंबा सफर तय करना पड़ता है।

इस बदहाली में जीवन जी रहे ग्रामीणोंं को फिर भी लोकतंत्र पर पूरा भरोसा है। वे कहते हैं कि क्या हम इंसान नहीं हैं? हमें सुविधाओं में जीवन बिताने का कोई हक नहीं है क्या? हम पहाड़ पर रहने वालों पर सरकार की नजर कहां पड़ेगी, साहब! हालांकि इन्हें लोकतंत्र पर पूरा भरोसा है। वे इस बार भी वोटिंग करेंगे। पढ़िए अम्बिकापुर से प्रणय राज सिंह राणाा की ग्राउंड जीरो रिपोर्ट।

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राज्य गठन के बाद से यहां के ग्रामीण हर मर्तबा लोकतंत्र के इस उत्सव में बढ़-चढक़र हिस्सा लेते हैं। 2013 में यहां कोई सरकारी भवन नहीं था। पेड़ों को काटकर अस्थायी पोलिंग बूथ बनाया गया था। इस बार एक आंगनबाड़ी केंद्र बनाया गया है। यहीं वोटिंग होगी। 2013 और 2018 के बीच गांव में केवल यही विकास नजर आता है। 5 साल में सरकार ने यहां एक बार पानी पहुंचाने की असफल कोशिश की थी।

राशन के लिए 9 किमी की पदयात्रा
राशन के लिए भी खासी मशक्कत करनी पड़ती है। उर्मिला और फूलकुंवर बताती हैं कि परिवार के पुरुष सदस्य राशन के लिए मोहली जाते हैं। यह हमारे गांव से करीब 9 किलोमीटर दूर है। यहां से राशन को कंधे पर ढोकर लाना पड़ता है।

हमें हमारे हाल पर छोड़ बैठे हैं
पहाड़ पर बसे इन गांवों में आज तक कोई बड़ा नेता नहीं पहुंचा है। ये जितने नाराज भाजपा के मंत्री से हैं उतने ही नाराज कांग्रेस के अपने विधायक से भी। इनकी किसी को चिंता नहीं है।

हफ्ते में एक बार उतरते हैं पहाड़ से
बैजनपाठ निवासी रामनरेश, जवाहर और अमोल बताते हैं कि गांव के ज्यादातर लोग बाजार वाले दिन ही पहाड़ से नीचे उतरते हैं। यहां गांव से नीचे जाकर लौटने में एक पूरा दिन लग जाता है। गुरु घासीदास राष्ट्रीय उद्यान का इलाका होने की वजह से जानवरों के हमले का भी खतरा बना रहता है।

इन गांवों में यदि कोई बीमार पड़ जाए तो उनके इलाज की कोई व्यवस्था नहीं है। गर्भवती महिलाओं की डिलीवरी आज भी गांव की बुजुर्ग महिलाएं ही करती हैं। सडक़ नहीं होने की वजह से यहां तक एम्बुलेंस नहीं पहुंच पाती है। स्वास्थ्य सुविधाओं के आभाव में भी गांव में कई लोगों की मौत हो चुकी है।

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Published on:
28 Oct 2018 03:47 pm
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