CG News: छोटे शहरों के थिएटरों से सीधे संवाद, लोग कहते हैं पब्लिक नहीं आती, पर जहां पिक्चर अच्छी है वहां दर्शक खुद पहुंचते हैं…
ताबीर हुसैन. संवेदनशील और मुद्दों पर फिल्म बनाने वाले डायरेक्टर अनुभव सिन्हा आज रायपुर में है। पत्रिका से बातचीत में साफ कहा कि फिल्म का असर बॉक्स ऑफिस तक सीमित नहीं होता, लेकिन संग्रह भी महत्वपूर्ण है। ‘तुम बिन’, ‘तपड़’ जैसी फिल्में बनाने वाले अनुभव इन दिनों देश के 30-40 शहरों का दौरा कर रहे हैं। ( CG News ) उनका कहना है, मैं छोटे शहरों में थिएटर वालों से मिलता हूं, लोकल खाने-पीने की जगहों पर जाता हूं, लोगों से पूछता हूं आखिर पब्लिक क्यों नहीं आ रही? लेकिन सच ये है कि अगर फिल्म अच्छी है, तो दर्शक आज भी थिएटर आते हैं।
उन्होंने बताया कि उनकी फिल्मों की दिशा उम्र के साथ बदली बाल सफेद हो गए, थोड़ी अक्ल आ गई… अब वही कहानी चुनता हूं जो मुझे असहज करती है। जो बात मुझे चुभती है, वही फिल्म बनती है।
अगर अन-डिज़र्विंग को फायदा मिले, वही असली नेपोटिज़्म है। ये सिर्फ बॉलिवुड में नहीं, पूरे देश में है।
वे हंसे और बोले ये ट्रेडिंग क्वेस्चन है… कहानी एआई नहीं लिखेगा। कहानी आपको ढूंढती है, आपको उसे ढूंढने की जरूरत नहीं।
कई लोग ओटीटी का फुल फॉर्म भी नहीं जानते, पर चर्चा बड़ी करते हैं। आगे की योजनाओं पर अनुभव ने कहा कि वे कुछ नया लिख रहे हैं, सोच रहा हूं, लिख रहा हूं… जल्द कुछ अलग बनाने का मन है। उन्होंने यह भी माना कि छोटे शहरों को लेकर जो मिथ बने हैं जैसे दर्शक फिल्में नहीं देखते वो गलत हैं। जहां स्टोरी स्ट्रॉन्ग है, वहां दर्शक आज भी टिकट खरीदते हैं। समस्या कहानी की है, शहर की नहीं।
मेरे लिए सफलता का पैमाना सिर्फ कमाई नहीं, असर है।
साफ अच्छी फिल्में बनेंगी तो थिएटर जिंदा रहेंगे, और दर्शक भी वापस लौटेंगे।