Indian Railway: यात्री ने आईआरसीटीसी के माध्यम से ऑनलाइन रिटायरिंग रूम बुक किया। पैसे ऑनलाइन कट गए, लेकिन तकनीकी कारण से इसकी बुकिंग की पुष्टि नहीं हुई। जब वह यात्री स्टेशन पहुंचा तो खाली होने पर उसे रूम दे दिया गया।
Indian Railway: भारतीय रेलवे और IRCTC से जुड़ा एक सकारात्मक मामला सामने आया है, जहां डिजिटल लेनदेन के दौर में एक यात्री ने ईमानदारी की मिसाल पेश की। डिजिटल लेनदेन के दौर में जहां अक्सर शिकायतें सुनने को मिलती हैं, वहीं एक यात्री ने ईमानदारी की मिसाल पेश की है। दरअसल यात्री ने आईआरसीटीसी के माध्यम से ऑनलाइन रिटायरिंग रूम बुक किया। पैसे ऑनलाइन कट गए, लेकिन तकनीकी कारण से इसकी बुकिंग की पुष्टि नहीं हुई। जब वह यात्री स्टेशन पहुंचा तो खाली होने पर उसे रूम दे दिया गया।
इसके बाद जब वह वापस विशाखापट्टनम पहुंचा तो देखा कि आईआरसीटीसी ने उसके पैसे ऑनलाइन वापस कर दिए। जिसके बाद यात्री ने रेलवे को मेल कर पैसे वापस करने की बात कही। यह पूरा मामला 9 मार्च को दुर्ग स्टेशन में हुआ। विशाखापट्टनम निवासी यात्री पीएसडी प्रसाद ने 9 से 11 मार्च दो दिन के लिए दो विश्राम कक्ष बुक किए, उसके लिए 5385 रुपए का भुगतान किया। 9 मार्च को वंदे भारत ट्रेन से यात्रा कर रात लगभग 10.30 बजे दुर्ग स्टेशन पहुंचा। दुर्ग स्टेशन पर वाणिज्य विभाग के रेल कर्मियों ने मदद की उन्हें दो कमरे दिए, क्योंकि उनका लेनदेन आईडी सिस्टम में दिखा रहा था।
यात्री ने दो बार ईमेल करके रिफंड न करने का अनुरोध भी किया और कहा कि मैंने भारतीय रेलवे की सेवाओं का उपयोग किया है और रिटायरिंग रूम में ठहरा, इसलिए मैं भारतीय रेलवे को राशि वापस करना चाहता हूं। मेल देखने के बाद सीनियर डीसीएम अवधेश कुमार त्रिवेदी ने उन्हें कॉल कर बात की और कहा कि समाज में आज भी आप जैसे अच्छे लोग हैं। उन्होंने कहा कि दुर्ग में मदद करने वाले रेल कर्मी को प्रशंसा पत्र दिया जाएगा। साथ ही संबंधित अधिकारियों को निर्देशित किया कि रिटायरिंग रूम की राशि प्राप्त कर आईआरसीटीसी को जमा करें।
डिजिटल युग में जहां अक्सर शिकायतें और विवाद सामने आते हैं, वहां यह घटना एक सकारात्मक उदाहरण है
यात्री की ईमानदारी और रेलवे कर्मचारियों की संवेदनशीलता दोनों ही सराहनीय हैं
यह मामला सार्वजनिक सेवाओं में विश्वास और पारदर्शिता को मजबूत करता है
यह घटना बताती है कि तकनीकी खामियों के बावजूद इंसानी मूल्यों—ईमानदारी और सहयोग—की अहमियत आज भी बनी हुई है।