पुलिस मुख्यालय ने जारी किए थे नए दिशा-निर्देश
रायपुर . अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम में सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों का छत्तीसगढ़ में पालन कराने को लेकर जारी पुलिस मुख्यालय के आदेश पर राज्य सरकार ने रोक लगा दी है। नए आदेश में कहा गया था कि बिना प्रारंभिक जांच के गिरफ्तारी नहीं की जा सकती। गिरफ्तारी से पहले एसपी की लिखित अनुमति जरूरी होगी।
मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने मंगलवार को कांकेर रवाना होने से पहले कहा कि छत्तीसगढ़ एससी-एसटी बहुल राज्य है। यहां इन समाजों की 44 फीसदी आबादी है। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से राज्य सरकार भी प्रभावित हो रही थी, लिहाजा सरकार पुलिस मुख्यालय से जारी आदेश को तत्काल प्रभाव से स्थगित करती है।
मुख्यमंत्री डॉ. सिंह ने कहा कि इस फैसले के खिलाफ जल्द ही राज्य सरकार की ओर से सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका लगाई जाएगी। मुख्यमंत्री ने कहा कि एससी-एसटी समुदाय के मान-सम्मान की रक्षा की जवाबदारी सरकार की है। सरकार भी इस मसले को लेकर संवेदनशील रही है।
समाज की नाराजगी ने बदला रुख : सर्वोच्च न्यायालय फैसले के बाद से ही एससी-एसटी समुदाय में आक्रोश पनपा था। समाज ने इसे कानून को कमजोर करने की कोशिश के तौर पर देखा। कांग्रेस का आरोप था कि केंद्र सरकार ने जानबूझकर कमजोर पैरवी की। 2 अप्रैल के प्रदर्शन से सरकार को अंदाजा हो गया कि विधानसभा चुनाव में यह नाराजगी भारी पड़ेगी। केंद्र सरकार के अदालत जाने के बाद छत्तीसगढ़ में भी कदम पीछे खींच लेने का फैसला हो गया।
गृह मंत्री भूपेन्द्र सिंह ने आदेश निरस्त करने बुलाई प्रेस कान्फ्रेंस, दो बार बदला समय। एसीएस होम-डीजीपी ने हाइकोर्ट जबलपुर के आदेश का हवाला देते हुए आदेश वापिस लेने से किया इनकार।
पुलिस मुख्यालय ने 23 मार्च को जारी परिपत्र को मंगलवार को वापस ले लिया। राज्य सरकार ने अतिरिक्त महाधिवक्ता को केंद्र सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दायर पुनर्विचार याचिका में पक्षकार बनने निर्देश दिए हैं।
एडीजी आर.के. विज ने 6 अप्रैल को सभी पुलिस अधीक्षकों को निर्देश जारी किया था। इसमें एससी-एसटी एक्ट को लेकर हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जारी किए गए दिशानिर्देशों का पालन करने को कहा गया था। उल्लंघन की स्थिति में अनुशासनात्मक कार्रवाई की चेतावनी भी दी गई थी