छत्तीसगढ़ का उदय 16 साल पहले हुआ। सिर्फ तीन साल को छोड़कर बाकी समय रमन राज के रहे हैं। सवाल है, क्या यह प्रदेश बुनियादी सुविधाओं और समृद्धि में मजबूत खड़ा हो पाया? तमाम दावे-प्रतिदावों के बीच विकास को लेकर बहुत सारे सवाल जनता के दिलो-दिमाग में हैं।
मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह अपनी सरकार के 13 साल की उपलब्धि के जादुई आंकड़े को बुधवार को छुएंगे तो उनके लिए यह अवसर गर्व करने के साथ ही आत्मावलोकन का भी होगा। गर्व इसलिए कि भाजपा में मुख्यमंत्री के रूप में सर्वाधिक लंबी पारी का रिकॉर्ड उनके नाम दर्ज हो रहा है। आत्मावलोकन यह जरूरी है कि इस अवधि में विकास के पैमाने पर जन अपेक्षाएं कितनी पूरी हुईं।
छत्तीसगढ़ का उदय 16 साल पहले हुआ। सिर्फ तीन साल को छोड़कर बाकी समय रमन राज के रहे हैं। सवाल है, क्या यह प्रदेश बुनियादी सुविधाओं और समृद्धि में मजबूत खड़ा हो पाया? तमाम दावे-प्रतिदावों के बीच विकास को लेकर बहुत सारे सवाल जनता के दिलो-दिमाग में हैं। समकालीन बने झारखंड और उत्तराखंड की अपेक्षा छत्तीसगढ़ में विकास की रफ्तार संतोषजनक रही है। हमने सरप्लस एनर्जी, कोर सेक्टर में भरपूर निवेश, सड़क नेटवर्क विस्तार और शहरी सुविधाओं को लेकर ठीक-ठीक तरक्की की। लेकिन, विकास की इस धारा में गांवों और शहरों के मध्य असमानता की खाई गहरी हो रही है।
शिक्षा, स्वास्थ्य और स्वच्छ पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाएं ज्यादातर गांवों में अब भी सपने जैसी हैं। उपचार के लिए चारपाई पर लाद कर मरीजों को ले जाने, झोपड़ी या कामचलाऊ भवनों में चलते स्कूल और तालाब या झिरिया से प्यास बुझाते आदिवासियों के हालात गाहे-बगाहे सभी को विचलित करते हैं। बेटियों की मानव तस्करी, यौन उत्पीडऩ, टोनही-टोटके जैसा अंधविश्वास और रोजगार के लिए बढ़ता पलायन प्रदेश के लिए बड़ी चुनौती है।
ब्रेनड्रेन को रोकने की ठोस योजना का भी अभाव है। माओवाद समस्या के स्थायी समाधान को लेकर प्रदेश स्तर पर कोई ठोस रास्ता नहीं दिखता। राज्य के गठन के बाद से इसके हल के लिए हम केंद्र सरकार पर निर्भर हैं। सिर्फ सुरक्षा बलों की तैनाती कर माओवाद से छुटकारा नहीं पा सकते।
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में शांतिवार्ता का तरीका सुझाया है, लेकिन इस दिशा में कोई पहल नहीं हो पा रही है। इसके लिए राज्य सरकार को खुद की नीति बनानी होगी। छत्तीसगढ़ के समग्र विकास के लिए सभी क्षेत्रों में ऐसा दृष्टिकोण अपनाना जरूरी है, जिसमें 'सबका साथ सबका विकास' नारा सार्थक होकर जमीन पर दिख सके।