World Fathers Day 2021: ये कहानी उस पिता की है जिसने अपने बेटे को दोबारा जिंदगी दी। किडनी तो दान की ही, जीवनभर की पूंजी तक लुटा दी। सैकड़ों रातें जागकर काटी वो अलग।
रायपुर/ताबीर हुसैन. ये कहानी उस पिता की है जिसने अपने बेटे को दोबारा जिंदगी दी। किडनी तो दान की ही, जीवनभर की पूंजी तक लुटा दी। सैकड़ों रातें जागकर काटी वो अलग। छत्तीसगढ़ के बालोद जिले के ग्राम भरदा के झाड़ूराम देवांगन अब खेतों में मजदूरी करते हैं। बेटे की बीमारी में खुद की जमीन तो बिक गई। लेकिन उनके चेहरे में सुकून भरी मुस्कान तैरती है। वे कहते हैं, इंसान की असली पूंजी तो उसकी औलाद होती है। मेरा जितेंद अब ठीक हो गया है यही मेरी दौलत है।
झाड़ूराम ने जब बेटे की बीमारी के दिनों को साझा किया तो उनका गला रुंध गया। वे बोलते हुए फफक पड़े। कहा, ईश्वर किसी भी मॉ-बाप को ऐसा दिन न दिखाए। जब हमको जितेंद्र की बीमारी का पता चला तो इस हॉस्पिटल से उस हॉस्पिटल भटकते रहते थे। कहीं भी सही इलाज नहीं हो पा रहा था। हमको तो कुछ भी जानकारी नहीं थी। नातेदारों की सलाह पर बस अस्पताल बदलते रहते थे। रायपुर के निजी हॉस्पिटल में भी इलाज कराया लेकिन सुधार होता नहीं दिखा।
गुजरात में किया किडनी ट्रांसप्लांट
लगातार डायलिसिस से जब कुछ खास फायदा नहीं मिला तो कहीं से पता चला कि गुजरात में ट्रांसप्लांट होता है। वहां गए। कुछ महीने वहीं रहे। किडनी डोनेट करने के बाद मेरा एक्सीडेंट हो गया। जिसमें एक हाथ टूट गया था। ऐसा लग रहा था मानो ईश्वर हमारा ही इम्तेहान ले रहा हो। क्योंकि किडनी ट्रांसप्लांट के बाद बेटे के दोनों पैरों का हिप ज्वाइंट खराब हो गया। उसका भी इलाज कराया।
कृतज्ञता के लिए मेरे पास शब्द नहीं
रायपुर की सामाजिक संस्था जीवनदीप में कार्यरत जितेंद्र ने बताया, बीमारी की वजह से सालभर जितना परेशान मैं था उससे कई गुना दुख तो पिता को था। वे दिल पर पत्थर रखकर जीते रहे। पहले खुद के खेत में दूसरों को रोजगार देते थे अब स्वंम गैरों के यहां मजदूरी कर रहे। अभी भी मेरी दवाइयों पर हर महीने 8 हजार रुपए खर्च आ रहा है। पिता ने मेरे लिए जो किया, कृतज्ञता लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं।