
राजसमंद. एक तरफ जहां आज का युवा भारी-भरकम सैलरी पैकेज, महानगरों का सुरक्षित करियर और कॉरपोरेट जिंदगी की सहूलियतों के सपने देखता है, वहीं कांकरोली (राजसमंद) के आकाश हींगड़ ने एक अलग और साहसिक राह चुनी। मुंबई में एचडीएफसी बैंक के सीनियर मैनेजर पद पर करीब 25 लाख रुपए सालाना पैकेज की नौकरी को अलविदा कहकर उन्होंने मिट्टी की सोंधी महक और कृषि क्षेत्र में नवाचार को अपना करियर बनाया। आज उन्होंने कुरज में 32 एकड़ जमीन पर 'मधुवन ऑर्गेनिक फार्म' के रूप में जैविक और आधुनिक खेती का एक मिसाल कायम करने वाला मॉडल खड़ा कर दिया है।
आकाश का परिवार मूलतः मार्बल व्यवसाय से जुड़ा रहा है। उनके पिता अशोक हींगड़ ने उन्हें मुंबई से 'ग्रामीण विकास' विषय में एमबीए की शिक्षा दिलाई। पढ़ाई के बाद उन्होंने बैंकिंग क्षेत्र में सफल करियर बनाया, लेकिन मन में कृषि क्षेत्र में कुछ अलग और प्रभावकारी करने की इच्छा लगातार बनी रही। कृषि का पूर्व अनुभव न होने के बावजूद पिता-पुत्र की जोड़ी ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने कृषि एवं उद्यान विभाग से संपर्क किया और विभाग के उपनिदेशक ख्याली लाल खटीक के दिशा-निर्देशों में वैज्ञानिक व व्यवस्थित खेती का खाका तैयार किया।
32 एकड़ में फैले 'मधुवन ऑर्गेनिक फार्म' में आधुनिक तकनीकों का बेजोड़ संगम देखने को मिलता है। जल प्रबंधन व सिंचाई: उद्यान विभाग के मार्गदर्शन में बूंद-बूंद (ड्रिप) सिंचाई, फार्म पॉन्ड (खेत तलाई) और सौर ऊर्जा चालित पंपों का इस्तेमाल कर पानी की एक-एक बूंद का बेहतर उपयोग किया जा रहा है। 1100 फलदार पौधों का बगीचा: फार्म में अंजीर, आंवला, अमरूद, मौसंबी और पपीता जैसे 1100 से अधिक फलदार पौधे लगाए गए हैं। साथ ही तरबूज और खरबूजे की खेती भी की जा रही है। सब्जियों और खाद्यान्न का उत्पादन: भिंडी, तोरई, लौकी, टमाटर, पालक, मेथी, गाजर, मूली, चुकंदर, पत्तागोभी, फूलगोभी, मटर, धनिया और बैंगन जैसी तमाम सब्जियों के साथ-साथ गेहूं, मक्का, चना, मूंग और उड़द जैसी फसलों का बड़े पैमाने पर उत्पादन हो रहा है। पॉलीहाउस, नेट हाउस व लो-टनल तकनीक: आधुनिकता को अपनाते हुए पॉलीहाउस और नेट हाउस में प्लास्टिक मल्चिंग के साथ खीरे उगाए जा रहे हैं। शीत लहर से फसलों को बचाने के लिए लो-टनल तकनीक अपनाई जाती है। खुद की नर्सरी मेंपौध रोपाई के लिए कोकोपीट आधारित अपनी नर्सरी तैयार की गई है, जहाँ मजबूत पौधे तैयार कर खेतों में रोपे जाते हैं।
अशोक हींगड़ बताते हैं कि फार्म पर रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का प्रयोग पूरी तरह वर्जित है। इसके स्थान पर गोबर, गोमूत्र, हरी खाद, वर्मी कंपोस्ट, जीवामृत और पत्तियों के जैविक घोल का उपयोग मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ाता है। कीट नियंत्रण के लिए नीम के तेल जैसे प्राकृतिक उपाय अपनाए जाते हैं। नियमित रूप से मिट्टी और पानी की वैज्ञानिक जाँच कराई जाती है तथा ट्रैक्टर व आधुनिक कृषि यंत्रों का उपयोग होता है।
खेत में पैदा होने वाले जैविक उत्पाद और अनाज आज जयपुर, जोधपुर, भीलवाड़ा, उदयपुर और अहमदाबाद जैसे बड़े शहरों के बाजारों तक पहुंच रहे हैं। इस सफलता में कृषि व उद्यान विभाग की अनुदान योजनाओं का भी सहयोग मिला है। आकाश हींगड़ की इस पहल ने न केवल व्यापारिक सफलता पाई है, बल्कि स्थानीय स्तर पर 15 से 20 कर्मचारियों को प्रत्यक्ष रोजगार प्रदान किया है। पौध तैयार करने से लेकर सिंचाई, देखरेख और मार्केटिंग तक में स्थानीय श्रमिकों की भागीदारी से उनके परिवारों की आजीविका चल रही है।
आकाश हींगड़ अब इस मॉडल को केवल खेती तक सीमित न रखकर कृषि आधारित उद्योग के रूप में विकसित कर रहे हैं। आने वाले समय में यहां मधुमक्खी पालन, थारपारकर नस्ल की देशी गायों का संवर्धन व प्रजनन, कोल्ड स्टोरेज व सोलर टनल व्यवस्था, वैक्यूम पैकिंग एवं फूड प्रोसेसिंग (खाद्य प्रसंस्करण) यूनिट स्थापित करने की योजना है, जिससे फसलों का बेहतर मूल्य संवर्धन हो सके और स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा हों।