
अध्यात्म विज्ञान और ब्रह्म विद्या की दो धाराएं हैं। एक साधना, दूसरी उपासना, साधना का तात्पर्य है अपना चिन्तन उत्कृष्टता के और कर्तृत्व आदर्शवादिता के ढांचे में ढालना । अनगढ़ जीवन को सुगढ़ बनाना। बैल, घोड़ा, रीछ, बानर, सर्प, सिंह जैसे पशुओं को सधा लेने से वे कितने उपयोगी सिद्ध होते हैं और पालने वालों का कितना हित साधन करते हैं यह स्पष्ट देखा जाता है। कुम्हार साधारण मिट्टी से कितने सुन्दर खिलौने बना देता है। मूर्तिकार पत्थर से देव प्रतिमा गढ़ता है। चित्रकार अपनी कला से सामान्य कागज को हृदय स्पर्शी चित्र का रूप देता है। मस्तिष्क की साधना करके विद्वान, श्रम की साधना करके धनवान बनते रोज ही देखा जाता है। मनुष्य की हाड़−मांस से बनी काया जीवन साधना के सहारे महामानव, मनीषी ऋषि, देवता एवं परमात्मा के रूप में विकसित हुई देखी जा सकती है।
उपासना आत्मचेतना की प्रस्तुत क्षमताओं को उभारने का वैज्ञानिक प्रयोग है। रसायन शास्त्री विषैले पारे को अमृतोपम मकरध्वज बना देते हैं। वैज्ञानिक सामान्य रेत से प्रचण्ड अणुशक्ति का उद्भव करते हैं। इसी प्रकार साधना से व्यक्तित्व का असाधारण विकास होता है। फलतः उसमें अनेकानेक सफलताएं खींच बुलाने की सामर्थ्य उत्पन्न हो जाती है।
साधना के दो चरण हैं एक ‘योग‘ दूसरा ‘तप’
योग का अर्थ है अपने को लिप्सा और लालसा के भव−बन्धनों से मुक्त करके आदर्शवादिता के प्रति आत्म समर्पण । ईश्वर को आत्मसमर्पण करना उसी प्रकार होता है जैसा कि नदी अपने आप को समुद्र में मिला देती हैं। अपनी भौतिक महत्वाकांक्षाओं को लालसा और लिप्साओं को पैरों तले रौंदकर ईश्वरीय संकेतों और आदर्शों का अनुसरण करने का साहस जुटाते हैं। योगी की यही मनःस्थिति होती है।
तप का अर्थ है तपाना- उत्कृष्टता एवं आदर्शवादिता अपनाने में जो कष्ट उठाने पड़ते हैं उन्हें साहस एवं प्रसन्नता के साथ आमन्त्रित एवं शिरोधार्य करना। ‘चरित्र निष्ठा’ की कसौटी और ‘समाज निष्ठा’ की अंगीठी पर हम अपने आपको तपाकर प्रामाणिकता सिद्ध करने वाले ‘तपस्वी’ ही ईश्वर के साथ अपने आपको जोड़ पाते हैं। भक्त के लिए उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व के रूप में ईश्वरीय आदेशों के अनुरूप अपने दृष्टिकोण एवं क्रिया-कलाप को ढालने का साहस जुटाना पड़ता है। इस साहसिकता को व्यवहार में उतारना ही तप साधन है।
चिन्तन की उत्कृष्टता प्राप्त करने के लिए विविध प्रयासों को योग कहते हैं और कर्म को आदर्श बनाने का नाम ही तप है। इसके लिए तप तितीक्षा अथवा भजन पूजन के क्रिया-कलाप जो भी अपनायें जाएं उनका मूल संकेत आत्म परिष्कार ही रहता है। इस दिशा में जितनी प्रगति होती है उसी अनुपात से ईश्वरीय अनुग्रह स्वार्थ मुक्ति एवं सिद्धि चमत्कार जैसी अनेकानेक भौतिक एवं आत्मिक उपलब्धियाँ मिलती चली जाती हैं।