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पिंडदान और काल सर्प दोष निवारण पूजा के लिए मशहूर त्रिशूल भेद और मार्कण्डेय धाम की क्या है कहानी, जानिए

Ashadha Amavasya 2026- आषाढ़ अमावस्या पर मध्य प्रदेश के में हजारों श्रद्धालु पितृ तर्पण, पिंडदान और कालसर्प दोष निवारण के लिए पहुंचेंगे। धार्मिक मान्यता कहती है कि यहां किया गया पिंडदान गया से भी कई गुना अधिक पुण्यफल देता है। जानिए पूरी कथा।
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भारत

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Akash Dewani

Jul 11, 2026

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Ashadha Amavasya 2026- पुपिंडदान और काल सर्प दोष निवारण पूजा के लिए मशहूर त्रिशूल भेद और मार्कण्डेय धाम (फोटो सोर्स- Chatgpt)

Ashadha Amavasya 2026- मध्य प्रदेश के जबलपुर में आध्यात्मिक महत्व से परिपूर्ण लम्हेटाघाट स्थित त्रिशूल भेद मंदिर (Trishul bhed Temple) तथा तिलवाराघाट के समीप स्थित मार्कण्डेय धाम (Markandeya Dham) इन दिनों श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बने हुए है। आगामी 14 जुलाई को आषाढ़ कृष्ण अमावस्या पर दोनों तीर्थस्थलों पर पितृ तर्पण, पिंडदान, कालसर्प दोष निवारण और विशेष धार्मिक अनुष्ठानों के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं का तांता लगेगा।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, त्रिशूलभेद तीर्थ को पितृ तर्पण के लिए बिहार के गया जी से भी अधिक पवित्र माना गया है। स्कंद पुराण के उल्लेखों के मुताबिक अयोध्या के राजा मनु राजा हिरण्यतेजा और राजा पुरूरवा ने भी त्रिपुरी तीर्थ (त्रिशूल भेद) में अपने पितरों का तर्पण किया था।

ऐसे पड़ा त्रिशूलभेद नाम

आचार्य शुक्ला ने शिवपुराण के हवाले से बताया कि पौराणिक काल में अंधकासुर नामक राक्षस ने कठोर तपस्या कर भगवान शिव से अमरता का वरदान प्राप्त कर लिया था। इसके बाद उसके अत्याचार बढ़ने लगे। भगवान शिव ने अंधकासुर के वध का दायित्व अपने त्रिशूल को सौंपा। युद्ध के बाद त्रिशूल की दिव्य शक्तियां कीण हो हो गई, जिन्हें पुनः प्राप्त करने के लिए भगवान शिव ने उसे नर्मदा के पावन जल में धोया। जिससे त्रिशूल की शक्तियां वापस लौट आई। इसी घटना के बाद इस पवित्र स्थल का नाम त्रिशूलभेद पड़ा।

काल को भी हटना पड़ा पीछे

नर्मदा के बक्षिण तट पर तिलवाराघाट स्थित मार्कण्डेय धाम को कालसर्प दोष निवारण के लिए प्रभावी तीर्थ माना जाता है। गौरीघाट के पुजारी अभिषेक मिश्रा के अनुसार ऋषि मार्कण्डेय की आयु 12 वर्ष निर्धारित थी। जब यमराज उनके प्राण लेने पहुंचे तब बालक मार्कण्डेय शिवलिंग से लिपट गए। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने यमराज को वापस लौटा दिया और मार्कण्डेय ऋषि को चिरायु होने का वरचान दिया। इसके बाव उन्होंने इसी तट पर वर्षों तक तपस्या की थी।

14 को लगेगा मेला

ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, इस बार आषाढ़ अमावस्या तिथि की शुरुजात 13 जुलाई की शाम 6:49 बजे से हो जाएगी जो अगले विनयोपहर 3:12 बजे तक रहेगी। उदयातिथि की मान्यता के अनुसार आषाढ अमावस्या 14 जुलाई को मनाई जाएगी।

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