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भगवान शिव को क्यों बनना पड़ा था ‘अर्धनारीश्वर’? माता पार्वती ने दिया था बड़े ऋषि को श्राप, जानें क्या कहती है कथा

Ardhanarishvara Story- भगवान शिव का अर्धनारीश्वर स्वरूप केवल एक दिव्य रूप नहीं, बल्कि शिव और शक्ति की अभिन्नता का प्रतीक है। जानिए ऋषि भृंगी की जिद, माता पार्वती के श्राप और इस अद्भुत कथा का रहस्य।
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भारत

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Akash Dewani

Jul 09, 2026

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Ardhanarishvara Story- जानिए किस ऋषि के कारण भगवान शिव को धारण करना पड़ा था अर्धनारीश्वर रूप? (फोटो सोर्स- Chatgpt)

Why Shiva Became ArdhanarishvaraStory- देवों के देव महादेव के वैसे तो अनेक रूप है लेकिन उनका एक रूप जो सबसे अलग माना गया है वो है अर्धनारीश्वर का रूप। इस रूप के बारे में बताया जाता है कि यह भगवान शिव और माता पार्वती का एक संयुक्त पौराणिक स्वरूप है, जो ब्रह्मांड में पुरुष (शिव) और स्त्री (शक्ति) के संतुलन, समानता और अटूट मिलन का प्रतीक है। यहीं से प्रश्न उठता है कि भगवान शिव ने 'अर्धनारीश्वर' का रूप क्यों लिया था? क्या इसके पीछे कोई रोचक कथा है? तो इसका उत्तर है हां। शैव परंपरा में प्रचलित एक कथा के अनुसार भगवान शिव ने अर्धनारीश्वर रूप धारण किया था। अर्धनारीश्वर तत्त्व का वर्णन शिवपुराण और लिंग पुराण में मिलता है। चलिए बताते हैं क्या है वो कथा।

ऋषि भृंगी ने भगवान शिव की परिक्रमा की जताई इच्छा

शैव परंपरा की एक कथा के अनुसार, ऋषि भृंगी भगवान शिव के परम भक्त माने जाते थे लेकिन वह किसी कारण माता पार्वती की पूजा नहीं करते थे। ऐसा इसलिए क्योंकि वे पार्वती को शिव से अलग समझते थे। एक बार की बात है कि ऋषि भृंगी भगवान शिव की परिक्रमा करने के लिए कैलाश पर्वत पहुंचे लेकिन वो माता पार्वती की परिक्रमा नहीं करना चाहते थे। जब ऋषि भृंगी ध्यानमग्न भगवान शिव के पास पहुंचे तो उनके बगल में माता पार्वती बैठी हुई थीं। ऋषि भृंगी ने उनकी परिक्रमा करने से मना कर दिया और केवल शिव की परिक्रमा करने का हठ किया।

माता पार्वती के समझाने पर भी नहीं माने ऋषि, सांप का रूप किया धारण

ऋषि का हठ देख माता पार्वती दुखी हो गई। पार्वती ने सोचा कि यह कैसा शिवभक्त है जो 'शिव' और 'शिवा' को अलग समझता है। ब्रह्मांड के कण-कण में शिव और पार्वती सदैव साथ हैं। पार्वती ने फिर ऋषि भृंगी को समझाते हुए कहा कि-हे ऋषि! संपूर्ण सृष्टि में और प्रत्येक युग एवं काल में हम दोनों एक ही हैं। आप हमें अलग समझने की भूल न करें। लेकिन ऋषि भृंगी ने माता पार्वती की बात को अनसुना कर दिया और शिव की परिक्रमा करने के लिए आगे बढ़े। यह देख माता पार्वती भगवान शिव से सटकर बैठ गई। भृंगी पार्वती की परिक्रमा नहीं करना चाहते थे, इसलिए उन्होंने सर्प का रूप धर कर, दोनों के मध्य में से होते हुए, अकेले शिव की परिक्रमा करनी चाही। भृंगी के ऐसा करने से भगवान शिव का ध्यान भंग हो गया।

भगवान शिव ने लिया अर्धनारीश्वर रूप

ध्यान भंग होने से भगवान शिव क्रोधित हो उठे और ऋषि भृंगी को समझाने के लिए उन्होंने तत्काल अर्धनारीश्वर स्वरुप धारण कर लिया। माता पार्वती एकाएक उनमें विलीन हो गई। भगवान शिव के दाहिने भाग में पुरुष रूप और बाएं भाग में स्त्री रूप दिखने लगा। यह देख ऋषि भृंगी स्तब्ध रह गए लेकिन अपना हठ उन्होंने अभी भी नहीं छोड़ा। ऋषि ने दोनों को अलग करने के लिए चूहे का रूप लिया और दोनों को बीच से कुतरकर अलग करने की कोशिश करने लगे। किन्तु वह अपनी इस योजना में असफल रहे।

माता पार्वती ने ऋषि को दिया श्राप

यह देख माता पार्वती क्रोधित हो उठी और उन्होंने ऋषि भृंगी को श्राप दे दिया। पार्वती ने भृंगी को श्राप दिया कि 'जो शरीर तुम्हें अपनी मां से मिला है, वह तुरंत तुम्हारा साथ छोड़ देगा।' श्राप का प्रभाव तुरंत ऋषि भृंगी पर दिखने लगा। ऋषि के शरीर से खून और मांस गिर गया। भृंगी निढाल होकर जमीन पर गिर पड़े, तब उन्हें अपनी भूल का ज्ञात हुआ और उन्होंने मां पार्वती से क्षमा मांगी।

ऋषि भृंगी को दिया तीसरा पैर

ऋषि द्वारा क्षमा मांगने के बाद माता पार्वती ने अपने श्राप को वापस लेना चाहा लेकिन उन्होंने श्राप वापस लेने से मना कर दिया। ऋषि ने कहा कि मुझे इसी स्वरुप में रहने दीजिए ताकि एक उदाहरण स्थापित हो कि मेरी तरह फिर कभी कोई भ्रम का शिकार होकर माता और पिता को एक दूसरे से अलग समझने की भूल न करेगा।यह सुनकर भगवान शिव और माता पार्वती प्रसन्न हो गए और ऋषि भृंगी को अपने गणों में प्रमुख स्थान दिया। उन्होंने भृंगी को चलने-फिरने में समर्थ करने के लिए तीसरा पैर भी दिया।