
Shankhachud Vadh Katha: तुलसी और शंखचूड़ की कहानी (फोटो सोर्स : AI@chatgpt)
Shiv Puja Mein Shankh Kyon Nahi Bajate: सनातन धर्म में देव आराधना के दौरान शंख बजाना और उससे जलाभिषेक करना बेहद शुभ और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करने वाला माना जाता है। लेकिन जब बात देवाधिदेव महादेव यानी भगवान शिव की आती है, तो नियम पूरी तरह बदल जाते हैं। शिव महापुराण के अनुसार, भोलेनाथ की पूजा में शंख (Shankh in Shiv Puja) का इस्तेमाल करना वर्जित किया गया है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, द्वापर युग के महाबलशाली असुर राज शंखचूड़ (Shankhchud Katha) का जन्म भगवान श्री कृष्ण के पार्षद सुदामा के अंश से हुआ था। शंखचूड़ ने ब्रह्मा जी की घोर तपस्या करके उनसे एक अजेय होने का वरदान प्राप्त कर लिया था। ब्रह्मा जी ने उसे वरदान के साथ-साथ विष्णु कवच भी दिया और कहा कि जब तक तुम्हारी पत्नी तुलसी (Tulsi and Shankhachud story) का सतीत्व अक्षुण्ण रहेगा, तब तक ब्रह्मांड की कोई भी शक्ति तुम्हें पराजित नहीं कर पाएगी।
वरदान के नशे में चूर होकर शंखचूड़ ने तीनों लोकों पर अपना आतंक मचा दिया और देवताओं को स्वर्ग से बेदखल कर दिया। त्रस्त होकर सभी देवता भगवान विष्णु और ब्रह्मा जी को साथ लेकर भगवान शिव की शरण में पहुंचे। इसके बाद रणभूमि में भगवान शिव और शंखचूड़ के बीच भीषण युद्ध छिड़ गया।
मान्यता है कि शंखचूड़ को हराना तब तक असंभव था जब तक उसका कवच और उसकी पत्नी का सतीत्व सुरक्षित था। ऐसे में युद्ध के दौरान भगवान विष्णु ने ब्राह्मण का रूप धरकर शंखचूड़ से उसका विष्णु कवच दान में मांग लिया। इसके बाद विष्णु जी ने शंखचूड़ का रूप धारण कर उसकी पत्नी तुलसी के पातिव्रत्य धर्म को खंडित कर दिया। जैसे ही तुलसी का सतीत्व भंग हुआ, शंखचूड़ की शक्तियां समाप्त हो गईं और भगवान शिव ने अपने दिव्य त्रिशूल से उसका वध कर दिया।
शिवजी के त्रिशूल से भस्म होने के बाद शंखचूड़ की अस्त्र-हड्डियां और राख समुद्र में गिर गईं, जिससे शंख की उत्पत्ति हुई। चूंकि शंखचूड़ भगवान विष्णु का परम भक्त था, इसलिए विष्णु जी ने उसे आशीर्वाद दिया कि शंख हमेशा पवित्र रहेगा और लक्ष्मी-विष्णु की पूजा उसके बिना अधूरी होगी। लेकिन, चूंकि उसका वध स्वयं महादेव ने किया था, इसलिए शिव पूजा में शंख का पूरी तरह निषेध कर दिया गया। शंख को उस असुर का प्रतीक माना जाता है, जिसका अंत शिव के हाथों हुआ था।
ऐसा नहीं है कि शंख का महत्व कम है। हिंदू धर्म और आधुनिक विज्ञान दोनों में इसके अपने अलग-अलग तर्क हैं:
शास्त्रों के अनुसार, शंख में माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु का वास होता है। शिवलिंग पर जल चढ़ाने का अर्थ है शिव और शक्ति का मिलन। चूंकि शंख वैष्णव परंपरा का प्रतीक है, इसलिए शैव (शिव भक्त) और वैष्णव परंपराओं के संतुलन को बनाए रखने के लिए भी इसे शिव पूजा से दूर रखा जाता है।
कुछ शोधों और पारंपरिक मान्यताओं में माना जाता है कि शंख ध्वनि वातावरण को सकारात्मक बना सकती है। शिव पूजा में ध्यान, मौन, नाद और जलधारा (शांति) का महत्व है, जबकि शंख की तीक्ष्ण ध्वनि एकाग्रता को भंग कर सकती है।
भारत के कुछ हिस्सों और विशेषकर कुछ तांत्रिक साधनाओं में नियमों में भिन्नता देखी जाती है। लेकिन सामान्य जनमानस और वैदिक पूजा पद्धति में शिवलिंग पर शंख से जल चढ़ाना पूरी तरह वर्जित और दोषपूर्ण माना गया है।
Published on:
09 Jun 2026 03:05 pm
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