
Shivling hidden underground: यूपी का ऐसा मंदिर जहां 15 फीट ऊपर दिखता है शिवलिंग, 64 फीट जमीन के नीचे है हिस्सा (फोटो सोर्स- Patrika)
Sawan 2026:सावन और चातुर्मास के पावन अवसर पर शिवभक्त देशभर के प्रसिद्ध मंदिरों में दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं। उत्तर प्रदेश में एक ऐसा अनोखा शिव मंदिर है जो हजारों श्रद्धालुओं की आस्था का अनोखा केंद्र है। यहां मौजूद एशिया का सबसे बड़ा शिवलिंग जमीन के ऊपर 15 फीट और नीचे 64 फीट तक फैला है, जिसकी महिमा सावन में और भी खास मानी जाती है। आइए जानते है कौनसा है ये मंदिर और क्या है इसकी विशेषताएं?
उत्तर प्रदेश के गोंडा में स्थित पृथ्वीनाथ मंदिर (Prithvinath Temple) श्रद्धालुओं के बीच आस्था का बड़ा केंद्र है। यहां एशिया का सबसे बड़ा शिवलिंग है। गोंडा स्थित एशिया के इस सबसे बड़े शिवलिंग की खास बात ये है कि ये 15 फुट ऊपर दिखता है और 64 फुट जमीन के नीचे है। इसलिए ये एशिया का सबसे बड़ा शिवलिंग माना जाता है। पुरातत्व विभाग के अनुसार, यह शिवलिंग लगभग 5 हजार वर्ष पुराना है। जो कि महाभारत काल का है।
एशिया का सबसे बड़ा शिवलिंग होने के साथ-साथ यह शिव मंदिर वास्तुकला का भी सर्वोत्तम नमूना है। गोंडा के इस शिव मंदिर को पृथ्वीनाथ मंदिर के नाम से जाना जाता है। माना जाता है कि गोंडा के पृथ्वीनाथ मंदिर के इस शिवलिंग की स्थापना पांडुपुत्र भीस ने की थी। माना जाता है कि द्वापर युग में पांडवों के अज्ञातवास के दौरान भीम ने इस शिवलिंग की स्थापना की थी।
मान्यता है कि इस शिवलिंग के दर्शन मात्र से ही सारे कष्ट दूर हो जाते हैं। महाभारत के अनुसार अज्ञातवास के दौरान जब भीम ने बकासुर का वध किया था, तो भीम पर ब्रह्महत्या का दोष लगा। तब भीम ने इस दोष से मुक्ति पाने के लिए शिवलिंग की स्थापना की थी। ये सात खखंडों का शिवलिंग है, जो 15 फुट ऊपर दिखता है और 64 फुट जमीन के नीचे है। साथ ही यह मंदिर 5 हजार साल पुराना है। बताया जाता है कि भीम द्वारा स्थापित यह शिवलिंग धीरे-धीरे जमीन में समा गया।
एक बार खरगूपुर के राजा मानसिंह की अनुमति से पृथ्वीनाथ सिंह नाम के एक शख्स ने मकान निर्माण के लिए यहां पर खुदाई शुरू की, तो पृथ्वीनाथ सिंह को सपना आया कि उस जमीन के नीचे सात खंडों का एक शिवलिंग दबा हुआ है। तब उन्होंने वहां खुदाई की और शिवलिंग मिला। फिर इस शिवलिंग की पूजा-अर्चना शुरू हुई और तब से इस मंदिर का नाम पृथ्वीनाथ मंदिर पड़ गया। इस शिवलिंग पर जलाभिषेक करने का विशेष प्रावधान है। इसकी ऊंचाई अधिक होने के कारण एड़ी उठाकर ही जलाभिषेक किया जाता है।
जब-जब सृष्टि में उथल-पुथल होती है, तब-तब भोलेनाथ ही जगत का मार्गदर्शन करते हैं। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, चातुर्मास में जब भगवान विष्णु योगनिद्रा में जाते हैं, तब देवों के देव महादेव ही पूरी सृष्टि के संचालन की बागडोर संभालते हैं। त्रिमूर्ति (कह्मा, विष्णु, महेश) की अवधारणा में भगवान शिव को संहारक और पुनर्जन्म या परिवर्तन का देवता माना जाता है। उनके बिना सृष्टि का चक्र अधूरा है। शिव को 'भोलेनाथ' भी कहा जाता है, क्योंकि वे बहुत ही दयालु हैं और अपने भक्तों की भक्ति से बहुत जल्दी प्रसन्न होकर उनकी सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं। इन चार महीनों में सृष्टि की पूरी कमान भोलेनाथ के हाथों में होती है।
Updated on:
22 Jul 2026, 4:57 PM IST
Published on:
22 Jul 2026, 4:57 PM IST
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