
Veerabhadra vs Vishnu war- जानें क्यों हुआ था वीरभद्र और भगवान विष्णु के बीच युद्ध (फोटो सोर्स- chatgpt)
Skanda Purana Story- शिवपुराण में उल्लिखित कथा के अनुसार, माता सती ने अपने पति भगवान शिव का अपमान होने के बाद यज्ञ कुंड में अपना देह त्याग दिया था। यह कथा सभी बचपन से सुनते हुए आ रहे हैं। कथा में बताया गया है कि माता सती के देह त्याग का कारण उनके पिता ब्रह्मपुत्र प्रजापति दक्ष थे जिन्होंने पहले महायज्ञ में भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया और बाद में माता सती के सामने ही उनके लिए अपशब्द कहकर उनका अपमान किया।
इसके बाद भगवान शिव के रौद्र अवतार वीरभद्र ने दक्ष का सिर धड़ से अलग कर वध कर दिया था। हालांकि, स्कंद पुराण के केदारखंड में इस बात का उल्लेख किया गया है कि दक्ष को समाप्त करने से पहले वीरभद्र और भगवान विष्णु के बीच ऐसा युद्ध (Veerabhadra vs Vishnu war) हुआ था, जो अगर नहीं रोका जाता तो ब्रह्मांड खत्म हो जाता। यह एक ऐसा युद्ध था जिसमें वीरभद्र ने भगवान विष्णु का सबसे शक्तिशाली अस्त्र 'सुदर्शन चक्र' को ही निगल लिया था। आइए जानते हैं कि आखिर क्यों हुआ था दोनों के बीच युद्ध?
कथा के अनुसार, माता सती ने अपने पिता दक्ष की इच्छा की विपरीत भगवान शिव से विवाह कर लिया था। इसके कुछ वर्षों बाद प्रजापति दक्ष ने कनखल (हरिद्वार) में महावैषणव यज्ञ का अनुष्ठान करवाया। इस यज्ञ में समस्त सृष्टि के बड़े ऋषि-मुनि समेत देवी-देवता भी आए थे। यज्ञ के अग्रदेवता भगवान विष्णु बने और ब्रह्मा इसके पुरोहित। इस महायज्ञ में दक्ष ने भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया था क्योंकि वह उनके घोर विरोधी थे।
पिता द्वारा अपने पति का अपमान होता देख माता सती क्रोधित हो उठी और भगवान शिव के लाख रोकने के बाद भी वह नहीं मानी और यज्ञस्थल पहुंच गई। माता सती ने जब अपने पिता से उनके पति को यज्ञ में आमंत्रित न करने का कारण पूछा तो उन्होंने भगवान शिव के लिए अपशब्द कहना शुरू कर दिया। इससे आहात और क्रोधित होकर माता सती ने यज्ञकुंड में देह-त्याग कर दिया। यह दृश्य देख सभी जगह हाहाकार मच गया। दक्ष की मृत्यु निश्चित देख यज्ञ में आए सभी ऋषि-मुनि और सभी देवता प्रस्थान करने लगे।
अपना अंत सामने देखकर भयभीत हुए दक्ष ने देवताओं से सहायता मांगी। इस पर इंद्रदेव सहित सभी देवता वही रुक गए। महर्षि भृगु ने दक्ष के संतोष के लिए उन्हें अस्त्र-शास्त्रों से सुसज्जित 1 करोड़ भीषण योद्धाओं की सेना भी दी। उधर जब भगवान शिव को माता सती के देह त्याग की जानकारी मिली तो वह क्रोधित हो उठे। उन्हें क्रोध में आकर अपनी एक जटा को तोड़कर भूमि पर पटक दिया जिससे तेज अग्नि की ज्वाला फूट पड़ी और उसमें से तीन नेत्रों और हजार भुजाओं वाले वीरभद्र की उत्पत्ति हुई। भगवान शिव ने वीरभद्र को दक्ष का वध करने का आदेश दिया। वीरभद्र पलक झपकते ही यज्ञस्थल पहुंच गए। वीरभद्र के तेज के सामने महर्षि भृगु की सेना टिक न सकी। अपना विनाश सामने देख दक्ष ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की।
अपने भक्त के प्राण को संकट में देख भगवान विष्णु गरुड़ पर बैठकर तीव्र गति से यज्ञस्थल दोबारा पहुंचे और अपने भयानक अस्त्रों से वीरभद्र पर प्रहार किया। इसके बाद दोनों के बीच भयंकर युद्ध की शुरुआत हो गई। भगवान विष्णु ने वीरभद्र पर सभी प्रकार के प्रहार किए किन्तु वह उसका कुछ नहीं बिगाड़ सके। वीरभद्र ने भी अपने पूरे बल से भगवान विष्णु पर प्रहार किया। विष्णु को गरुड़ पर बैठा देखा वीरभद्र ने यज्ञ की अग्नि से एक रथ प्रकट किया और उस पर बैठकर प्रहार करने लगे। दोनों के बीच इतना भीषण युद्ध देखकर ब्रह्मदेव को ज्ञात हो गया था कि अगर यह युद्ध नहीं रुका तो पूरे ब्रह्मांड का विनाश हो जाएगा। इसीलिए वे वीरभद्र के सारथि बन गए।
वीरभद्र ने युद्ध के दौरान भगवान विष्णु के गरुड़ पर इतना विनाशकारी वार किया कि उसकी गति कमजोर पड़ने लगी और उसके पंख भी झड़ गए। इतने ताकतवर प्रहार के उत्तर में भगवान विष्णु ने अपना सबसे शक्तिशाली अस्त्र 1000 आरों वाला 'सुदर्शन चक्र' वीरभद्र का वध करने के लिए चलाया, पर भगवान शिव के रौद्र रूप के सामने वह टिक नहीं सका। वीरभद्र ने सुदर्शन चक्र को निगल लिया। यह देख भगवान विष्णु भी आश्चर्यचकित रह गए।
युद्ध का अंत न होते और सृष्टि को विनाश की दिशा में जाता देख ब्रह्मदेव ने भगवान विष्णु से कहा कि वीरभद्र स्वयं महादेव के अंश हैं, जिन्होंने आपके हर एक के प्रहार को परास्त किया। यहां तक कि आपके सुदर्शन चक्र के प्रहार को भी निरस्त कर दिया। ब्रह्मा ने कहा कि यदि यह युद्ध ऐसे ही चलता रहा तो समूचे ब्रह्मांड का सर्वनाश हो जाएगा। ब्रह्मदेव की बात सुनकर भगवान विष्णु ने वीरभद्र के पराक्रम और शक्ति की प्रशंसा की और कहा कि दक्ष अपने कर्मों का फल भोगने का अधिकारी है। यह कहकर विष्णु युद्ध से हट गए और ब्रह्मा के साथ यज्ञस्थल से प्रस्थान कर गए। इसके बाद वीरभद्र ने दक्ष का सिर धड़ से अलग कर यज्ञकुंड में डाल दिया।
Updated on:
08 Jul 2026 04:50 pm
Published on:
08 Jul 2026 04:50 pm
