धर्म और अध्यात्म

Shardiya Navratri 2026 : हमारे अंदर के असुरों से युद्ध करती हैं देवियां, नवरात्रि का गहन विवेचन

Shardiya Navratri 2026 : शारदीय नवरात्रि : अष्ट मातृकाओं से षोडश मातृकाओं तक, भारतीय आध्यात्मिक चिंतन का अद्भुत मनोविज्ञान
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Oct 10, 2026
durgaji
माता दुर्गा - Image AI Grok

Shardiya Navratri 2026 : नवरात्रि आते ही लोग पंडालों के चक्कर लगाने गरबा के नए स्टेप्स की नेट पर तलाश करने और व्रत उपवास वाले आलू में कौन सा नमक डलेगा इस पर महीन शोध करने में जुट जाते हैं। लेकिन ज़रा रुकिए। क्या कभी आपने सोचा है कि हमारी पुराणों वाली देवियां जिन्हें हम अष्ट मातृकाएं और षोडश मातृकाएं कहते हैं वे असल में हमारी आज की भागदौड़ और तनाव भरी कॉर्पोरेट और घरेलू ज़िंदगी की कितनी बेहतरीन मैनेजर्स और संचालक हैं जो आपका नेतृत्व करती हैं। नवरात्रि का पावन पर्व केवल उपवास और कलश स्थापना का समय नहीं है। अगर हम अपने सांस्कृतिक और पौराणिक पन्नों को पलटें तो पाएंगे कि इन नौ दिनों के हर रीति रिवाज़ के पीछे एक बेहद गहरी विचारधारा और विज्ञान का सागर है।

अष्ट मातृकाएं आपके भीतर के डिफ़ॉल्ट बग्स (जन्मजात त्रुटियों) का महा एंटीवायरस (रक्षक तंत्र) हैं। ज़रा उन अष्ट मातृकाओं के नाम अपनी जुबान पर लाइए ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, इंद्राणी, चामुंडा और नरसिंही। ये किसी बाहरी आकाश में बैठी अमूर्त शक्तियां नहीं हैं बल्कि हमारे अंतर्मन के तमाम गड़बड़ इंटरनल वायरसों (आंतरिक विकारों) का खात्मा करने वाली अचूक कमांडो फोर्स हैं जो बिना दस्तक दिए दिमाग को हैंग कर देती हैं। जरा उस पल को याद करिए जब दफ्तर में कोई जूनियर अचानक आपसे आगे निकल जाए या सड़क पर कोई बेपरवाह ड्राइवर आपकी गाड़ी के आगे आ जाए। उस वक्त आपके भीतर जो लावे की तरह आवेश और अहम् का ज्वार उठता है वही असल असुर है। आज का आधुनिक न्यूरोसाइंस (तंत्रिका विज्ञान) और कॉग्निटिव साइकोलॉजी (संज्ञानात्मक मनोविज्ञान) यह स्पष्ट कर रहा है कि इंसान का लिम्बिक सिस्टम (भावना तंत्र) जब बेकाबू होता है तो पूरा शरीर फाइट ऑर फ्लाइट (लड़ो या भागो) के मोड में आकर हिचकोले खाने लगता है।

संकुचित अहंकार की शल्य चिकित्सा करके चेतना का विस्तार करती है ब्राह्मी

हमारे दूरदर्शी ऋषियों ने आंतरिक विकारों को साधने के लिए इन अष्ट मातृकाओं की अद्भुत संकल्पना गढ़ी। ब्राह्मी संकुचित अहंकार की शल्य चिकित्सा करके चेतना का विस्तार करती है तो माहेश्वरी अज्ञान को ओवरराइट (पुनर्लेखन) करके ज्ञान का आलोक भरती है। एकाग्र मन से इन ऊर्जाओं का आह्वान करने पर आपके ब्रेन वेव पैटर्न (मस्तिष्क तरंग स्वरूप) स्वतः अल्फा स्टेट (विश्राम अवस्था) में उतर जाते हैं। विज्ञान जिसे न्यूरो प्लास्टिसिटी (मस्तिष्क की अनुकूलन क्षमता) और माइंडफुलनेस (सचेतनता) समझाता है हमारे पुरखे उसी सत्य को कलश स्थापना के ज़रिए साध रहे थे। दिलचस्प बात यह है कि कार्ल जुंग का आर्केटाइप्स (आद्यरूप) सिद्धांत और तिब्बती बौद्ध धर्म की क्रोधित देवताओं की संकल्पना ठीक यही कहती है कि ये शक्तियां बाहरी चमत्कार नहीं बल्कि गहरे मनोवैज्ञानिक प्रोग्राम्स हैं। इसे अगर आप और गहराई से तलाशें तो सूफी रहस्यवाद में जिसे नफ्स अर्थात अहंकार को मारकर फना होना कहा गया है या प्राचीन ग्रीक फिलॉसफी (यूनानी दर्शन) में जिसे कैथार्सिस (भावनात्मक शुद्धि) का नाम दिया गया है वह हमारी अष्ट मातृकाओं की मारक ऊर्जा का ही वैश्विक रूप है।

हमारी बिखरी ऊर्जाओं को एक बिंदु पर सिंक (एकीकृत) कर देती हैं षोडश मातृकाएं

अब दृष्टि डालिए उन सोलह देवियों यानी षोडश मातृकाओं की तरफ़ जिनमें गौरी, पद्मा, शची, मेधा, स्वाहा, स्वधा, धृति, पुष्टि, तुष्टि, श्रद्धा और शांति जैसी जीवन पोषिणी शक्तियां विराजमान हैं। कल्पना कीजिए कि अगर आपकी मेधा ऑफिस की किसी अहम मीटिंग में छुट्टी पर चली जाए तो आप प्रेजेंटेशन के दौरान सिवाय माथा खुजाने के क्या करेंगे। यदि धृति का पारा गिर जाए तो ट्रैफिक में किसी की एक आवाज़ आपका ब्लड प्रेशर आसमान पर पहुँचा सकती है। शांति देवी तो आजकल इतनी दुर्लभ हो चुकी हैं कि किसी प्राचीन म्यूज़ियम में ही मिल जाएं तो गनीमत है। साइको इम्यूनोलॉजी (मनो प्रतिरक्षाविज्ञान) की ताज़ा वैज्ञानिक शोधें कहती हैं कि जब दिमाग में ग्रेटिट्यूड (कृतज्ञता) और उत्सव का भाव उठता है तो शरीर में ऑक्सीटोसिन (प्रेम हार्मोन) और डोपामाइन (आनंद हार्मोन) का ऐसा सैलाब उमड़ता है कि सारे अवसाद छूमंतर हो जाते हैं। ये षोडश मातृकाएं असल में होलिस्टिक वेलबीइंग (समग्र स्वास्थ्य) का वह सुरक्षा चक्र हैं जो हमारी बिखरी ऊर्जाओं को एक बिंदु पर सिंक (एकीकृत) कर देती हैं।

बाहरी अनुष्ठानों तक सीमित मत रहिए

इस बार जब आप घर में घटस्थापना करें और माता की अखंड ज्योति प्रज्वलित करें तो महज़ बाहरी अनुष्ठानों तक सीमित मत रहिएगा। नवरात्रि और कुछ नहीं बल्कि आपके अपने ही दिमाग का डी फ्रैग्मेंटेशन (पुनर्व्यवस्था) और सॉफ्टवेयर अपडेट है। यह नौ दिनों का अनुष्ठान आपको खुद से मिलने की एक मनोवैज्ञानिक मोहलत देता है। जब आपके भीतर की ऊर्जा इन देवियों के सात्विक स्वरूप से जुड़ जाएगी तो आप महसूस करेंगे कि परम शांति और आनंद की चाबी किसी मंदिर की दानपेटी में नहीं बल्कि आपके अपने ही अस्तित्व के बिल्कुल केंद्र में छुपी हुई है और आप स्वयं अपने ब्रह्मांड के सबसे शक्तिशाली रचयिता हैं।

(लेखक आराध्य जौहरी 'जेन जी' युवा हैं और इन दिनों अमेरिका के पेंसिलवेनिया में पढ़ाई कर रहे हैं।)

Updated on:
10 Oct 2026 04:40 pm
Published on:
10 Oct 2026 12:45 pm