
Shri Shiv Ashtottar Shatanama Stotram : श्री शिवाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् : श्री शिव अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्र भगवान शिव के 108 दिव्य नामों का अत्यंत पवित्र एवं प्रभावशाली स्तोत्र है। इस स्तोत्र में महादेव के विभिन्न स्वरूपों, गुणों, लीलाओं और उनकी करुणा का गूढ़ वर्णन किया गया है। प्रत्येक नाम शिव तत्व की किसी न किसी विशेष शक्ति और आध्यात्मिक रहस्य को प्रकट करता है।
इस स्तोत्र का नियमित श्रद्धापूर्वक जप करने से भक्त के जीवन से भय, रोग, पाप और मानसिक क्लेश दूर होते हैं। यह स्तोत्र भक्ति, ज्ञान और वैराग्य — तीनों का संगम है। वेदों और पुराणों में वर्णित इन नामों का स्मरण करने से शिव कृपा सहज रूप से प्राप्त होती है और अंततः साधक को मोक्ष मार्ग की प्राप्ति होती है।
यहां प्रस्तुत है श्री शिव अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्र (Shri Shiv Ashtottar Shatanama Stotram) का सरल, भावार्थयुक्त हिन्दी अर्थ, जिससे सामान्य पाठक भी इसके आध्यात्मिक भाव को आसानी से समझ सके।
श्लोक 1
शिव, महेश्वर, शम्भु, पिनाकी, शशिशेखर
जो कल्याणस्वरूप हैं, सबके स्वामी हैं, सुख देने वाले हैं, धनुष धारण करते हैं और जिनके मस्तक पर चंद्रमा विराजमान है।
वामदेव, विरूपाक्ष, कपर्दी, नीललोहित
जो सौम्य स्वरूप वाले हैं, तीन नेत्रों वाले हैं, जटाधारी हैं और नीले-लाल वर्ण वाले हैं।
श्लोक 2
शंकर, शूलपाणि, खट्वांगधारी, विष्णुप्रिय
जो मंगलकारी हैं, त्रिशूल धारण करते हैं, खट्वांग धारी हैं और विष्णु के प्रिय हैं।
शिपिविष्ट, अम्बिकानाथ, श्रीकण्ठ, भक्तवत्सल
जो सर्वव्यापी हैं, पार्वती के स्वामी हैं, नीले कंठ वाले हैं और भक्तों पर स्नेह करने वाले हैं।
श्लोक 3
भव, शर्व, त्रिलोकेश, शितिकण्ठ, शिवप्रिय
जो संसार के कारण हैं, संहारक हैं, तीनों लोकों के स्वामी हैं, श्वेत-कंठ वाले और शिवा (पार्वती) के प्रिय हैं।
उग्र, कपाली, कामारि, अंधकासुरसूदन
जो उग्र रूप वाले हैं, कपाल धारण करते हैं, कामदेव का नाश करने वाले और अंधकासुर का वध करने वाले हैं।
श्लोक 4
गंगाधर, ललाटाक्ष, कालकाल, कृपानिधि
जो गंगा को धारण करते हैं, जिनके मस्तक पर नेत्र है, जो काल के भी काल हैं और करुणा के सागर हैं।
भीम, परशुहस्त, मृगपाणि, जटाधर
जो भयानक रूप वाले, फरसा धारण करने वाले, हिरण पकड़े हुए और जटाधारी हैं।
श्लोक 5
कैलासवासी, कवचधारी, कठोर, त्रिपुरांतक
जो कैलास पर्वत पर निवास करते हैं, सुरक्षित कवचधारी हैं, दृढ़ हैं और त्रिपुर का नाश करने वाले हैं।
वृषांक, वृषभारूढ़, भस्मविभूषित
जिनका चिह्न वृषभ है, जो नंदी पर आरूढ़ हैं और भस्म से सुशोभित शरीर वाले हैं।
श्लोक 6
सामप्रिय, स्वरमय, त्रयीमूर्ति, अनीश्वर
जो सामवेद प्रिय हैं, स्वरस्वरूप हैं, तीनों वेदों के मूर्त रूप हैं और सबके स्वामी हैं।
सर्वज्ञ, परमात्मा, सोम-सूर्य-अग्नि-लोचन
जो सर्वज्ञ हैं, परम आत्मा हैं और जिनकी आँखें चंद्र, सूर्य और अग्नि हैं।
श्लोक 7
हविर्यज्ञमय, पंचवक्त्र, सदाशिव
जो यज्ञस्वरूप हैं, पाँच मुखों वाले और सदा कल्याणकारी हैं।
विश्वेश्वर, वीरभद्रजनक, गणनाथ, प्रजापति
जो विश्व के स्वामी हैं, वीरभद्र के जनक, गणों के अधिपति और सृष्टि के कर्ता हैं।
श्लोक 8
हिरण्यरेता, दुर्धर्ष, गिरीश, गिरिप्रिय
जिनका तेज स्वर्ण समान है, जो अजेय हैं, पर्वतों के स्वामी और पर्वतों के प्रिय हैं।
भुजंगभूषण, गर्भ, गिरिधन्वा
जो नागों को आभूषण की तरह धारण करते हैं, सृष्टि के बीज हैं और पर्वत जैसे धनुष वाले हैं।
श्लोक 9
कृत्तिवासा, पुराराति, प्रमथाधिप
जो व्याघ्रचर्म पहनते हैं, त्रिपुर के शत्रु और प्रमथ गणों के स्वामी हैं।
मृत्युंजय, सूक्ष्मतनु, जगद्व्यापी, जगद्गुरु
जो मृत्यु पर विजय पाने वाले हैं, सूक्ष्म स्वरूप वाले, सम्पूर्ण जगत में व्याप्त और संसार के गुरु हैं।
श्लोक 10
व्योमकेश, महासेनजनक, अरीविक्रम
जिनके केश आकाश समान हैं, कार्तिकेय के पिता और शत्रुओं का नाश करने वाले हैं।
रुद्र, भूतपति, स्थाणु, दिगम्बर
जो रुद्र हैं, भूतों के स्वामी, अचल और दिशाओं को वस्त्र मानने वाले हैं।
श्लोक 11
अष्टमूर्ति, अनेकात्मा, सात्त्विक, शुद्धस्वरूप
जो आठ रूपों वाले, अनेक स्वरूपों में प्रकट, सात्त्विक और शुद्ध हैं।
शाश्वत, खण्डपरशु, रजःपाशमोचक
जो नित्य हैं, फरसा धारण करते हैं और बंधनों से मुक्त करने वाले हैं।
श्लोक 12
मृड, पशुपति, देव, महादेव, अव्यय
जो दयालु हैं, जीवों के स्वामी, देवों के देव और अविनाशी हैं।
पूषदन्तभेदक, दक्षयज्ञनाशक
जिन्होंने पूषा के दाँत तोड़े और दक्ष के यज्ञ का नाश किया।
श्लोक 13
भगनेत्रभेदक, सहस्राक्ष, सहस्रपाद
जिन्होंने भगदेव की आँख फोड़ी, सहस्र नेत्र और सहस्र चरण वाले हैं।
मोक्षदाता, अनंत, तारक, परमेश्वर
जो मोक्ष देने वाले, अनंत, भवसागर से तारने वाले और परमेश्वर हैं।
।। इति श्रीशिवाष्टोत्तरशतनामस्त्रोतं सम्पूर्णम्।।
स्तोत्र का फल (अर्थ)
जो व्यक्ति इन दिव्य नामों का श्रद्धा और नियमपूर्वक जप करता है, उसकी सभी इच्छाएँ पूर्ण होती हैं पापों का नाश होता है मोक्ष की प्राप्ति होती है शिव कृपा सदा बनी रहती है