धर्म और अध्यात्म

स्पंदन: विच्छेद-9

पुरुष का पुरुष भाव स्त्री के पुरुष एवं स्त्री भाव से कैसा व्यवहार करता है। स्त्री का स्त्रैण भी पुरुष के पुरुष और स्त्रैण को कितना समझता है।
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Updated: 27 Mar 2018, 1:50 PM IST
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जीवन का सामंजस्य इस बात पर निर्भर करता है कि योषा-वृषा में समन्वय कैसा है? यह समन्वय इस बात पर निर्भर करेगा कि दोनों अपने-अपने स्वरूप से कितने परिचित हैं? अपने स्वभाव और स्वधर्म को कितना जानते हैं? दाम्पत्य के उद्देश्य को कितना समझते हैं? ब्रह्म और माया के अंश का कितना पोषण किया है? क्या स्त्री, पुरुष में आहूत होकर उसे सही समय पर निवृत्ति की ओर प्रवृत्त करने को कटिबद्ध है?

दाम्पत्य-प्रशिक्षण
पुरुष का पुरुष भाव स्त्री के पुरुष एवं स्त्री भाव से कैसा व्यवहार करता है। स्त्री का स्त्रैण भी पुरुष के पुरुष और स्त्रैण को कितना समझता है। इसका उत्तर दोनों के ही विवाह पूर्व प्रशिक्षण में निहित है। चूंकि नौकरी के वातावरण ने प्रशिक्षण क्रम को ही तोड़ दिया है, संयुक्त परिवार बिखरते जा रहे हैं। जीवन की पाठशाला ही बंद हो गई। पूरे वर्ष जो जन्म, मरण, परण का सिलसिला चलता रहता था, हर स्त्री को गृहस्थी की व्यवस्था, रिश्तेदारी, परिवार की परम्पराएं तथा दैनिक जीवन की लगभग सारी जानकारियां हो जाती थीं। प्रसव , गर्भावस्था, दाम्पत्य जैसी परोक्ष शिक्षा आवश्यकता पडऩे से पहले समझ में आ जाती थी। सब छूट गया।

एकाकी परिवार में दोनों व्यस्त रहते हैं। दोनों के पास समय का भी अभाव है। इनके बच्चों का क्या स्वरूप बनेगा? स्वयं भी जीवन के बारे में कुछ नहीं जानते, बच्चों को क्या देंगे। इन बच्चों में योषा-वृषा का विकास ही इनका भविष्य बनेगा। आधार का निर्माण कौन करेगा-टीवी, इंटरनेट या वातावरण। माता-पिता के भरोसे लडक़ा-लडक़ी एक जैसे तैयार हो रहे हैं। स्कूल में भी ऐसा ही वातावरण है। दोनों ही स्तर पर लडक़े वृषा-का ही विकास हो रहा है। ज्ञान रूप अग्नि का प्रसार हो रहा है। योषा तत्त्व की चर्चा भी नहीं हो रही। निर्माण का आधार योषा ही है। वह योषा क्या प्रकृति के विरुद्ध वृषा का कार्य कर सकता है? क्या मेघ के स्थान पर विद्युत वर्षा कर सकती है? क्या नई शिक्षा हमें इस ओर नहीं ले जा रही? एक सा कार्य करना होता तो स्वरूप भिन्न होता ही क्यों?

योषा-वृषा सृष्टि के दो स्वतंत्र तत्त्व हैं। व्यवहार में इनको सोम और अग्नि कह सकते हैं। इन्हीं के योग से सृष्टि की शुरुआत होती है और इसी से सृष्टि आगे भी बढ़ती है। यही ईश्वर की प्रतिकृति रूप विश्व का निर्माण करते हैं। सम्पूर्ण विश्व ही अग्नि रूप है। सोम के जल जाने के बाद अग्नि ही बचता है। इस यज्ञ में जब नया सोम पैदा होता है, तब सृष्टि आगे बढ़ती है। अग्नि निर्माण कार्य का अन्तिम पड़ाव है।

विवाह का लक्ष्य
सूर्य को जगत् का पिता कहते हैं। क्योंकि हमारा निर्माण वहीं से शुरू हो जाता है। मां-बाप एक पड़ाव हैं जो हमारी सूक्ष्म संस्था को स्थूल रूप देते हैं, पैदा नहीं करते। पिता बीज का संग्रह करता है, माता धरती है। परमेष्ठी लोक का सोम सूर्याग्नि में आहूत होता है। वहां से जल पृथ्वी की ओर बहता है। अन्य ग्रहों तक भी पहुंचता है। बादल इस जल का वर्षण करते हैं। वर्षण से ही वृषभ और वृषा बने हैं। यह जल पृथ्वी की अग्नि में जा आहूत होता है। औषधियों और वनस्पतियों के रूप में नया अन्न-सोम उत्पन्न होता है। प्राणी उत्पन्न होते हैं। अन्न जठराग्नि में आहूत होता है, तब नया सोम रूप शुक्र बनता है। इसकी आहुति रज अग्नि में होती है। तब योषा-वृषा का योग होता है।

ये तत्त्व शुक्र और रज के भीतर रहते हैं। इन्हीं से स्थूल रूप योषा (लडक़ी) या वृषा (लडक़े) की उत्पत्ति होती है। इनकी यात्रा सूर्य से ही शुरू हो जाती है। दोनों प्राकृतिक संस्थाएं हैं। सृष्टि अपने संतुलन की दृष्टि से इनका निर्माण करती है। दोनों ही बृहत् प्राकृतिक तंत्र ? का एक छोर हैं। सभी प्राणियों में योषा-वृषा का यही स्वरूप रहता है। स्वरूप भिन्नता का अन्तर है। तब हम अपनी मर्जी से अपनी भूमिका बदलने का निर्णय कैसे कर सकते हैं? हमें तो प्रकृति के निर्माण की शृंखला को आगे बढ़ाना है और शेष जीवन में पुरुषार्थ करके नर से नारायण बन जाना है। तब हम लाखों प्राणियों की योनियों से पैदा होते रहने से मुक्त हो सकेंगे। इसके लिए ही योषा-वृषा दोनों की पूर्णता और संतुलन आवश्यक है। ईश्वर पूर्ण है, जगत् भी पूर्ण है। ‘पूर्णमद: पूर्णमिदं, पूर्णात् पूर्ण मुदच्यते।’-गीता। यही मूल में विवाह का लक्ष्य रहा है।

आज का दृश्य बदलने लगा है। प्रकृति का योषा-वृषा युगल साथ चलने को तैयार नहीं। कुछ दूर चलकर दूर होने की सोचने लगता है। इसका एक कारण है, विवाह पूर्व जीवन शैली तैयार नहीं करना। जो तैयारी लडक़ी को मां करवाती है, पत्नी और मां बनने की, गृहस्थी चलाने की-पूर्णत: बंद हो गई। इसके अभाव में नई जीवन शैली ने उसके योषा के स्थान पर वृषा तत्त्व का अधिक पोषण किया। अर्थात् शरीर के भीतर दोनों ही वृषा प्रधान समान हो गए।

विकर्षण का मार्ग खुल गया। समर्पण का स्थान अहंकार ने ले लिया। समझौता संस्कृति मन के स्थान पर दिमाग में जा बैठी। जीवन का प्राकृतिक स्वरूप नष्ट हो गया। निर्णय शरीर पर आधारित हो गए। इस संघर्ष में माता-पिता भी संतान के साथ होने लगे। निजी सम्पत्ति की तरह। संतान का निर्माण न करना मां-बाप को भारी पड़ता है। लडक़ी को ही लौटना पड़ता है, जहां से न लौटने का वचन देकर विदा हुई थी।