बीना. गेहूं की फसल पर कुछ वर्षों तक कीटों का प्रकोप नहीं होता था और यह सुरक्षित फसल मानी जाती थी, लेकिन असंतुलित खादों के उपयोग के कारण यह फसल भी कीटों की चपेट मे आने लगी है। इस वर्ष गेहूं की फसल में फ्यूजेरियम हेड ब्लाइट रोग (फफूंदी जनित बीमारी) का प्रकोप दिख रहा […]
बीना. गेहूं की फसल पर कुछ वर्षों तक कीटों का प्रकोप नहीं होता था और यह सुरक्षित फसल मानी जाती थी, लेकिन असंतुलित खादों के उपयोग के कारण यह फसल भी कीटों की चपेट मे आने लगी है। इस वर्ष गेहूं की फसल में फ्यूजेरियम हेड ब्लाइट रोग (फफूंदी जनित बीमारी) का प्रकोप दिख रहा है, जिससे किसान परेशान हो रहे हैं।
क्षेत्र के किसानों के अनुसार गेहूं की बालियों में फफूंद दिख रही है। यह रोग गेहूं पहली बार लगा है और वह कृषि विभाग के अधिकारियों से इसके बचाव के लिए सलाह ले रहे हैं। कृषि वैज्ञानिक आशीष कुमार त्रिपाठी ने बताया कि यह फ्यूजेरियम हेड ब्लाइट जैसा रोग लग रहा है, जो मौसम में आए बदलाव के कारण भी होता है। साथ ही यूरिया का असंतुलित उपयोग भी एक कारण है, क्योंकि ज्यादा यूरिया डालने से पौधा मुलायम हो जाता है और कीटों का प्रकोप बढ़ता है। यूरिया के साथ किसानों को पोटाश का भी उपयोग करना चाहिए, जो बहुत कम किसान कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि कम पानी वाले गेहूं की एक एकड़ फसल में 60 से 80 किलो और ज्यादा पानी वाली फसल में 100 से 120 किलो यूरिया डाला जाना चाहिए। साथ ही एक एकड़ में करीब 20 किलो पोटाश भी डालें, तब फसल अच्छी होगी। फ्यूजेरियम हेड ब्लाइट रोग से बचाव के लिए एजोस्ट्रोबिन और टेबुकॉनजोल का 200 एमएल का घोल बनाकर प्रति एकड़ छिडक़ाव करें। उन्होंने बताया कि इस रोग के कारण फसल की गुणवत्ता और उत्पादन में कमी आ सकती है।
फसल चक्र अपनाना जरूरी
कृषि वैज्ञानिक के अनुसार किसान फसल चक्र नहीं अपना रहे हैं और एक जैसी फसल की हर साल बोवनी कर रहे हैं। यदि बदलकर फसल की बोवनी की जाए, तो फसलों में कीटों का प्रकोप नहीं होगा। किसानों को खेती को लेकर जागरूक होने की जरूरत है।